संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पश्चिमी देशों पर दुनिया को 'दोहरे मापदंडों और बल प्रयोग' से अस्थिर करने का सीधा और तीखा आरोप लगाया है। लावरोव ने खुले तौर पर ऐलान किया कि रूस पश्चिमी एकाधिकार को समाप्त करने के लिए एक नए 'यूरेशियन सुरक्षा ढांचे' (Eurasian Security Architecture) का निर्माण करने जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कड़ा संदेश दिया कि यूक्रेन में रूस का 'विशेष सैन्य अभियान' अपने अंतिम लक्ष्यों को पूरा किए बिना समाप्त नहीं होगा।
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रूस की ओर से पेश किया गया यह नया यूरेशियाई सुरक्षा ढांचा दरअसल नाटो (NATO) और पश्चिमी सैन्यवाद के खिलाफ एक नया कूटनीतिक और सैन्य ध्रुव बनाने का प्रयास है। मॉस्को ने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया कि वे जानबूझकर यूक्रेन में शांति वार्ताओं की संभावनाओं को विफल कर रहे हैं और युद्ध को लंबा खींच रहे हैं। लावरोव का यह बयान दिखाता है कि रूस अब पश्चिमी सुरक्षा संरचनाओं पर निर्भर रहने के बजाय पूरे यूरेशिया क्षेत्र में चीन, भारत और मध्य एशियाई देशों को मिलाकर एक नया शक्ति संतुलन खड़ा करना चाहता है।
पश्चिमी देशों और यूरोपीय संघ ने लावरोव के इस यूरेशियाई सुरक्षा प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को विभाजित करने का प्रयास करार दिया है। हालाँकि, एशिया और वैश्विक दक्षिण (Global South) के कई देश, जो पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों से तंग आ चुके हैं, वे इस नए विचार को बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) की ओर एक बड़े कदम के रूप में देख रहे हैं।
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भारतीय दृष्टिकोण से, रूस द्वारा प्रस्तावित यूरेशियाई सुरक्षा ढांचा एक अत्यंत नाजुक और रणनीतिक मोड़ प्रस्तुत करता है। भारत रूस का एक पुराना और परखा हुआ रणनीतिक साझेदार है, लेकिन साथ ही भारत पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत आर्थिक और तकनीकी संबंध रखता है। भारत किसी भी ऐसे सुरक्षा गुट का हिस्सा बनने से बचता है जो पूरी तरह से अमेरिका या पश्चिम-विरोधी एजेंडे पर आधारित हो।
हालाँकि, यूरेशिया महाद्वीप में शांति और स्थिरता भारत के अपने भू-राजनीतिक हितों, जैसे 'नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच के लिए बेहद जरूरी है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से हमेशा यह रुख बनाए रखा है कि दुनिया को किसी नए 'शीत युद्ध' (Cold War) या गुटबाज़ी में विभाजित नहीं किया जाना चाहिए और सभी वैश्विक विवादों का समाधान कूटनीति तथा शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए ही निकाला जाना चाहिए।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जो देश युद्ध के मैदान से दूर हैं, उन्हें भी इस संघर्ष की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। भारत इस यूरेशियाई सुरक्षा बहस में एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और न्यायसंगत शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है, जहाँ वह रूस से सस्ती ऊर्जा और रक्षा सहयोग बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों को भी यह समझाने में सफल रहा है कि भारत का राष्ट्रीय हित ही उसकी विदेश नीति की एकमात्र दिशा तय करता है।
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