सरकार यह टीके यूआइपी यानी यूनिवर्सल इम्युनाईज़ेशन प्रोग्राम के तहत लगाती है. जो बच्चे इस टीकाकरण मुहिम में अभी भी बचे हुए हैं या छूट गए हैं या जिनका पूरा टीकाकरण नहीं हुआ है, उनके लिए सरकार ने दिसंबर 2019 में सघन मिशन इंद्रधनुष 2.0 की शुरुआत की है.
देश में निमोनिया से 2009-10 में 13,610 बच्चों की मौत हुई थी जो 2013-14 तक लगातार घटते हुए 7,116 पर आ गई और उसके बाद से इसमें लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. साल 2017-18 में यह आंकड़ा 16,282 था जो 2018-19 में 14,949 पर आ गया. 2019 अक्टूबर तक ही पांच साल की उम्र तक के 6,753 बच्चों की मौत निमोनिया की वजह से हो चुकी है.
अक्टूबर 2019 तक सबसे ज़्यादा मौतें मध्य प्रदेश में हुईं, जहां निमोनिया की वजह से पांच की उम्र के 957 बच्चों की मौत हो गई. सबसे ख़राब पांच राज्यों में मध्य प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र शामिल हैं.
देश भर में निमोनिया से होने वाली मौतों के आंकड़ों में 2013-14 में आई बढ़त सबसे ज़्यादा मध्य प्रदेश में दिखाई देती है. यहां 2013-14 में 551 बच्चों की मौत हुई जो 2009-10 के बाद से सबसे कम था पर 2018-19 में यह आंकड़ा 1,977 पर पहुंच गया.
“आंकड़ों में इस बढ़त के दो कारण हो सकते हैं. पहला यह कि समय के साथ तकनीक में सुधार आया है और अब ज़्यादा मौतें दर्ज की जा रही हैं, हो सकता है कि यह मौतें पहले भी हो रही थीं पर इनकी गिनती नहीं थी,” पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़, के कम्युनिटी मेडिसिन स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ की प्रोफ़ेसर डॉ. मधु गुप्ता ने इंडियास्पेंड को बताया.
“देश में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है और सभी जानते हैं कि हम कैसी हवा में सांस ले रहे हैं. वायु प्रदूषण निमोनिया का एक बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है, और वायु का ख़राब होता स्तर निमोनिया के बढ़ते मामलों का कारण हो सकता है,” डॉ. मधु गुप्ता ने कहा, उन्होंने बताया कि घरों के अंदर भी वायु प्रदूषण का स्तर लगातार ख़राब हो रहा है.
निमोनिया को रोकने के लिए सरकार ने दो मुख्य क़दम उठाए हैं--टीकाकरण और सांस अभियान.
नवंबर 2019 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निमोनिया से होनी वाली बच्चों की मौतों को रोकने के लिए सांस अभियान की शुरुआत की. सांस यानी सोशल अवेयरनेस एंड एक्शन टू न्यूट्रीलाइज़ निमोनिया सक्सेसफ़ुली.
सरकार के मुताबिक़ इस अभियान के तहत निमोनिया से सुरक्षा और सोच में बदलाव लाने के लिए टीवी, रेडियो, सोशल मीडिया, पोस्टर, बैनर, और स्वास्थ्य कर्मियों के ज़रिये समाज, माता-पिता और परिवारों तक जानकारी फैलाई जाएगी. अभियान के तीन मुख्य बिंदु हैं--बच्चों में निमोनिया के इलाज और प्रबंधन के दिशानिर्देश; स्वास्थ्य कर्मियों को कौशल विकास और निमोनिया पहचानने और निर्धारित प्रबंधन की ट्रेनिंग; और जागरूकता अभियान.
इस अभियान की शुरुआत इसी साल 16 नवंबर को हुई और यह मुहिम अभी अपने शुरूआती स्तर पर है, इसलिए इसकी सफ़लता के आंकड़े मौजूद नहीं हैं.
दूसरा अहम क़दम है निमोनिया को रोकने के लिए टीकाकरण, जिसमें मीज़ल्ज़ यानी खसरा, एचआइबी या हिमोफ़िलस इनफलुएंज़ा (बी) और पीसीवी यानी नियूमोकोकल कोन्जुगेट वैकसीन शामिल हैं.
NFHS-4 के 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार भारत के 12 से 23 महीने की उम्र के 38% बच्चों का पूर्ण टीकाकरण नहीं हुआ है. पूर्ण टीकाकरण यानी BCG और मीज़ल्ज़ का टीका और पोलियो और DPT के टीके की तीन ख़ुराक. 12 से 23 महीने की उम्र के 19% बच्चों को मीज़ल्ज़ का टीका नहीं लगा है. नियूमोकोकल कॉंजुगेट वैकसीन 2017 में ही शुरू हुई है. आइवीएसी के 2019 निमोनिया और डायरिया रिपोर्ट कार्ड के अनुसार एचआइबी-3 के टीके का कवरेज 89% है और पीसीवी-3 का कवरेज 6% है, जबकि लक्ष्य 90% का है.
इसी रिपोर्ट का कहना है कि भारत में 2017 में नियूमोकोकल कॉंजुगेट वैकसीन आने के बाद से काफ़ी सुधार आया है. हालांकि रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में भारत का निमोनिया से लड़ने के लिए लक्ष्य 84% था और भारत अभी 67% पर है.
डॉ. मधु ने बताया, “पीसीवी के इस्तेमाल को अभी कुछ ही समय हुआ है. निमोनिया की रोकथाम में इसका कितना फ़ायदा हुआ है या इसका कितना असर पड़ा है, यह कह पाना अभी बहुत जल्दी है.”
सरकार का कहना है कि आने वाले समय में देश के सभी बच्चों तक यह टीके पहुंचा कर निमोनिया जैसी बीमारी से लड़ा जा सकता है. इंडियास्पेंड की नवंबर 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़ आने वाले समय में भारत में टीकाकरण पर होने वाला ख़र्च तेज़ी से बढ़ने वाला है. अभी तक देश में हो रहे टीकाकरण का ख़र्च सरकार ने अकेले नहीं उठाया है. इसमें कई सारे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का आर्थिक योगदान रहा है. यह योगदान कम या ख़त्म होने पर टीकाकरण भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है.
डॉ. मधु ने बताया कि पीसीवी महंगा टीका है, इसके लिए पैसे की कमी रही है और यह सभी तक नहीं पहुंच पाया है. उन्होंने कहा, “पीसीवी का कवरेज काफ़ी कम है, यह महंगा टीका है और सरकार फ़िलहाल सिर्फ़ 6 राज्यों में ही इसे उपलब्ध करा रही है. हालांकि महंगी क़ीमत पर यह देशभर में उपलब्ध है. देशभर के बच्चों तक यह टीका पहुंचना ज़रूरी है लेकिन इसके लिए भारी बजट चाहिए. इसके बल्क प्रोडक्शन की भी ज़रूरत है, पर राज्य सरकारें इतना बड़ा ख़र्च उठाने में आनाकानी कर रही हैं.”
यह रिपोर्ट इंडियास्पेंड में प्रकाशित है. इस रिपोर्ट को हम यहां पुनः साभार प्रकाशित कर रहे हैं,