अब युद्ध सिर्फ टैंकों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि 'क्रिटिकल मिनरल्स' और 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' से लड़े जा रहे हैं। चीन ने अपनी रणनीति बदलते हुए दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर नए और कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों, सोलर पैनल, फाइटर जेट्स और स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाले इन खनिजों का बड़ा हिस्सा चीन के नियंत्रण में है।
चीन के इस अप्रत्याशित कदम से अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ के उद्योग संकट में आ गए हैं। हाई-टेक विनिर्माण इकाइयों को अचानक कच्चे माल की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिमी विशेषज्ञ इस कदम को अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए चिप प्रतिबंधों के खिलाफ एक करारा रणनीतिक बदला मान रहे हैं।
दुर्लभ खनिजों पर इस चीन केंद्रित निर्भरता को खत्म करने के लिए पश्चिमी देश अब ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में वैकल्पिक साझेदारों की तलाश में तेजी से जुट गए हैं। दुनिया अब एक नए 'संसाधन युद्ध' (Resource War) के दौर में प्रवेश कर रही है, जहां जिसके पास खनिज हैं, वही नया ग्लोबल पावर हाउस होगा।
भारत के लिए यह खबर रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत तेजी से ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की तरफ बढ़ रहा है। लिथियम, कोबाल्ट और न्यूओडिमियम जैसे खनिजों के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भरता भारत के ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए चुनौती पैदा कर सकती है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने अपनी 'खनिज विदेश नीति' पर तेजी से काम शुरू किया है। भारत ने ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना जैसे देशों के साथ खनिज खोज समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। साथ ही, घरेलू स्तर पर भी जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में मिले लिथियम के भंडारों के उत्खनन पर जोर दिया जा रहा है।
भारत इस चुनौती को एक अवसर में बदलने की कोशिश में है। 'क्वाड' (QUAD) के साझेदारों के साथ मिलकर भारत एक वैकल्पिक और सुरक्षित खनिज आपूर्ति श्रृंखला बनाने की वकालत कर रहा है। यदि भारत रिफाइनिंग क्षमताओं को विकसित करने में सफल होता है, तो वह चीन के इस एकाधिकार को चुनौती देने वाला प्रमुख केंद्र बन सकता है।