इराक और अमेरिका के बीच एक अत्यंत गोपनीय और वित्तीय रूप से महत्वपूर्ण समझौते पर सहमति बन गई है, जिसके तहत अमेरिका इराक को भारी मात्रा में अमेरिकी डॉलर (US Dollar Cash Shipments) की नकद आपूर्ति फिर से शुरू करने पर सहमत हो गया है। इराक के केंद्रीय बैंक और वाशिंगटन के अधिकारियों के बीच हुई इस बैठक के बाद इराक ने पुष्टि की है कि डॉलर की नई खेप अगले कुछ दिनों में बगदाद पहुंचेगी। इस कदम का मुख्य उद्देश्य इराकी बाजार में डॉलर की भारी किल्लत को दूर करना और स्थानीय मुद्रा के अवमूल्यन को रोकना है।
यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में इसलिए अत्यधिक सनसनीखेज माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका ने ईरान पर नकेल कसने के लिए इराक में डॉलर के प्रवाह पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। वाशिंगटन को डर था कि इराक के रास्ते डॉलर की तस्करी ईरान तक हो रही है, जिससे ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों को चकमा दे रहा था। अब अचानक इराक को नकद डॉलर भेजने की इजाजत देना यह दर्शाता है कि अमेरिका मध्य पूर्व में बिगड़ते हालात के बीच इराक को पूरी तरह अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखना चाहता है।
इराकी सरकार ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे इराक की घरेलू मुद्रा स्थिरता को मजबूती मिलेगी और विदेशी मुद्रा की मांग को पूरा किया जा सकेगा। हालाँकि, इस सौदे ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार और डी-डॉलराइजेशन (De-Dollarization) की कोशिशों में जुटे ब्रिक्स (BRICS) देशों के रणनीतिकारों को भी सतर्क कर दिया है। अमेरिका द्वारा वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर के दबदबे को बनाए रखने का यह एक प्रत्यक्ष और रणनीतिक दांव है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में, इराक में डॉलर के प्रवाह की बहाली और इराकी अर्थव्यवस्था की स्थिरता भारत के लिए राहत भरी खबर है। इराक भारत को कच्चा तेल सप्लाई करने वाले सबसे बड़े साझेदारों में से एक है। इराक की वित्तीय प्रणाली में स्थिरता रहने से भारतीय तेल आयातकों को अपने भुगतानों को सुचारू रूप से निपटाने में मदद मिलती है।
इसके अलावा, भारत ने हाल ही में ब्रिक्स और अपने मित्र देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं (जैसे रुपये और दिनार/रुपये और दिरहम) में व्यापार को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। लेकिन अमेरिका द्वारा इराक जैसे तेल समृद्ध देश को नकद डॉलर में बांधे रखना यह दिखाता है कि वैश्विक तेल व्यापार से डॉलर के प्रभुत्व को इतनी जल्दी खत्म करना आसान नहीं होगा। भारत को अपने व्यापार निपटान (Trade Settlement) के लिए डॉलर और स्थानीय मुद्राओं के बीच एक बेहद बारीक संतुलन बनाना होगा।
वित्तीय कूटनीति के स्तर पर, भारत इस बात का ध्यान रख रहा है कि उसके तेल आयात पर किसी भी प्रकार के अमेरिकी प्रतिबंधों या वित्तीय अड़चनों का असर न पड़े। बगदाद और वाशिंगटन के बीच हुआ यह नया वित्तीय सौदा यह साबित करता है कि मध्य पूर्व की भू-राजनीति में केवल बारूद और मिसाइलें ही नहीं, बल्कि 'डॉलर की कूटनीति' (Dollar Diplomacy) भी एक सबसे बड़ा और अचूक हथियार बनी हुई है।
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