दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) का विस्तारित 'ब्रिक्स' (BRICS) समूह के साथ जुड़ने का फैसला वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक नया मोड़ साबित हो रहा है। इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने और मलेशिया व वियतनाम जैसे देशों के ब्रिक्स पार्टनर के रूप में जुड़ने के बाद, ग्लोबल साउथ का पलड़ा पश्चिमी ब्लॉक के मुकाबले और भारी हो गया है।
यह नई व्यवस्था स्पष्ट संकेत देती है कि विकासशील देश अब केवल पश्चिमी संस्थाओं (जी-7 या आईएमएफ) के भरोसे रहने को तैयार नहीं हैं। स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने और डी-डॉलराइजेशन (De-Dollarisation) को गति देने के लिए आसियान और ब्रिक्स देशों का यह गठजोड़ बेहद अहम माना जा रहा है।
हालांकि, आसियान के भीतर भी म्यांमार संकट, दक्षिण चीन सागर विवाद और अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। इसके बावजूद, ये देश बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं।
पश्चिमी देशों ने इस नए गठजोड़ पर चिंता व्यक्त की है, क्योंकि इससे वैश्विक वित्तीय तंत्र और डॉलर के वर्चस्व को सीधे तौर पर चुनौती मिल रही है। ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और आपूर्ति श्रृंखला के मामले में ब्रिक्स का यह विस्तार बेहद रणनीतिक है।
वैश्विक मंचों पर अब एजेंडा तय करने की ताकत पश्चिमी आर्थिक महाशक्तियों के हाथ से खिसक कर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के समूह के पास आ रही है।
भारतीय परिपेक्ष्य:
भारत ने ब्रिक्स के इस विस्तार में एक अत्यंत संतुलनकारी और निर्णायक भूमिका निभाई है। भारत ने यह सुनिश्चित किया कि ब्रिक्स किसी पश्चिम-विरोधी या सैन्य गुट में तब्दील न होकर एक विशुद्ध आर्थिक व विकासवादी मंच बना रहे। आसियान देशों के ब्रिक्स से जुड़ने से भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' (Act East Policy) को जबरदस्त मजबूती मिलेगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत का प्रभाव और अधिक गहरा होगा।
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