वर्षों तक बस्तर ब्रिटिश सरकार के लिए एक ऐसी पहेली रहा जिसे उन्होंने गलत समझा। औपनिवेशिक अभिलेखों में इसे सभ्यता के बीच आदिम जंगल का एक ऐसा द्वीप बताया गया जहाँ 'नरभक्षी' रहते थे। शांतनु नंदन शर्मा ने अपनी पुस्तक रिबेल बस्तर (Rebel Bastar) में दर्शाया है कि यह ढांचा किसी मैदानी अध्ययन (फील्डवर्क) पर नहीं, बल्कि केवल सुनी-सुनाई बातों (अफवाहों) पर खड़ा किया गया था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी हेनरी हार्पर स्प्री के उदाहरण पर गौर करें, जिन्होंने लिखा था कि बस्तर के लोग 'अपने ही साथी इंसानों की बलि देते हैं और उन्हें खाते हैं'। स्प्री कभी बस्तर गए ही नहीं थे; वे बंगाल आर्टिलरी के कैप्टन क्रॉफर्ड पर निर्भर थे। उनका विवरण किसी प्रामाणिक दस्तावेज़ से ज़्यादा गपशप जैसा लगता है। यहाँ तक कि उन्होंने तारीख-ए-फ़रिश्ता के एक त्रुटिपूर्ण अनुवाद के आधार पर राजपूत राजा को गोंड बता दिया था।
1812 की ईस्ट इंडिया कंपनी की रिपोर्ट ने एक विकृत दृष्टिकोण पेश किया - निवासियों को 'असभ्य और बर्बर' कहा गया, फिर भी अपनी 'प्राचीन और वैध विरासत' (निचले इलाकों) की रक्षा के लिए उनकी तारीफ की गई, जिसके लिए वे फसल कटाई के समय पहाड़ों से नीचे उतरकर उपज पर अपना दावा जताते थे।
जनगणना के आंकड़े भी उतने ही दोषपूर्ण थे। 5 नवंबर 1866 को हुई पहली जनगणना में आबादी 2,69,684 बताई गई। 1872 तक यह अस्वाभाविक रूप से 70% घटकर मात्र 78,856 रह गई। 1,90,828 लोगों का यह गायब हो जाना केवल 1868-69 के हैजा या अकाल से सिद्ध नहीं किया जा सकता। मध्य प्रांत के तत्कालीन कार्यवाहक सचिव जे.डब्ल्यू. नील ने इन गंभीर विसंगतियों को स्वीकार किया था। 1866 के आंकड़े क्षेत्रफल के आधार पर केवल अनुमान थे, और 1872 में सटीक कार्यप्रणाली के दावों के बावजूद वे विफल रहे - क्योंकि 'बच्चों की गिनती ही नहीं की गई थी'।
इससे भी बदतर वर्गीकरण की स्थिति थी। जाति, व्यवसाय, नस्ल और धर्म की टिप्पणियों ने 19,000 से अधिक श्रेणियां बना दीं। गणकों ने शिशुओं को 'स्तनपान करने वाले' (sucking), बच्चों को 'खेलने वाले' (playing) और नए आए लोगों को 'अतिथि' (guest) के रूप में सूचीबद्ध किया। पेशे-ए-खुद (स्वरोजगार) जैसे शब्द ने अधिकारियों को उलझन में डाल दिया। नील ने टिप्पणी की थी कि गणक 'पागल और मूर्ख' के बीच भी अंतर नहीं कर पाते थे।
इससे यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक ज्ञान का निर्माण एक मनगढ़ंत कहानी मात्र था - नियंत्रण को सही ठहराने के लिए बस्तर को बर्बर के रूप में चित्रित किया गया, जबकि वे उसकी सही गिनती तक नहीं कर सके। औपनिवेशिक नज़रिए ने बस्तर को जंगली, अलग-थलग और अनियंत्रित बनाकर पेश किया - एक ऐसा आख्यान जो आज भी नीतियों को प्रभावित करता है।