प्योंगयांग और क्रेमलिन के बीच आज एक ऐसा खौफनाक और सामरिक समझौता सामने आया है जिसने पेंटागन और पश्चिमी देशों की रातों की नींद पूरी तरह उड़ा दी है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन के बीच हुई एक गुप्त उच्च-स्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों ने एक नए और व्यापक रणनीतिक-सैन्य सहयोग समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस खतरनाक संधि के तहत रूस और उत्तर कोरिया ने एक-दूसरे के खिलाफ बाहरी हमले की स्थिति में स्वतः एक-दूसरे को पूर्ण सैन्य सहायता और अत्याधुनिक परमाणु-सामरिक तकनीक देने की गारंटी दी है।
खुफिया रिपोर्टों के हवाले से यह बात सामने आई है कि इस नए समझौते के बदले में उत्तर कोरिया ने रूस को भारी मात्रा में आधुनिक तोपखाने के गोले और मारक बैलिस्टिक मिसाइलें सौंपी हैं, जिनका इस्तेमाल यूक्रेनी रणक्षेत्र में रूसी सेना बेहद आक्रामक तरीके से कर रही है। इसके बदले में रूस, प्योंगयांग को अंतरिक्ष और उपग्रह तकनीक, उन्नत पनडुब्बी निर्माण के रहस्य और अत्याधुनिक परमाणु-संचालित हथियार प्रणालियों के सीक्रेट्स साझा कर रहा है। अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया ने इस गठबंधन को वैश्विक परमाणु प्रसार और शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया है।
मानवीय और सुरक्षात्मक नजरिए से यह गठबंधन पूरी मानव जाति के लिए एक बड़े खतरे की घंटी है। जब दुनिया के तानाशाह और युद्धग्रस्त देश आपस में इस तरह के मारक परमाणु और सैन्य सौदे करने लगेंगे, तो पूरी पृथ्वी पर विनाश का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। उत्तर कोरियाई नागरिकों की भूखी-प्यासी जनता की कीमत पर वहां का तानाशाह जिस तरह अपनी सनक को पूरा करने के लिए रूस के साथ परमाणु और मिसाइल तकनीक का व्यापार कर रहा है, वह आधुनिकता के इस दौर में मानवता के मुंह पर एक बहुत बड़ा तमाचा है।
भारतीय रणनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को बहुत ही गहरी और पैनी नजरों से देखा जा रहा है। भारत के लिए उत्तर कोरिया और रूस के बीच यह बढ़ती घनिष्ठता चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि प्योंगयांग और बीजिंग की धुरी पहले से ही एशियाई उपमहाद्वीप में अस्थिरता पैदा करती रही है। हालांकि भारत के रूस के साथ ऐतिहासिक और अटूट रक्षा संबंध हैं, लेकिन उत्तर कोरिया को मिलने वाली उन्नत सैन्य और परमाणु तकनीक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के नाजुक सुरक्षा संतुलन को बुरी तरह बिगाड़ सकती है। भारत हमेशा से कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्ण और शांतिपूर्ण डी-न्यूक्लियरिकरण का समर्थन करता आया है।
यह महासंधि इस बात की सबसे बड़ी प्रतीक है कि शीत युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था अब पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुकी है और दुनिया स्पष्ट रूप से दो विरोधी और खूंखार ध्रुवों में बंटती जा रही है। एक तरफ जहां पश्चिमी देश नाटो के जरिए अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं, वहीं रूस, उत्तर कोरिया, चीन और ईरान का यह गुप्त नेटवर्क अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था को सीधी चुनौती दे रहा है। भारत जैसी उभरती हुई और शांतिप्रिय महाशक्ति के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए इंडो-पैसिफिक में अपनी नौसैनिक ताकत को और अधिक पुख्ता करे।
आने वाले समय में यह परमाणु पैक्ट दुनिया के अन्य देशों को भी हथियारों की एक नई और खतरनाक दौड़ में शामिल होने के लिए मजबूर कर देगा। कूटनीति के तमाम दरवाजे जब इस तरह सनक और तानाशाही के आगे बंद होने लगते हैं, तब युद्ध की विभीषिका के अलावा कुछ नहीं बचता। भारत और दुनिया के अन्य शांतिप्रिय राष्ट्रों के सामने अब यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वे इस बढ़ते परमाणु उन्माद के बीच कैसे वैश्विक शांति और अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हैं।
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