बलूचिस्तान, जो कभी ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होकर फला-फूला, जल्द ही पाकिस्तान के क्रूर कब्जे का शिकार हो गया। 1948 में जबरन विलय के बाद से, बलोच लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पाकिस्तान की सरकार ने इस क्षेत्र का शोषण किया है, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है, और स्थानीय आबादी को बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा है। बलूचिस्तान की संपदा का उपयोग पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को समृद्ध करने के लिए किया जाता है, जबकि बलोच गांवों में अंधेरा रहता है। प्रतिरोध को दबाने के लिए सेना ने अत्याचार किए हैं, मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है, और असंतुष्टों को गायब कर दिया है। बलोच स्वतंत्रता का संघर्ष अब एक ज्वालामुखी बन गया है, जो कभी भी फट सकता है, जो एक स्वतंत्र राष्ट्र की आकांक्षा का प्रतीक है...
कल्ट करंट टीम ने यह कवर स्टोरी संजय श्रीवास्तव, श्रीराजेश, संदीप कुमार और मनोज कुमार की बहुमूल्य अंतर्दृष्टि और विशेषज्ञता से तैयार की है।
एक गंभीर प्रश्न विश्व पटल पर फिर से उभर रहा है, जो भले ही नया न हो, पर 11 मार्च 2025 की घटना के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है: क्या कोई सेना, जिसके पास एक राष्ट्र है, अब उस राष्ट्र की एकता और अखंडता को ही खंडित करने पर तुली हुई है? विडंबना यह है कि यही सेना अतीत में भी अपने राष्ट्र को विभाजित कर चुकी है। 1971 में, उसने ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं कि पाकिस्तान टूट गया, और पूर्वी पाकिस्तान ‘बांग्लादेश’ के रूप में एक नए राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया।
इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। 11 मार्च की घटना ने विश्व का ध्यान उस भूभाग की ओर आकर्षित किया, जो 77 वर्ष पूर्व, 11 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से स्वतंत्र हुआ था, और उसके चार दिन बाद अस्तित्व में आया था- पाकिस्तान। परंतु दुर्भाग्यवश, मात्र सात महीने सोलह दिन बाद, 27 मार्च 1948 को उस पर कब्जा कर लिया गया। हम बात कर रहे हैं बलूचिस्तान की, जिसे पाकिस्तान ने पिछले 77 वर्षों से बंधक बना रखा है।
पाकिस्तान की बेचैनी तब खुलकर सामने आई, जब बलूचिस्तान की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे सशस्त्र समूह, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाईजैक कर लिया। पाकिस्तानी सेना ने, हमेशा की तरह, अपने दावे पेश किए, जो अक्सर अविश्वसनीय लगते हैं। सेना ने दावा किया कि बचाव अभियान में 31 लोग मारे गए, जिनमें 23 पाकिस्तानी सैनिक, 3 रेलवे कर्मचारी और 5 निर्दोष यात्री शामिल थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि मौके पर 33 बीएलए लड़ाकों को मार गिराया गया। वहीं, ट्रेन हाईजैक के दौरान 214 सेना के जवानों को अपने साथ पहाड़ों में ले जाने वाले बीएलए ने उन्हें मार देने की जिम्मेदारी ली।
सत्य क्या है और झूठ क्या, यह मीडिया में आई खबरों से ही स्पष्ट हो जाता है। इस घटना के बाद, सेना और पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि वे इन सशस्त्र गुटों से कोई बात नहीं करेंगे, बल्कि बलूचिस्तान आंदोलन को शांतिपूर्वक संचालित करने वाले लोगों से संवाद कर मामले का शांतिपूर्ण समाधान निकालेंगे।
