बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता - एक गंभीर खतरा

संदीप कुमार

 |  01 Mar 2025 |   19
Culttoday

बांग्लादेश, अपनी संघर्षपूर्ण स्वतंत्रता और जटिल राजनीतिक इतिहास के साथ, वर्तमान में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। देश की राजनीतिक व्यवस्था, जो लंबे समय से अवामी लीग (AL) और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के बीच द्विदलीय प्रतिस्पर्धा से परिभाषित रही है, विभिन्न आंतरिक और बाहरी कारकों के अभिसरण से उत्पन्न गहरे संकट का सामना कर रही है। यह संकट, राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक चुनौतियों, कट्टरपंथीकरण के बढ़ते खतरे और बाहरी हस्तक्षेप की संभावना से उपजा है, जो न केवल बांग्लादेश की स्थिरता को खतरे में डालता है बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देशों के लिए भी गंभीर सुरक्षा निहितार्थ रखता है।
बांग्लादेश की वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता, जिसके अंतर्निहित कारणों, संभावित परिणामों और भारत के लिए निहितार्थों की पड़ताल आवश्यक है। यह पड़ताल देश में बढ़ती कट्टरता, बांग्लादेश की सेना के विस्तार, आर्थिक संकट और बाहरी हस्तक्षेप के बढ़ते खतरे जैसे प्रमुख पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करता है।
बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख दलों, अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच गहन ध्रुवीकरण से त्रस्त है। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग, बांग्लादेश की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का प्रतिनिधित्व करती है और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और आर्थिक विकास पर जोर देती है। दूसरी ओर, खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, बांग्लादेशी राष्ट्रवाद और इस्लामिक मूल्यों को बढ़ावा देती है और अक्सर अवामी लीग की नीतियों का विरोध करती है।
इन दोनों दलों के बीच प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और संस्थानों के राजनीतिकरण का कारण रही है। हाल के वर्षों में, बांग्लादेश में एक नई राजनीतिक शक्ति के उदय की संभावना दिखाई दी है, जिसके समर्थन में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह आरोप लगाया गया है कि यूनुस ने अमेरिका के पिछले प्रशासन से वादा किया था कि वह एक नई पार्टी का गठन करेंगे जो अमेरिका के प्रति वफादार रहेगी। हालांकि, यह प्रयास अभी तक सफल नहीं हुआ है और आलोचकों का मानना है कि यह बांग्लादेश की राजनीतिक वास्तविकताओं से अनभिज्ञता और बाहरी समर्थन पर अत्यधिक निर्भरता का परिणाम है।
बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, जो देश की धर्मनिरपेक्ष नींव के लिए एक गंभीर खतरा है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ इन तत्वों के संपर्क लगातार बने हुए हैं, और वे चुपचाप हथियार मंगवा रहे हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।
चिटगांव हिल ट्रैक्स जैसे क्षेत्रों में हिंसा बढ़ी है, जो जातीय और धार्मिक तनाव से ग्रस्त है। यह आशंका जताई जा रही है कि बांग्लादेश की सेना भी कट्टरपंथी तत्वों के साथ मिलकर काम कर सकती है, जिससे स्थिति और भी जटिल हो जाएगी। कट्टरपंथी समूहों का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश की सीमा पर अशांति फैलाना और भारत की सुरक्षा को खतरे में डालना है।
बांग्लादेश इस समय अपनी सैन्य क्षमता का भी विस्तार कर रहा है। यह सवाल उठता है कि बांग्लादेश को सैन्य शक्ति बढ़ाने की जरूरत क्यों है? बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि उसकी म्यांमार या किसी अन्य देश से युद्ध की संभावना है। इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बांग्लादेश अपनी सीमा पर भारत से किसी संभावित कार्रवाई का डर महसूस कर रहा है। इस डर के चलते बांग्लादेश ने ड्रोन, टैंक्स और असॉल्ट वेपंस जैसी चीजों की मांग की है।
सेना के विस्तार का एक और संभावित कारण आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना हो सकता है। बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों के बढ़ते प्रभाव और राजनीतिक अस्थिरता के कारण, सरकार को सेना को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस हो सकती है ताकि कानून और व्यवस्था बनाए रखी जा सके।
बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब हो चुकी है। वैश्विक आर्थिक संकट, ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि और भ्रष्टाचार के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव है। इसके साथ ही, शेख हसीना की सरकार भी अब दबाव में है। बांग्लादेश की राजनीति में आवामी लीग और BNP दोनों ही दलों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। यूनुस और उनके समर्थक स्टूडेंट लीडर्स इस तनाव को और बढ़ा रहे हैं।
आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के कारण बांग्लादेश में सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के कारण लोग सरकार से निराश हैं। इसके चलते बांग्लादेश में धीरे-धीरे विरोध प्रदर्शन और आंदोलन की स्थिति उत्पन्न हो रही है। यह आशंका जताई जा रही है कि बांग्लादेश के अंदरूनी हालात और बिगड़ सकते हैं, जिससे वहां की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
बांग्लादेश की यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता का विषय बन गई है। अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और अन्य देशों के बांग्लादेश में अपनी-अपनी भूमिका निभाने के संकेत मिल रहे हैं। खासकर पाकिस्तान की भूमिका इसमें बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। पाकिस्तान, जो खुद आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए कुख्यात है, बांग्लादेश में भी यही रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है। यह स्थिति भारत के लिए बेहद चिंताजनक है, क्योंकि बांग्लादेश में पाकिस्तानी प्रभाव बढ़ने से भारत की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।
