Cult Current ई-पत्रिका आवरण कथा (फरवरी, 2025 ) : ट्रंप 2.0ः 'क्वाड' की भूमिका

संदीप कुमार

 |  01 Feb 2025 |   23
Culttoday

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति, सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीतियाँ समय के साथ विकसित होती हैं। भारत और अमेरिका के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में जो बदलाव आए हैं, उनमें ट्रंप प्रशासन के निर्णयों का महत्वपूर्ण स्थान है। खासतौर पर भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के बीच 'क्वाड' (Quad) पहल को लेकर यह विश्लेषण करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
जब ट्रंप प्रशासन के मार्को रुबियो ने अपनी विदेश मंत्री के रूप में पहली बैठक की, तो इस बैठक ने कई पहलुओं को उजागर किया, जिनसे यह साफ था कि 'क्वाड' को लेकर ट्रंप प्रशासन का दृष्टिकोण चीन की बढ़ती शक्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बेहद महत्वपूर्ण था। इस बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में, चार देशों ने समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय विकास की दिशा में एकजुट होने का संकेत दिया, साथ ही चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध किया।
क्वाड का उद्देश्य और इसका विकास
क्वाड का गठन 2007 में हुआ था, जब भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने भारतीय महासागर में 2004 के भूकंप और सुनामी के बाद मिलकर राहत कार्य किए थे। तब से यह समूह एक बहुपक्षीय मंच के रूप में विकसित हुआ, जिसमें विभिन्न वैश्विक मुद्दों जैसे आपातकालीन सहायता, जलवायु परिवर्तन, और समुद्री सुरक्षा पर सहकार्य की आवश्यकता महसूस की गई। हालांकि, क्षेत्रीय सुरक्षा, खासकर चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक ताकत, इस पहल का एक महत्वपूर्ण भाग बन चुकी है।
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर  ने इस पहल को लेकर अपनी स्पष्ट राय दी है। उनका मानना है कि भारत के लिए क्वाड में सहयोग करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल सैन्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय सहयोग को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने इस बारे में कई बार यह कहा कि भारत का हित इस बात में है कि वह न केवल एक शक्तिशाली सैन्य शक्ति बने, बल्कि एक प्रमुख वैश्विक सहयोगी के रूप में भी उभरे।
चीन के संदर्भ में भारत और अमेरिका का सहयोग
क्वाड का उद्देश्य चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करना है, खासकर दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे रणनीतिक स्थानों पर। ट्रंप प्रशासन के दौरान, अमेरिका ने भारत को एक आवश्यक सहयोगी के रूप में देखा। एस. जयशंकर ने इस पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारत को वैश्विक ताकतों के साथ रणनीतिक साझेदारी बनानी चाहिए, ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके।
ट्रंप ने चीन के प्रति अपनी कड़ी नीति को लेकर काफी स्पष्टता दिखाई थी। उन्होंने इसे 'आधिकारिक विरोधी' और 'खतरनाक' बताया था। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जो पहले चीन के प्रति बेहद आक्रामक रुख रखते थे, ने ट्रंप के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए चीन को एक गंभीर खतरे के रूप में देखा। उन्होंने चीन के मानवाधिकार उल्लंघन और उसके क्षेत्रीय दावे को लेकर कई बार कड़े बयान दिए।
भारत ने भी चीन की विस्तारवादी नीति का विरोध किया है, विशेषकर उसकी सीमा विवादों को लेकर। भारत-चीन सीमा पर तनाव और चीन का पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। इस संदर्भ में, भारत और अमेरिका का सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर उस स्थिति में जब दोनों देशों को अपने-अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी हो।
'अमेरिका फर्स्ट' नीति और भारत
ट्रंप की 'America First' नीति के तहत, अमेरिकी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना था। यह नीति विदेशों में अमेरिकी प्रभाव को बढ़ाने के लिए थी, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कई देशों के साथ संबंधों में असंतोष भी देखा गया। भारत के लिए, यह एक चुनौती थी, क्योंकि अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों में असंतुलन था और ट्रंप प्रशासन ने बार-बार व्यापार शुल्कों में वृद्धि की धमकी दी थी।
हालांकि, एस. जयशंकर ने इस स्थिति को संतुलित रूप से संभालने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारत अपने हितों की रक्षा करेगा, लेकिन अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत बनाए रखेगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अमेरिका के साथ रिश्तों को बढ़ाए और साथ ही अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखे।
भारत ने अमेरिका के 'America First' दृष्टिकोण को समझते हुए, न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक रूप से भी अमेरिका के साथ सहयोग को बढ़ावा दिया। भारतीय विदेश मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि भारत का उद्देश्य केवल चीन को लेकर अमेरिका के दृष्टिकोण से सहमति व्यक्त करना नहीं है, बल्कि वैश्विक मुद्दों पर भारतीय दृष्टिकोण को भी प्रस्तुत करना है।
क्वाड और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा
क्वाड का गठन चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए किया गया था। इस समूह के चार सदस्य देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि वे किसी भी एकतरफा कार्रवाई का विरोध करते हैं, जो क्षेत्रीय स्थिति को बलपूर्वक बदलने का प्रयास करती हो। यह बयान चीन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश था।