हालांकि, बलूचिस्तान आंदोलन में महरंग बलोच एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। मार्च के तीसरे सप्ताह के अंत में, उनके नेतृत्व में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहा था, तभी पाकिस्तानी पुलिस (जिसके पीछे सेना का हाथ बताया जाता है) ने न केवल लाठीचार्ज किया, बल्कि गोलियां भी चलाईं। इस घटना में तीन लोग मारे गए, जिनमें एक 12 वर्षीय नाबालिग भी शामिल था। महरंग बलोच को गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया। यह घटनाक्रम बलूचिस्तान में जारी संघर्ष की जटिलताओं और मानवीय त्रासदी को दर्शाता है, और सवाल उठाता है कि क्या शांतिपूर्ण विरोध को दबाकर समस्या का समाधान किया जा सकता है।
1971 के हालात से समानताएं स्पष्ट हैं। जिस प्रकार टिक्का खान ने बंगालियों का दमन किया, उसी प्रकार आज सेना प्रमुख आसिम मुनीर की सरपरस्ती में बलूचों का दमन किया जा रहा है। हालांकि, अकेले आसिम मुनीर को ही दोषी ठहराना उचित नहीं है। पाकिस्तान सेना ने आरंभ से ही बलूचों का दमन किया है।
पिछले कुछ दशकों में बलूचिस्तान में बलोच राष्ट्रवाद का उदय हुआ है। बलोच लोगों ने अपनी आजादी और अधिकारों के लिए संगठित रूप से संघर्ष करना शुरू कर दिया है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) जैसे संगठन सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व कर रहे हैं। अब तो बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा के कई सशस्त्र गुटों ने मिलकर “ब्रास” नामक एक संगठन बना लिया है। उनका मुख्य उद्देश्य बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाना है, जो पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों से मुक्त हो।
जाफर एक्सप्रेस का अपहरण इसी संघर्ष का एक हिस्सा है। यह घटना प्रतीकात्मक है, जो यह दर्शाती है कि बलूचिस्तान को जबरन कब्जे में रखा गया है और वहां के लोग 77 वर्षों से बंधक बने हुए हैं। विद्रोही संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान की सरकार ने बलूचिस्तान की स्वायत्तता को समाप्त कर दिया है और वहां के लोगों को उनके प्राकृतिक अधिकारों से वंचित कर रखा है।
पाकिस्तान की सरकार ने बलूचिस्तान में राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने का हर संभव प्रयास किया है। बलूचिस्तान के नेताओं को अक्सर गिरफ्तार किया जाता है, और कई बार उन्हें ‘लापता’ कर दिया जाता है। बलूचिस्तान के प्रमुख राजनीतिक दलों को चुनाव में भाग लेने से रोका जाता है, और सेना बलूचिस्तान की राजनीतिक गतिविधियों पर पूरी तरह से नियंत्रण रखती है। “गायब” किए गए लोगों की कहानियां बलूचिस्तान में आम हैं, जो पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों की गवाही देती हैं।
बलोच नेताओं का कहना है कि पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान को सिर्फ एक संसाधन स्रोत के रूप में देखा है और वहां के लोगों की भलाई के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं। कई बार बलूचिस्तान में राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए सेना और सरकार ने मिलकर कड़े कानून बनाए हैं, जिनसे स्थानीय जनता का दमन होता है।
बलूचिस्तान का संघर्ष न सिर्फ पाकिस्तान के लिए एक चुनौती है, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। बलूचिस्तान की जनता आजादी के लिए लड़ रही है, और इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है।
