उच्चतम न्यायालय ने देश के कानूनी शिक्षा जगत और विधि छात्रों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पास कानून के छात्रों के दैनिक आचरण और अनुशासन को सीधे नियंत्रित करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है। शीर्ष अदालत ने माना कि BCI की शक्तियाँ मुख्य रूप से वकालत के पेशे में प्रवेश, कानूनी शिक्षा के मानकों को तय करने और नामांकित वकीलों के पेशेवर आचरण तक सीमित हैं। छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार पूरी तरह से संबंधित शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों का है।
यह मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा जब BCI द्वारा कानून के छात्रों के लिए कुछ सख्त आचार संहिता और कड़े नियम तय करने का प्रयास किया गया था, जिसमें कुछ विशेष परिस्थितियों में छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोकने या उनका नामांकन रद्द करने जैसी शक्तियाँ शामिल थीं। अदालत ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 का गहराई से विश्लेषण करते हुए कहा कि जब तक कोई छात्र वकील के रूप में रोल में नामांकित (Enroll) नहीं हो जाता, तब तक वह BCI के सीधे क्षेत्राधिकार में नहीं आता। BCI अपनी कानूनी सीमाओं से बाहर जाकर विश्वविद्यालयों के स्वायत्त अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
अदालत के इस फैसले से देश भर के लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को राहत मिली है, क्योंकि इससे उनकी शैक्षणिक और अनुशासनात्मक स्वायत्तता सुरक्षित हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक विश्वविद्यालय का अपना एक अलग तंत्र, अनुशासन समिति और नियम होते हैं, जो छात्रों के व्यवहार, हाजिरी और अनुशासनहीनता के मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। एक केंद्रीय संस्था का हर कॉलेज के छात्रों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करना व्यावहारिक और कानूनी दोनों दृष्टि से गलत है।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि BCI कानूनी शिक्षा के पाठ्यक्रम, इंफ्रास्ट्रक्चर और डिग्री की मान्यता से जुड़े गुणवत्ता मानकों को तय करने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है। BCI यह सुनिश्चित कर सकती है कि कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाए, लेकिन वह व्यक्तिगत रूप से छात्रों पर पुलिसिंग नहीं कर सकती। इस फैसले ने नियामक संस्थाओं (Regulators) और शिक्षण संस्थानों (Educational Institutions) के बीच की शक्तियों की सीमा रेखा को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है।
यह फैसला भारत में प्रशासनिक कानून और संस्थागत स्वायत्तता के दृष्टिकोण से एक बड़ा मील का पत्थर है। इससे लॉ छात्रों को एक अनुचित केंद्रीय नियंत्रण से राहत मिलेगी और विश्वविद्यालयों को बिना किसी बाहरी दबाव के अपने अनुशासनात्मक मामलों को निपटाने की स्वतंत्रता मिलेगी। अदालत ने यह संदेश दिया है कि नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन इसके नाम पर वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करके अधिकारों का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता।