पेरिस में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन (COP) का अंतिम सत्र एक अभूतपूर्व कूटनीतिक विफलता, तीखी नोकझोंक और भारी हंगामे के साथ समाप्त हो गया। अमीर और विकसित पश्चिमी देशों द्वारा पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए 'क्लाइमेट फाइनेंस' (जलवायु वित्त) के तहत ट्रिलियन-डॉलर की मदद देने के अपने पुराने वादों से मुकरने के विरोध में 100 से अधिक विकासशील और गरीब देशों के प्रतिनिधियों ने सभा का बहिष्कार (Walkout) कर दिया। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में यह पहला मौका है जब इतना बड़ा वैश्विक शिखर सम्मेलन किसी सर्वसम्मत प्रस्ताव या साझा घोषणापत्र के बिना पूरी तरह से ध्वस्त हो गया।
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सम्मेलन के दौरान पश्चिमी देशों ने अपनी आंतरिक आर्थिक सुस्ती और बजट घाटे का बहाना बनाते हुए विकासशील देशों को दी जाने वाली हरित तकनीक और वित्तीय सहायता में भारी कटौती करने का नया प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव के आते ही भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और मिस्र के नेतृत्व में 'ग्लोबल साउथ' के देशों ने मंच पर ही अमेरिका और यूरोपीय संघ के दोहरे रवैये की कड़े शब्दों में धज्जियां उड़ा दीं। बैठक कक्ष में प्रतिनिधियों द्वारा मेजें थपथपाने, माइक बंद करने और एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाने के दृश्यों ने वैश्विक कूटनीति के गिरते स्तर और विकसित देशों की बदनीयती को दुनिया के सामने लाकर रख दिया।
पेरिस सम्मेलन के इस तरह बेनतीजा खत्म होने का सीधा और भयावह असर दुनिया भर में चल रहे पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण प्रोजेक्ट्स पर पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन की विभीषिका से निपटने के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे और पेरिस समझौते के लक्ष्य अब अधर में लटक गए हैं। दुनिया भर के शीर्ष पर्यावरण वैज्ञानिकों ने कड़ी चेतावनी जारी की है कि अमीर देशों के इस अड़ियल और स्वार्थी रवैये के कारण पृथ्वी का औसतन तापमान खतरनाक स्तर तक बढ़ेगा, जिससे बेमौसम बारिश, सूखा, समुद्री जलस्तर में वृद्धि और विनाशकारी चक्रवातों का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।
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भारत ने इस पूरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की सबसे मुखर, निडर और तार्किक आवाज बनकर दुनिया का नेतृत्व किया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने कड़े शब्दों में कहा कि जिन विकसित पश्चिमी देशों ने पिछले दो सौ सालों में अंधाधुंध औद्योगीकरण करके पूरी धरती को प्रदूषण के मुहाने पर धकेला है, वे आज अपनी नैतिक और वित्तीय जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकते। भारत का यह आक्रामक और तर्कसंगत रुख दुनिया भर के विकासशील और गरीब देशों के लिए एक बड़ा संबल बन गया है।
भारत के लिए यह वैश्विक विफलता केवल एक कूटनीतिक गतिरोध नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय हरित विकास नीतियों को और मजबूत करने का अवसर है। भारत अपने 'पंचामृत' संकल्पों के तहत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में अपनी घरेलू वित्तीय क्षमताओं के दम पर तेजी से क्रांति ला रहा है। पश्चिमी देशों की वित्तीय वादाखिलाफी के बावजूद भारत अपने तय समय से पहले ही अपने हरित ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने की ओर बढ़ रहा है, जो भारत की आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
पेरिस में घटे इस ऐतिहासिक घटनाक्रम ने भारत को दुनिया के नक्शे पर 'ग्लोबल साउथ' का एक सर्वमान्य और मजबूत नेता स्थापित कर दिया है। पश्चिमी मीडिया जहाँ इस विफलता का दोष सभी देशों पर डालने की कोशिश कर रहा है, वहीं दुनिया के अधिकांश देश भारत के न्यायसंगत और स्पष्ट रुख की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। भारत अब वैश्विक वित्तीय संस्थानों जैसे विश्व बैंक और आईएमएफ में बुनियादी सुधारों के लिए नए सिरे से अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की योजना बना रहा है, ताकि विकासशील देशों को उनका वाजिब हक मिल सके।
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