मध्य पूर्व के कूटनीतिक गलियारों में आज एक ऐसा भूचाल आया है जिसने इजराइल और वाशिंगटन के बीच दशकों पुरानी घनिष्ठ मित्रता में पहली बार गहरी दरारें डाल दी हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गाजा और लेबनान में तत्काल और बिना शर्त पूर्ण युद्धविराम के लिए लाए गए एक नए और अत्यंत कूटनीतिक प्रस्ताव पर मतदान के दौरान, अमेरिका ने हैरान करने वाला कदम उठाते हुए अपने पारंपरिक वीटो अधिकार का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया। अमेरिकी प्रतिनिधि द्वारा इस प्रस्ताव पर 'वोटिंग से दूर' (Abstain) रहने के कारण यह प्रस्ताव भारी बहुमत से पास हो गया, जिसके बाद तेल अवीव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के भीतर भयंकर राजनीतिक कोहराम मच गया है।
इजराइली रक्षा मंत्रालय और नेतन्याहू प्रशासन ने इस अमेरिकी रुख को अपनी पीठ में छुरा घोंपे जाने जैसा करार दिया है। उनका साफ कहना है कि वाशिंगटन के इस कदम से हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है और इजराइल की सैन्य संप्रभुता को तगड़ा झटका लगा है। दूसरी ओर, व्हाइट हाउस का तर्क है कि घरेलू स्तर पर बढ़ रहे भारी विरोध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अमेरिका अनिश्चितकाल तक क्षेत्रीय युद्ध को बढ़ावा देने वाले कदमों का आँख मूंदकर समर्थन नहीं कर सकता। इस अप्रत्याशित कूटनीतिक यू-टर्न ने पश्चिमी एशिया के समीकरणों को पूरी तरह से उलट कर रख दिया है।
भारतीय कूटनीति के दृष्टिकोण से यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी परिणाम देने वाला है। भारत हमेशा से पश्चिम एशिया में संवाद, शांति और दो-राष्ट्र सिद्धांत (Two-State Solution) का पक्षधर रहा है। अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ती इस तनातनी से नई दिल्ली के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि वैश्विक महाशक्तियां अब अपने घरेलू राजनीतिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रही हैं। भारत के इजराइल के साथ रक्षा संबंध और अरब देशों के साथ ऊर्जा व व्यापारिक रिश्ते दोनों ही बहुत गहरे हैं, ऐसे में अमेरिकी दखलंदाजी के कम होने से भारत को पश्चिम एशिया में अपनी स्वतंत्र, संतुलित और स्वायत्त विदेश नीति को आगे बढ़ाने के लिए एक नई और बेहतर रणनीतिक जगह मिल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में वैश्विक कूटनीति का रुख बदल देगा। एक तरफ जहां इजराइल अपने दम पर अपने सैन्य अभियानों को जारी रखने की जिद पर अड़ा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का इस तरह पीछे हटना यह साबित करता है कि युद्ध की थकान अब पश्चिमी दुनिया पर भारी पड़ने लगी है। भारत जैसे देशों के लिए यह समय अत्यधिक सतर्कता और कूटनीतिक परिपक्वता दिखाने का है, ताकि पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों प्रवासियों और ऊर्जा सुरक्षा पर कोई आंच न आए।
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