कठपुतली की डोरः अमेरिका का यूरोप पर शिकंजा
संदीप कुमार
| 02 Mar 2025 |
19
हाल ही में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन ने यूरोप और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव को उजागर किया, जिससे कई विश्लेषण और टिप्पणियाँ सामने आईं। हालांकि, इन बयानों और चर्चाओं के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है: यूरोप के नेता रूस से अधिक अमेरिका की शक्ति से भयभीत हैं। यह भय केवल सतही नहीं है, बल्कि इस डर के पीछे कई ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक कारक काम कर रहे हैं, जो यूरोप और अमेरिका के संबंधों को गहराई से प्रभावित करते हैं।
यूरोप के राजनीतिक नेताओं द्वारा बार-बार उठाई जाने वाली अमेरिकी परित्याग की आशंका महज एक दिखावा है। यह एक रणनीतिक नाटक है, जो उनके वास्तविक डर को छिपाने के लिए खेला जा रहा है। यूरोप की वास्तविकता यह है कि उसकी भू-राजनीतिक स्थिति उसकी अपनी ताकत से नहीं, बल्कि अमेरिका और रूस के बीच संघर्ष के केंद्र में होने से उत्पन्न होती है। अमेरिकी परमाणु हथियारों की यूरोप में मौजूदगी, हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती और नाटो की निरंतर उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगियों को छोड़ने का कोई इरादा नहीं रखता। यह सब अमेरिका की यूरोप पर गहरी पकड़ को दर्शाता है।
यूरोपीय नेताओं का दिखावटी डर
यूरोपीय नेताओं का यह रवैया एक अमेरिकी लोककथा 'ब्रदर रैबिट' की कहानी से मिलता-जुलता है, जिसमें खरगोश ब्रदर फॉक्स से कहता है, 'कुछ भी कर लो, बस मुझे कांटों की झाड़ियों में मत फेंको,' जबकि वह जानता है कि वही झाड़ियां उसके लिए सबसे सुरक्षित स्थान हैं। इसी प्रकार, यूरोपीय नेता सार्वजनिक रूप से अमेरिकी अलगाव से डरने का प्रदर्शन करते हैं, जबकि गुप्त रूप से यह जानते हैं कि अमेरिका कभी उन्हें असल में नहीं छोड़ेगा।
यह नाटक यूरोप के विभिन्न देशों में बार-बार दोहराया जाता है। जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों के नेता नियमित रूप से अमेरिकी हस्तक्षेप और उसकी पकड़ से नाखुशी जताते हैं, लेकिन उनके वास्तविक डर का कारण रूस नहीं, बल्कि यह है कि अमेरिका कहीं उनकी नाराजगी को गंभीरता से लेकर उन्हें वह स्वतंत्रता न दे दे जिसकी वे केवल दिखावटी रूप से मांग कर रहे हैं।
युद्ध के लिए इच्छाशक्ति की कमी
जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे बड़े यूरोपीय देशों के पास रूस के साथ सैन्य टकराव में उतरने की कोई वास्तविक इच्छा नहीं है। उनके नागरिक भी इस प्रकार के युद्ध में कोई रुचि नहीं रखते। पिछली सदी के शुरुआती दशकों की तरह जनता में किसी बड़े युद्ध के लिए उत्साह नहीं है। यहां तक कि पोलैंड, जो अक्सर रूस विरोधी बयानबाजी में सबसे आगे रहता है, भी इस बात से वाकिफ है कि उसके नागरिक लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में उलझना नहीं चाहते।
पोलैंड जैसे देशों की भले ही हॉकिश (युद्धोन्मुख) बयानबाजी हो, लेकिन वे भी जानते हैं कि उनकी जनता व्यापक सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है। कुछ हजार भाड़े के सैनिकों की यूक्रेन में तैनाती इस सच्चाई को नहीं बदल सकती कि यूरोप रूस के साथ सैन्य संघर्ष नहीं चाहता।
छोटे राष्ट्र और रूस विरोध
