अमेरिकी राष्ट्रपति और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बहुप्रतीक्षित शिखर वार्ता के बाद जारी आधिकारिक बयानों ने साफ कर दिया है कि दोनों महाशक्तियों के बीच 'बिना भरोसे के स्थिरता' का दौर शुरू हो चुका है। भले ही दोनों पक्षों ने लगभग 30 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार पर पारस्परिक टैरिफ कटौती पर सहमति व्यक्त की हो, लेकिन मुख्य रणनीतिक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच खाई और चौड़ी हो गई है।
यह समझौता वैश्विक बाजारों को अस्थायी राहत तो देता है, लेकिन दक्षिण चीन सागर में जारी सैन्य निर्माण, ताइवान का अनसुलझा मुद्दा और एडवांस्ड सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों पर कोई सहमति नहीं बन सकी है। बीजिंग का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी आर्थिक दबाव को कम करना था, जबकि वाशिंगटन का ध्यान अपने तकनीकी वर्चस्व को बचाए रखने पर केंद्रित है।
इस बीच, दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सैन्य इस्तेमाल और साइबर जासूसी को लेकर खींचतान और तेज हो गई है। हाल ही में सामने आए वैश्विक डेटा लीक और एआई कंट्रोल सिस्टम के मामलों ने दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है।
अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता कोई स्थायी शांति संधि नहीं है, बल्कि दोनों देशों द्वारा अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के लिए लिया गया एक रणनीतिक 'पॉज' (विराम) भर है।
आने वाले दिनों में तकनीक, दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Elements) और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में अमेरिका और चीन के बीच यह शीत युद्ध (Cold War 2.0) और ज्यादा हिंसक और प्रतिस्पर्धात्मक होने की पूरी आशंका है।
भारतीय परिपेक्ष्य:
अमेरिका और चीन के बीच यह 'डी-कप्लिंग' और अस्थिर संबंध भारत के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आए हैं। वैश्विक कंपनियां अपने विनिर्माण आधार को चीन से हटाकर भारत स्थानांतरित करने ('चाइना प्लस वन' रणनीति) को तेजी दे रही हैं। हालांकि, तकनीक और चिप सप्लाई चेन पर चीन का कड़ा नियंत्रण भारत के इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र के लिए चुनौतियां भी खड़ा करता है, जिस पर भारत को सावधानीपूर्वक अपनी नीति आगे बढ़ानी होगी।
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