पाकिस्तान सरकार को बलूचिस्तान की समस्याओं का समाधान निकालना होगा। वहां की जनता को उनके बुनियादी अधिकार देने होंगे। बलूचिस्तान की जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों का लाभ मिलना चाहिए। यदि पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान के प्रति अपनी नीति में बदलाव नहीं करती, तो यह संघर्ष और भी विकराल रूप ले सकता है।
बलूचिस्तान का संघर्ष 77 वर्षों से चल रहा है, और यह संघर्ष केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बलोच लोगों के अस्तित्व, उनकी पहचान और उनके अधिकारों का प्रश्न है। जाफर एक्सप्रेस का अपहरण इस बात का प्रतीक है कि बलूचिस्तान अब और भीषण संघर्ष के लिए तैयार है। बलोच लोगों की मांगें जायज हैं, और उन्हें उनका हक मिलना चाहिए।
बलूचिस्तान के दर्द की दास्तां को समझने के लिए, हमें अतीत में जाकर उन घटनाओं से गुजरना होगा, जिन्होंने बलूचिस्तान को आज इस स्थिति में ला खड़ा किया है। यह संघर्ष केवल वर्तमान का परिणाम नहीं है, बल्कि दशकों के अन्याय और उपेक्षा का परिणाम है।
ब्रिटिश शासन से मुक्ति के बाद, बलूचिस्तान ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। बलोच लोग अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा और समृद्ध परंपराओं पर गर्व करते थे। जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया, तो बलूचिस्तान ने अपनी संप्रभुता बनाए रखने की इच्छा व्यक्त की। दुर्भाग्यवश, यह स्वतंत्रता मात्र सात महीने और सोलह दिनों तक ही टिक पाई। पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान पर आक्रमण किया और उसे जबरन पाकिस्तान में शामिल कर लिया। तब से लेकर आज तक, बलूचिस्तान अपनी खोई हुई स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से, बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो पाकिस्तानी क्षेत्र का 44% हिस्सा कवर करता है। हालांकि, इसकी आबादी अपेक्षाकृत कम है, लगभग 1.5 करोड़। बलूचिस्तान की सीमाएं समुद्र, ईरान और अफगानिस्तान से मिलती हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो सदियों से संघर्ष, प्रतिरोध और स्वतंत्रता की अटूट भावना का प्रतीक रहा है।
आज जो बलूचिस्तान खंडहरों सा दिखता है, कभी वहां संपन्नता की पराकाष्ठा थी। इतिहास के पन्नों में दबी यह भूमि उन प्राचीन सभ्यताओं की गवाह है, जिन्होंने मानव इतिहास को आकार दिया। विश्व में खेती करने के सबसे पुराने साक्ष्य इसी क्षेत्र में पाए गए हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि यहाँ कभी जीवन और समृद्धि का अथाह सागर लहराता था।
बलूचिस्तान के बालाकोट के पास, मेहरगढ़ क्षेत्र में हुए उत्खनन ने हड़प्पा से भी पुरानी सभ्यता के अवशेषों को उजागर किया है। इसने साबित कर दिया कि बोलन नदी के किनारे हजारों साल पहले एक विकसित सभ्यता की बसावट थी, जो अपनी वास्तुकला, संस्कृति और जीवनशैली में बेजोड़ थी।
लेकिन यह समृद्धि हमेशा के लिए नहीं थी। इतिहास के क्रूर हाथों ने बलूचिस्तान की किस्मत को बदल दिया। 711 ईस्वी में, जब मुहम्मद-बिन-कासिम ने इस क्षेत्र पर आक्रमण करना शुरू किया, तो हिंदू-बौद्ध संस्कृति से समृद्ध यह इलाका धीरे-धीरे इस्लामी प्रभाव में आ गया। सदियों तक, बलूचिस्तान विदेशी शासकों के अधीन रहा, जिसकी संस्कृति और पहचान समय के साथ बदलती रही।
अकबर के शासनकाल में, बलूचिस्तान मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गया। लेकिन 1637 में, मुगलों ने इस क्षेत्र को फारस (ईरान) को सौंप दिया। बाद में, 1747 में, कलात के मीर नासिर खान ने अफगान शासन को स्वीकार कर लिया। बलूचिस्तान, एक शतरंज की बिसात की तरह, साम्राज्यों के बीच अपनी पहचान के लिए संघर्ष करता रहा।
