संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के तमाम बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आज एक ऐसा ऐतिहासिक और भूचाल लाने वाला बदलाव दर्ज किया गया है, जिसे वैश्विक मीडिया 'ग्लोबल साउथ के स्वर्ण युग और पश्चिमी वर्चस्व के अंत' के रूप में देख रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के हालिया सत्र में लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी और एशियाई विकासशील देशों के विशाल संघ ने मिलकर पश्चिमी देशों और अमीर राष्ट्रों के एकाधिकार वाली वैश्विक संस्थाओं (जैसे UNSC और IMF) में तत्काल और बड़े सुधारों की मांग का एक संयुक्त, कड़ा और निर्णायक प्रस्ताव पेश किया है। इन देशों का साफ कहना है कि अब वे दुनिया की नीतियां तय करने में पश्चिमी देशों की मनमानी और दोहरे मानदंडों को और अधिक सहन नहीं करेंगे।
इस नए और तेजी से मजबूत होते गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत इसकी विशाल आर्थिक, औद्योगिक और जनसांख्यिकीय क्षमता है। भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे देश इस वैश्विक मंच के सबसे बड़े अगुआ और मार्गदर्शक बनकर उभरे हैं। इन देशों ने वैश्विक जलवायु वित्त पोषण, निष्पक्ष व्यापार नीतियों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में विकासशील देशों को उनकी वास्तविक आबादी और आर्थिक आकार के हिसाब से मताधिकार व प्रतिनिधित्व देने की जोरदार मांग उठाई है। इस ऐतिहासिक लामबंदी ने पश्चिमी देशों के दशकों पुराने पारंपरिक आधिपत्य को जमीन दिखा दी है।
मानवीय और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से यह घटनाक्रम सदियों से उपेक्षित अरबों इंसानों की उस आवाज का प्रतीक है, जिन्हें हमेशा पश्चिमी नीतियों के हाशिए पर धकेल दिया गया था। भुखमरी, गरीबी, जलवायु परिवर्तन और असमानता से जूझ रहे ग्लोबल साउथ के इन देशों का यह एकजुट होना इस बात की गवाही देता है कि अब दुनिया की तकदीर तय करने में सिर्फ वाशिंगटन या लंदन के एयरकंडीशंड कमरों में बैठने वालों की मर्जी नहीं चलेगी। यह उन तमाम विकासशील समाजों की जीत की शुरुआत है जो अपने अधिकारों के लिए अब खुलकर खड़े हो रहे हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो यह घटनाक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस दूरदर्शी विदेश नीति की सबसे बड़ी वैचारिक जीत है जिसमें भारत ने हमेशा 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व किया है। नई दिल्ली लगातार यह मुखर होकर कहती आई है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का वर्तमान स्वरूप आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं से कोसों दूर है और इसमें भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र तथा विकासशील देशों को स्थायी सदस्यता मिलना अब अनिवार्य हो गया है। जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भी भारत ने विकासशील देशों के इन सुलगते मुद्दों को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में ला खड़ा किया था।
यह महान बदलाव इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि 21वीं सदी की भू-राजनीति अब केवल अमेरिका और यूरोप के इर्द-गिर्द नहीं घूमेगी, बल्कि आने वाले समय में दुनिया की दिशा तय करने में एशियाई और अफ्रीकी देशों की भूमिका सबसे अहम और निर्णायक होने जा रही है। भारत वैश्विक दक्षिण के इन तमाम देशों के बीच एक विश्वसनीय, शांत और मजबूत नेता के रूप में अपनी स्थिति को लगातार पुख्ता कर रहा है। आने वाले वर्षों में यह नया भू-राजनीतिक समीकरण अंतरराष्ट्रीय संबंधों, व्यापारिक संधियों और वैश्विक सुरक्षा की पूरी रूपरेखा को हमेशा के लिए बदलकर रख देगा।
यह ऐतिहासिक दौर इस बात का गवाह बन रहा है कि अन्याय और असमानता के खिलाफ जब दुनिया के पीड़ित देश एकजुट होते हैं, तो दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यों के अहंकार को भी झुकना पड़ता है। ग्लोबल साउथ का यह नया उदय केवल कूटनीति का बदलाव नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के इतिहास का एक नया सवेरा है, जो निष्पक्षता, समानता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित एक नई विश्व व्यवस्था की नींव रख रहा है।
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