चीन ने क्वाड को लेकर कई बार यह आरोप लगाया कि यह एक 'एशियाई नाटो' बनाने का प्रयास है, जो कि एक गलतफहमी है। क्वाड कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि यह देशों के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। एस. जयशंकर ने इस पर अपनी राय दी कि भारत के लिए क्वाड का उद्देश्य शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना है, न कि किसी प्रकार के सैन्य संघर्ष को बढ़ावा देना।
भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते कूटनीतिक संबंध, विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन के तहत, क्वाड और दक्षिण एशिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। केवल भारत-अमेरिका के संबंधों पर बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुद्दों पर भी प्रकाश डालना आवश्यक है, जो दक्षिण एशिया के सुरक्षा, आर्थिक और कूटनीतिक समीकरणों में केंद्रीय स्थान रखते हैं।
क्वाड और पाकिस्तान-बांग्लादेश का संदर्भ
हालांकि, क्वाड के तहत सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग का उद्देश्य मुख्य रूप से चीन को चुनौती देना है, लेकिन इसका प्रभाव पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों पर भी पड़ता है, जो दक्षिण एशिया के राजनीतिक और सुरक्षा संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान की स्थिति हमेशा से क्वाड के दृष्टिकोण से विवादित रही है। पाकिस्तान, जो चीन का करीबी सहयोगी है, उसने कई बार यह आरोप लगाया है कि क्वाड का उद्देश्य चीन को घेरना और उसके खिलाफ एक नकारात्मक कूटनीतिक माहौल बनाना है। पाकिस्तान के लिए, यह सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति की एक चुनौती है, क्योंकि क्वाड की सैन्य और रणनीतिक रणनीतियाँ सीधे तौर पर पाकिस्तान की सुरक्षा नीति से टकराती हैं।
पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंध कभी सहज नहीं रहे हैं। पिछले ट्रंप प्रशासन के दौरान, पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया गया था, खासकर जब अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा। भारत के साथ अमेरिका का बढ़ता सहयोग पाकिस्तान को चिंता में डालता था, क्योंकि दोनों देशों का संबंध चीन और पाकिस्तान के गठजोड़ को चुनौती देता है। 
बांग्लादेश, जो भारत का एक प्रमुख पड़ोसी और मित्र राष्ट्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन बीते छह महीने के दौरान यह मैत्रीपूर्ण संबंध लगभग खत्म हो गये हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी है। बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति और इसके भीतर चल रही इस्लामिक कट्टरपंथी गतिविधियां न केवल बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू, बौद्ध और ईसाइयों को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि भारत के साथ संबंधों को भी प्रभावित करते हैं। इसकी वजह से आर्थिक विकास प्रक्रियाएँ, जो भारत-अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया-जापान के साथ सहयोग से बांग्लादेश में चल रही है, वह गहरे स्तर पर प्रभावित हुई हैं। बांग्लादेश ने चीन के साथ अपनी घनिष्ठ व्यापारिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के माध्यम से रणनीतिक रिश्ते बनाए हैं, जैसे कि चीन द्वारा बांग्लादेश में निवेश करना और बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत बांग्लादेश को शामिल करना। यह भारतीय हितों के खिलाफ है। बांग्लादेश का रुख अब तक क्वाड के प्रति तटस्थ रहा है, लेकिन भारत और अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्तों का असर बांग्लादेश की कूटनीतिक नीति पर भी हो सकता है। बांग्लादेश के लिए, एक ओर चीन के साथ संबंधों का महत्व है, वहीं दूसरी ओर भारत और अमेरिका के साथ अपने रिश्ते भी उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, साथ ही व्यापारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। बांग्लादेश पर देश में लोकतांत्रिक सरकार की बहाली के लिए वर्तमान अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनूस पर दबाब बनेगा। ट्रंप और यूनूस के बीच के संबंधों की तल्खियां मोहम्मद यूनूस के लिए मुश्किलें पैदा करने वाली हो सकती है।  
पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिका और भारत की नीति
पाकिस्तान के साथ भारत और अमेरिका दोनों का रुख काफी जटिल रहा है। भारत ने हमेशा पाकिस्तान से आतंकवाद और सीमा सुरक्षा मुद्दों पर आक्रामक प्रतिक्रिया दी है, जबकि अमेरिका ने पाकिस्तान को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा है। ट्रंप प्रशासन के तहत, अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवादियों की पनाहगाह के रूप में लगातार आलोचना की और पाकिस्तान से पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की उम्मीद की। ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा और आर्थिक सहयोग पर सवाल उठाए, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान के लिए अमेरिकी सहयोग में गिरावट आई।
भारत ने अमेरिका के साथ इस क्षेत्र में अपने संबंधों को बढ़ाने का फायदा उठाया और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अकेला किया। भारत की कूटनीति में यह साफ था कि पाकिस्तान से होने वाली किसी भी प्रकार की क्षेत्रीय चुनौती का मुकाबला करने के लिए उसे अमेरिका की मदद की आवश्यकता होगी।
 


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