यह एक दिलचस्प विरोधाभास है कि रहमत अली ने पाकिस्तान की कल्पना करते हुए, इस मुस्लिम राष्ट्र के नाम में जो ‘स्तान’ जोड़ा, उसकी प्रेरणा बलूचिस्तान से ही मिली थी। लेकिन विडंबना यह है कि जिस दिन पाकिस्तान स्वतंत्र हुआ, उस दिन उसके नक्शे में बलूचिस्तान का कोई जिक्र नहीं था। इसकी कल्पना भी नहीं की गई थी, और प्रस्तावित नाम में भी इसका उल्लेख नहीं था। बलूचिस्तान तो पाकिस्तान को आज़ादी मिलने से तीन दिन पहले ही, 11 अगस्त 1947 को आज़ाद हो गया था।
कलात... बलूचिस्तान के प्रमुख शहरों में से एक, क्वेटा से केवल नब्बे मील की दूरी पर स्थित एक घनी आबादी वाला शहर है। मजबूत दीवारों के भीतर बसे इस शहर का इतिहास दो-ढाई हजार वर्ष पुराना है। कुजदर, गंदावा, नुश्की और क्वेटा जैसे शहरों में जाने के लिए कलात शहर को पार करना पड़ता था, इसलिए इस शहर का एक विशिष्ट सामरिक महत्व था। यह बलूचिस्तान के हृदयस्थल में बसा एक ऐसा शहर है, जो सदियों से इस क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति का केंद्र रहा है।
कलात शहर, जिसकी विशाल दीवारों के मध्य एक भव्य हवेली स्थित थी, बलूचिस्तान की राजनीति का केंद्र था। इस हवेली में खानों का “राजभवन” स्थित था, जहाँ 11 अगस्त 1947 को मुस्लिम लीग, ब्रिटिश सरकार के रेजिडेंट और कलात के मीर अहमद यार खान के बीच एक महत्वपूर्ण संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस संधि के परिणामस्वरूप, कलात एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया।
कलात के साथ ही, मीर अहमद यार खान का वर्चस्व लास बेला, मकरान और खारान जैसे पड़ोसी क्षेत्रों पर भी था। इसलिए, भारत की स्वतंत्रता और पाकिस्तान के निर्माण से पहले ही, इन सभी भागों को मिलाकर, मीर अहमद यार खान के नेतृत्व में एक बलूचिस्तान राष्ट्र का निर्माण हो गया।
बलूचिस्तान के बलोच लोगों ने न तो पहले कभी पाकिस्तान में शामिल होने के बारे में सोचा था, न ही आज उनकी वैसी मानसिकता है। बलूचिस्तान स्वतंत्र देश बनना चाहता था, और वह बना भी। यह एक ऐसा सपना था जो सदियों से उनके दिलों में बसा था।
लेकिन बलूचिस्तान की यह स्वतंत्रता पाकिस्तान को रास नहीं आई। आखिरकार, कलात की स्वतंत्रता के सात महीने और सोलह दिन बाद, 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल अकबर खान ने इस छोटे से देश पर बलात कब्जा कर लिया। पिछले साढ़े सात महीनों में, यह छोटा सा देश अपनी सेना की जमावट भी ठीक से नहीं कर सका था। इसलिए प्रतिरोध ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाया, और पाकिस्तान ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस प्रदेश को अपने कब्जे में ले लिया।
मार्च 1948 में बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का कब्जा होते ही विरोध के स्वर बुलंद होने लगे। कलात के अहमद यार खान ने तो पाकिस्तानी कब्जे का ज्यादा विरोध नहीं किया, परंतु उनके भाई राजकुमार अब्दुल करीम ने जुलाई 1948 में पाकिस्तान के इस जबरन कब्जे के विरोध में विद्रोह कर दिया। अपने अनुयायियों के साथ वह अफगानिस्तान चले गए। तत्कालीन अफगान सरकार बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग करके उसे अपने कब्जे में लेना चाहती थी, क्योंकि उन्हें समुद्री बंदरगाह (सी पोर्ट) नहीं मिला था और बलूचिस्तान के पास समंदर था।
