अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों से आज एक बेहद सनसनीखेज और भूचाल लाने वाली खबर सामने आई है, जिसने मध्य पूर्व के पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गाजा और लेबनान जंग को लेकर आए एक नए और कड़े युद्धविराम प्रस्ताव पर मतदान के दौरान अमेरिका ने पारंपरिक वीटो अधिकार का इस्तेमाल करने से अचानक साफ इंकार कर दिया। अमेरिकी प्रतिनिधि के इस प्रस्ताव पर 'वोटिंग से दूर' (Abstain) रहने के कारण यह प्रस्ताव भारी बहुमत से पास हो गया, जिसके बाद तेल अवीव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के भीतर भारी राजनीतिक कोहराम मच गया है।
इजराइली रक्षा गलियारों में इस अमेरिकी यू-टर्न को सीधे तौर पर उनकी पीठ में छुरा घोंपे जाने जैसा करार दिया जा रहा है। नेतन्याहू प्रशासन का मानना है कि वाशिंगटन के इस कदम से हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है और इजराइल की सैन्य संप्रभुता को तगड़ा आघात लगा है। दूसरी तरफ, व्हाइट हाउस का कहना है कि घरेलू स्तर पर बढ़ रहे भारी जन-दबाव और अनिश्चितकाल तक चलने वाले क्षेत्रीय युद्धों से त्रस्त अमेरिकी जनता के बीच अब इस आक्रामकता को और अधिक समर्थन देना संभव नहीं बचा है।
मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस कूटनीतिक ड्रामे के बीच पश्चिम एशिया की सुलगती जमीन पर रोज दम तोड़ती मासूम जिंदगियों और उजड़ते परिवारों की चीखें दब कर रह गई हैं। महाशक्तियां अपने राजनीतिक और चुनावी समीकरणों के हिसाब से दोस्त और दुश्मन बदलती हैं, लेकिन इस खेल में सबसे बड़ी कीमत आम इंसानों को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ती है। अमेरिका का यह कदम इस बात का स्पष्ट सबूत है कि युद्ध की अनन्त थकान अब पश्चिमी दुनिया के राजनीतिक ढांचे को अंदर से दीमक की तरह चाटने लगी है।
भारतीय कूटनीति और रणनीतिक दृष्टिकोण से यह घटनाक्रम बहुत गहरे और दूरगामी परिणाम देने वाला है। भारत हमेशा से पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और कूटनीतिक संवाद का पुरजोर समर्थक रहा है। अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ती इस तनातनी से नई दिल्ली के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि वैश्विक महाशक्तियां अब अपने घरेलू आर्थिक हितों को सर्वोपरि रख रही हैं। भारत के इजराइल के साथ मजबूत रक्षा संबंध हैं और खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा व व्यापारिक रिश्ते गहरे हैं, ऐसे में अमेरिकी दखल के कम होने से भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने का अवसर मिल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह कूटनीतिक मोड़ वैश्विक राजनीति की पूरी दिशा को बदलकर रख देगा। एक तरफ जहां इजराइल अपने दम पर अपने सैन्य अभियानों को जारी रखने की जिद पर अड़ा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का इस तरह पीछे हटना यह साबित करता है कि क्षेत्रीय तनाव अब ग्लोबल सुपरपॉवर के नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह समय अत्यधिक सतर्कता बरतने का है, ताकि पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों प्रवासियों और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर किसी भी प्रकार का संकट न आए।
यह पूरी घटना इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी रिश्ता स्थायी नहीं होता, बल्कि हर कदम के पीछे स्वार्थ की गहरी राजनीति छिपी होती है। जब दुनिया के सबसे बड़े रणनीतिक साझीदार ही इस तरह मंच पर एक-दूसरे से अलग राहें चुनने लगें, तो आने वाले कल की वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। आम जनता और वैश्विक शांति के पैरोकार आज इसी सवाल से जूझ रहे हैं कि क्या यह कूटनीतिक खेल कभी थम पाएगा या पूरी दुनिया किसी अनहोनी की तरफ बढ़ रही है।
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