बलूचिस्तान में सेना का उत्पीड़न और सशस्त्र विद्रोह की प्रतिक्रिया (आवरण कथा)

संतु दास

 |  01 Apr 2025 |   10
Culttoday

बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना का उत्पीड़न और सशस्त्र विद्रोह एक गंभीर मामला है, जो पाकिस्तानी सेना के दमनकारी कृत्यों से उत्पन्न हुआ है। बलूचिस्तान, प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद, दशकों से राज्य के उत्पीड़न का सामना कर रहा है। पाकिस्तान की सेना ने बलूचिस्तान पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए अत्यधिक क्रूर और कठोर नीतियां अपनाई हैं, जिसके परिणामस्वरूप वहां के लोगों में असंतोष और विद्रोह पनपा है।


बलपूर्वक विलय और राजनीतिक उपेक्षा: बलूचिस्तान का पाकिस्तान में बलपूर्वक विलय वर्ष 1948 में हुआ। बलोच लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया गया, और स्वायत्तता की मांग को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया।


संसाधनों का शोषण और आर्थिक उपेक्षा: बलूचिस्तान में प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भंडार हैं, लेकिन इन संसाधनों का शोषण पाकिस्तानी सेना और केंद्र सरकार द्वारा किया जाता रहा है, जबकि बलूचिस्तान के लोगों को उनसे कोई लाभ नहीं मिला है।


सेना द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन: पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन किया है, जिसमें हजारों लोगों की हत्या कर दी गई है और कई अन्य लापता कर दिए गए हैं।
बलोच नेताओं की हत्या: सेना द्वारा बलूचिस्तान में कई प्रमुख बलोच नेताओं की हत्या की गई है, जिसने विद्रोह को और तीव्र कर दिया है।


नागरिक विद्रोह पर निर्मम कार्रवाई: पाकिस्तान की सेना ने न केवल सशस्त्र विद्रोहियों पर कार्रवाई की है, बल्कि नागरिक प्रतिरोध और प्रदर्शनों को भी क्रूरतापूर्वक दबाया है।
चीनी परियोजनाओं का सैन्यीकरण: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) बलूचिस्तान के लिए एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। सेना ने CPEC के तहत ग्वादर बंदरगाह के विकास के नाम पर बलूचिस्तान के क्षेत्रों का बड़े पैमाने पर सैन्यीकरण कर दिया है, जिसने असंतोष और विद्रोह की भावना को और बढ़ा दिया है।
पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए इन उत्पीड़नकारी कृत्यों के परिणामस्वरूप, बलूचिस्तान में सशस्त्र विद्रोह शुरू हो गया है। बलोच राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता संगठनों ने इस उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष शुरू कर दिया है, जिसमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA), बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी (BRA), और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) जैसे संगठनों ने सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व संभाला है।


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