लेकिन राजकुमार अब्दुल करीम को अफगान सरकार से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। अंततः लगभग एक वर्ष के बाद, राजकुमार करीम ने पाकिस्तानी सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा झटका था।
बलूचिस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन में एक जबरदस्त नाम उभरा - नवाब नौरोज़ खान। जब कलात रियासत को समाप्त कर उसका पूर्णतः पाकिस्तान में “वन यूनिट” पॉलिसी के अंतर्गत विलय किया गया, तो नवाब नौरोज़ खान ने पाकिस्तान का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पाकिस्तानी सरकार के विरोध में गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। वे नहीं चाहते थे कि अन्य राज्यों की तरह बलूचिस्तान पर भी पाकिस्तान का नियंत्रण हो। नवाब नौरोज़ खान बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के प्रतीक बन गए, और उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया।
लेकिन कुछ ही महीनों बाद, 15 मई 1951 को, नवाब नौरोज़ खान को पाकिस्तानी सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा। पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें और उनके सभी साथियों को माफी का आश्वासन दिया था। लेकिन अपनी फितरत के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार ने अपना ही वचन तोड़ दिया। नवाब के रिश्तेदारों और 150 वफादार सैनिकों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अंततः 15 जुलाई को इस विद्रोह के पांच नेताओं को फांसी पर लटकाकर मार डाला गया। नवाब नौरोज़ खान उम्रदराज हो चुके थे, इसलिए उन्हें बख्श दिया गया। लेकिन पांच साल बाद, नवाब साहब कोहलू की जेल में ही चल बसे। उनकी मृत्यु के साथ, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की एक और लौ बुझ गई।
पाकिस्तान सरकार को लगा कि इस विद्रोह की चिंगारी भी इसी के साथ समाप्त हो जाएगी। लेकिन उनकी यह सोच गलत साबित हुई। बलूचिस्तान के लोगों के दिलों में स्वतंत्रता की ज्वाला धधकती रही।
पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान की स्थिति का आकलन करते हुए, वहां संवेदनशील इलाकों में सैनिक अड्डे तैयार करवाने का काम शुरू किया। इस कार्रवाई से स्वतंत्र बलूचिस्तान के समर्थक खौल उठे। उनके नेता शेर मोहम्मद बिजरानी ने 72,000 किलोमीटर के क्षेत्र में अपने गुरिल्ला लड़ाकों के अड्डे खड़े किए। बलूचिस्तान में गैस के अनेक भंडार हैं, और ये विद्रोही नेता चाहते थे कि पाकिस्तान सरकार इन गैस भंडारों से मिलने वाली कुछ आमदनी कबीलाई नेताओं के साथ भी साझा करे। यह लड़ाई छह साल चली, लेकिन अंत में बलूचिस्तान की स्वतंत्रता चाहने वाले विद्रोही सैनिक थक गए, और राष्ट्रपति याह्या खान के साथ युद्धविराम के लिए राजी हो गए। शांति की यह झलक क्षणिक थी, क्योंकि संघर्ष के बीज अभी भी जमीन में दबे हुए थे।
1970 के इन चुनावों में, जहां पूर्व पाकिस्तान में शेख मुजीबुर्र रहमान की अवामी लीग प्रचंड बहुमत से विजयी रही, वहीं पश्चिमी पाकिस्तान में जुल्फिकार भुट्टो की पीपीपी लगभग सभी प्रांतों में जीत हासिल करने में सफल रही – सिवाय बलूचिस्तान और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स के। बलूचिस्तान में नेशनल अवामी पार्टी जीती, जो स्वतंत्रतावादी बलूचों की पार्टी थी। राष्ट्रीय असेंबली की 300 में से शेख मुजीबुर्र रहमान की अवामी लीग ने 167 सीटें जीतीं, जबकि भुट्टो की पार्टी को मात्र 71 सीटें मिलीं।
