मध्य पूर्व के सबसे संकरे, संवेदनशील और रणनीतिक समुद्री मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में देर रात हुए एक भीषण मिसाइल और ड्रोन हमले ने दो विशाल अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों को आग के भयावह शोलों में बदल दिया। क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी गुटों और विरोधी ताकतों के बीच अचानक भड़के इस नए सैन्य टकराव के कारण इस जलमार्ग से गुजरने वाला तमाम वाणिज्यिक तेल टैंकरों का बेड़ा पूरी तरह ठप्प हो गया है। इस घटना के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हड़कंप मच गया और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें रातों-रात उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं।
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तेल टैंकरों पर हुए इस हमले के तुरंत बाद पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन 'ओपेक' (OPEC) ने आपातकालीन बैठक बुलाई, लेकिन समुद्री मार्ग पर मिसाइल हमलों के जारी खतरे और अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों द्वारा जहाजों का इंश्योरेंस कवर रद्द किए जाने के कारण तेल की निर्बाध आपूर्ति बहाल करना असंभव नजर आ रहा है। अमेरिका और ब्रिटेन ने अपने युद्धपोतों को तेल टैंकरों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए तुरंत होर्मुज की ओर रवाना किया है, लेकिन पूरे मध्य पूर्व में तनाव इस कदर फैल चुका है कि एक छोटी सी चिंगारी अब पूरे खाड़ी क्षेत्र को एक भयंकर युद्ध में झोंकने के लिए काफी है।
होर्मुज में हुए इस बारूदी धमाके ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है। वाशिंगटन से लेकर लंदन और टोक्यो तक, दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाम से नीचे गिर गए हैं। एयरलाइंस कंपनियां, माल ढुलाई परिवहन और बड़े कारखाने ईंधन की भारी किल्लत और बढ़ी हुई कीमतों के कारण बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। दुनिया भर के अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक भीषण मंदी और 'स्टैगफ्लेशन' (आर्थिक सुस्ती के साथ रिकॉर्ड महंगाई) का सामना करना पड़ेगा।
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भारतीय परिपेक्ष्य में, यह खबर देश की आर्थिक सेहत और घरेलू बजट के लिए एक बड़े 'रेड अलर्ट' जैसी है। भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मध्य पूर्व के समुद्री रास्ते से होकर भारत पहुंचता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई इस अप्रत्याशित उछाल से देश के भीतर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दामों पर भारी दबाव पड़ेगा, जिससे आम भारतीय नागरिक की जेब पर सीधा असर पड़ना तय है।
ईंधन की कीमतें बढ़ने का सीधा मतलब है कि देश के भीतर माल ढुलाई महंगी हो जाएगी, जिससे फल, सब्जियां, खाद्यान्न और दैनिक उपभोग की तमाम वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। इसके अतिरिक्त, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटेगा और व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ने से भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है। यह स्थिति केंद्र सरकार के बजट, वित्तीय घाटे के लक्ष्यों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की महंगाई नियंत्रण रणनीतियों को संकट में डाल सकती है।
हालाँकि, भारत की दूरदर्शी ऊर्जा रणनीति इस गंभीर संकट में देश के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करेगी। भारत द्वारा पिछले कुछ समय से रूस से रियायती दरों पर मंगाया जा रहा कच्चा तेल और देश के भीतर बनाए गए विशाल 'रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार' (Strategic Petroleum Reserves) भारत को कई हफ्तों तक किसी भी ऊर्जा किल्लत से बचाकर रखेंगे। इसके साथ ही, भारत की कूटनीतिक टीम मध्य पूर्व के प्रमुख देशों और ईरान के साथ लगातार संपर्क में है, ताकि भारत आने वाले तेल टैंकरों की सुरक्षा को हर हाल में सुनिश्चित किया जा सके।
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