चीन भी बांग्लादेश में अपनी आर्थिक और राजनीतिक उपस्थिति बढ़ा रहा है। चीन बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भारी निवेश कर रहा है और बांग्लादेश की सेना को हथियार बेच रहा है। अमेरिका बांग्लादेश में लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने का दावा करता है, लेकिन कुछ आलोचकों का मानना है कि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश में चीन के प्रभाव को कम करना है।
भारत और बांग्लादेश के बीच एक लंबी सीमा है, और बांग्लादेश में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर भारत पर पड़ता है। बांग्लादेश में जब भी कोई बड़ा संकट आता है, तो लोग भारत की सीमा की ओर पलायन करने लगते हैं। पहले भी भारत में लाखों बांग्लादेशी शरणार्थियों का पलायन हो चुका है, जिनकी संख्या अब करीब 2 करोड़ हो गई है। इससे भारत को सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
बांग्लादेश में कट्टरपंथी शासन स्थापित होने से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में शरणार्थियों का बड़ा influx हो सकता है, जो वहां की सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों का प्रभाव बढ़ने से भारत में आतंकवादी गतिविधियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह बांग्लादेश की स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखे। अगर बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों का प्रभाव और बढ़ता है, तो भारत को अपनी सीमा की सुरक्षा और बढ़ानी पड़ेगी। यही कारण है कि अजीत डोभाल जैसे वरिष्ठ अधिकारी बांग्लादेश सीमा पर दौरे कर रहे हैं। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश की स्थिति का आकलन करना और भारतीय सुरक्षा बलों को संभावित खतरों के लिए तैयार करना है।
भारत के लिए यह भी जरूरी है कि वह बांग्लादेश की आंतरिक स्थिति में सीधे हस्तक्षेप न करे, लेकिन अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करे। अगर बांग्लादेश में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो भारत को अपनी सीमाओं पर कड़ी निगरानी रखनी होगी। इसके साथ ही, बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक संबंधों को भी मजबूत बनाए रखना भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
यह आरोप लगाया गया है कि मोहम्मद यूनुस और उनके समर्थक एक नए तालिबान की तरह शासन प्रणाली स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रयास में यूनुस ने एक रेडिकलाइज्ड मॉब और जेल से रिहा किया है और इन कट्टरपंथियों को प्रस्तावित नई पार्टी में शामिल किया जा रहा है, जिनका उद्देश्य है देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करके मोबोकरेसी (जनता के नाम पर हिंसक शासन) की स्थापना करना।
यह कहा जा रहा है कि यूनुस एक ऐसे सिस्टम की स्थापना करना चाहते हैं जहां ईरान के सुप्रीम लीडर खुनैवी की तरह वह खुद शासन करेंगे और उनके नीचे कुछ खास छात्र प्रोटेस्टर्स होंगे, जो मंत्रियों और प्रधानमंत्री के रूप में काम करेंगे। इसके साथ ही उनके समर्थक रेडिकलाइज्ड मॉब का गठन करेंगे, जो देश में हिंसा और अराजकता फैलाने के लिए तैयार रहेंगे। यह पूरी योजना लोकतांत्रिक व्यवस्था को नष्ट करने और शक्ति के माध्यम से शासन करने की ओर इशारा करती है।
यह भी आरोप है कि यूनुस के विरोधियों को हिंसा के जरिए चुप कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, घरों में आगजनी की जा रही है, और राजनैतिक नेताओं को देश से बाहर भागने पर मजबूर किया जा रहा है। आलोचकों का मानना है कि यूनुस की योजना एक 'नया अफगानिस्तान' और 'नया तालिबान' बनाने की है। तालिबान की तरह ही ये लोग भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर एक रेडिकल शासन प्रणाली स्थापित करना चाहते हैं।
बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति बेहद गंभीर है और इसके भारत पर भी गहरे प्रभाव पड़ सकते हैं। बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, पाकिस्तानी हस्तक्षेप और आर्थिक संकट ने वहां की राजनीतिक स्थिरता को कमजोर कर दिया है। भारत को अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सतर्क रहना होगा, और इस पूरे परिदृश्य पर करीबी नजर बनाए रखनी होगी।
यह स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश में मौजूदा समय में गंभीर संकट पैदा हो रहा है, जिसमें रेडिकलाइज्ड समूह लोकतांत्रिक प्रणाली को ध्वस्त करने और सांप्रदायिक कट्टरता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा, यह स्थिति भारत के लिए भी एक बड़ा खतरा बन सकती है, जिससे शरणार्थी संकट और सीमाओं पर अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है।
भारत को बांग्लादेश में लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए। साथ ही, भारत को बांग्लादेश के साथ आर्थिक सहयोग को मजबूत करना चाहिए ताकि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके। अंत में, भारत को अपनी सीमा सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए ताकि बांग्लादेश में अस्थिरता का भारत पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। बांग्लादेश की स्थिति जटिल और बहुआयामी है, और भारत को एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि अपने हितों की रक्षा करते हुए बांग्लादेश की स्थिरता में योगदान किया जा सके।


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