1971 पाकिस्तान के इतिहास का एक अत्यंत अशांत वर्ष था। इस वर्ष के अंत तक, पाकिस्तान दो भागों में विभाजित हो गया, और ‘बांग्लादेश’ के रूप में एक नए राष्ट्र का उदय हुआ, जो पहले ‘पूर्वी पाकिस्तान’ के नाम से जाना जाता था। पाकिस्तान के टूटने की त्रासदी ने बलूचिस्तान के लोगों के दिलों में स्वतंत्रता की उम्मीद को और भी प्रबल कर दिया।
बचे हुए पाकिस्तान में, जनरल याह्या खान को बलूचिस्तान में ‘नेशनल अवामी पार्टी’ की जीत नागवार गुजरी। उन्हें यह आशंका थी कि बलोच लोग, ईरान के साथ मिलकर एक बड़ा संघर्ष खड़ा करने वाले हैं।
बांग्लादेश की गलती से सबक न लेते हुए, पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में भी वही क्रूर रणनीति अपनाई – भीषण अत्याचार! बलूचिस्तान की ओर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए गए। बलूचिस्तान के कुछ क्षेत्रों में, जहां पाकिस्तानी सेना को बलोच विद्रोहियों के अड्डे होने का संदेह था, हवाई हमले भी किए गए। अनेक स्थानों पर बलोच विद्रोही और पाकिस्तानी सेना के बीच भीषण संघर्ष हुआ। हजारों की संख्या में दोनों तरफ के लोग मारे गए। अनेक विद्रोही बलोच नेता अफगानिस्तान पहुंचने में सफल रहे।
इस भयानक अत्याचार, दमन और संघर्ष के बाद, बलोच स्वतंत्रता आंदोलन में एक क्षणिक ठहराव आया। लेकिन इस ठहराव ने एक नए रूप को जन्म दिया – संगठित सशस्त्र आंदोलन – बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए)। बीएलए का उदय बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी।
बलूचिस्तान के लोगों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार ने उनके संसाधनों का शोषण किया है और उन्हें राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा है। यह एक ऐसी शिकायत है जो दशकों से बलूचिस्तान के लोगों के दिलों में घर कर गई है।
बलूचिस्तान की संपदा का मुख्य उपयोग पाकिस्तान की सेना और सरकार ने किया है। यह क्षेत्र पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांतों में से एक है, और इसकी प्राकृतिक संपदा का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इसका लाभ स्थानीय जनता को नहीं मिलता। यहां के लोग अभी भी बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
बलूचिस्तान की प्राकृतिक गैस का शोषण कर पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को समृद्ध किया गया है, लेकिन बलूचिस्तान के गांवों और शहरों में अंधेरा छाया रहता है। वहां की जनता जब भी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती है, उसे सेना के अत्याचारों का सामना करना पड़ता है।
बलूचिस्तान की वास्तविक समस्याओं को समझने और उनका समाधान निकालने के लिए जब तक पाकिस्तान की सरकार और सेना तैयार नहीं होती, तब तक बलूचिस्तान की जनता का संघर्ष जारी रहेगा। हालांकि वर्तमान कार्रवाइयां यही संकेत देती हैं कि सरकार क्या करेगी, जो सेना की कठपुतली है, और सेना का रवैया समस्या के समाधान की दिशा में बढ़ने के बजाय विपरीत दिशा की ओर अग्रसर है। महरंग बलोच की हालिया गिरफ्तारी इसका प्रमाण है। ऐसे में स्वयं सेना ही अपने मुल्क को फिर से तोड़ने की जमीन तैयार करती हुई दिखती है।
जाफर एक्सप्रेस, मात्र एक ट्रेन का अपहरण नहीं था, यह एक स्वतंत्र राष्ट्र की स्वतंत्रता की पुकार थी, जिसे सुनना और समझना अब आवश्यक हो गया है। बलूचिस्तान एक ज्वालामुखी है, जो कभी भी फट सकता है, और दुनिया को इसके परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह एक चेतावनी है, और इस चेतावनी को अनदेखा करना भारी भूल साबित हो सकता है।