हालांकि, छोटे यूरोपीय राष्ट्र, जैसे बाल्टिक राज्य और चेक गणराज्य, रूस विरोधी रुख अपनाए हुए हैं। इन देशों में रूस को लेकर भय और अमेरिकी हस्तक्षेप को लेकर समर्थन अधिक स्पष्ट है। परंतु, अगर जर्मनी और फ्रांस मास्को के साथ कूटनीतिक संबंधों की दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लेते हैं, तो इन छोटे देशों की चिंताएँ अप्रासंगिक हो जाएंगी। यह तथ्य नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइनों के निर्माण के दौरान भी देखा गया, जिसे रूस-यूरोपीय संघ के बिगड़ते संबंधों के बावजूद जर्मनी के आर्थिक हितों के चलते अंजाम दिया गया था। इससे यह साफ होता है कि यूरोप के बड़े देश अपने आर्थिक और कूटनीतिक हितों के लिए रूस से संबंध बनाए रखने में रुचि रखते हैं।
अमेरिकी प्रभाव का चिरस्थायी प्रभुत्व
पश्चिमी यूरोप की स्वतंत्र नीति पर अमेरिका का गहरा नियंत्रण है। अमेरिकी सैन्य उपस्थिति, आर्थिक प्रभाव और खुफिया नेटवर्कों ने यूरोपीय देशों पर अमेरिकी पकड़ को बनाए रखा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हारने वाले देशों जैसे जर्मनी और इटली आज भी एक तरह से अमेरिकी निगरानी के अधीन काम कर रहे हैं। यह अमेरिकी प्रभुत्व यह सुनिश्चित करता है कि यूरोप अपनी स्वतंत्र भू-राजनीतिक नीति विकसित नहीं कर सकता।
अमेरिका की पकड़ केवल सैन्य और आर्थिक स्तर पर ही नहीं है, बल्कि खुफिया सेवाओं के माध्यम से भी यूरोपीय देशों के आंतरिक मामलों पर नजर रखी जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि यूरोपीय नेतृत्व अमेरिकी नीतियों के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठा सके।
यूरोपीय नेताओं का डर और अमेरिकी नियंत्रण
यूरोप के नेताओं का डर केवल रूस से नहीं है, बल्कि अमेरिकी नियंत्रण के कारण भी है। यूरोपीय नेताओं को डर है कि अगर वे अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देंगे, तो इसका गंभीर परिणाम होगा। इतिहास इस बात का गवाह है कि अमेरिका अपने प्रभुत्व को चुनौती देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करता है। उदाहरण के लिए, जब 2003 में इराक युद्ध के खिलाफ जर्मनी और फ्रांस ने विरोध किया था, तो अमेरिका ने उन्हें गंभीर रूप से दंडित किया। यह कड़वा अनुभव अब भी यूरोपीय नेताओं के मन में ताजा है, और वे जानते हैं कि अमेरिका के खिलाफ जाने का अंजाम क्या हो सकता है।
हाल के वर्षों में भी इस प्रकार की घटनाएं दोहराई गई हैं। रूस पर अमेरिकी नेतृत्व वाले प्रतिबंधों को लागू करने में यूरोपीय संघ का सहयोग, जो यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक था, यह दर्शाता है कि यूरोपीय नेता अमेरिकी प्रतिशोध के डर से ज्यादा विरोध नहीं कर पाए। यह स्पष्ट करता है कि यूरोपीय देशों की अमेरिकी नीति से स्वतंत्र होने की क्षमता बेहद सीमित है।
यूरोप में नेतृत्व का अभाव
यूरोप में आज वह नेतृत्व क्षमता दिखाई नहीं देती, जो अतीत में डि गॉल, एडेनॉयर और मिटर्रैंड जैसे नेताओं के समय में थी। आज के यूरोपीय नेता अधिकतर प्रशासनिक अधिकारी हैं, जो अपने व्यक्तिगत हितों को सर्वोपरि रखते हैं। कई यूरोपीय राजनेता, विशेष रूप से छोटे देशों में, अमेरिकी समर्थन के लिए खुलेआम प्रयास करते हैं। इन छोटे देशों के नेता यूरोपीय संघ के भीतर अस्थिरता फैलाने का काम करते हैं और जर्मनी या फ्रांस के रूस के साथ संबंध सुधारने की कोशिशों को बाधित करते हैं।
अगर अमेरिका का प्रभाव यूरोप पर से हट जाए, तो जर्मनी और फ्रांस जैसे बड़े देश एक अधिक व्यावहारिक नीति अपना सकते हैं, जिसमें रूस के साथ संबंध सुधारने और पोलैंड की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को संतुलित करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। लेकिन अमेरिकी नियंत्रण के चलते यह संभावना फिलहाल दूर की कौड़ी है।
रूस से नहीं, अमेरिका से असली भय
यूरोपीय नेताओं में रूस का वास्तविक डर नहीं है। वे रूस की शक्तियों और कमजोरियों को अच्छी तरह समझते हैं और मास्को की व्यावहारिक कूटनीति पर भरोसा करते हैं। उनका असली डर अमेरिका से है, जो अपनी अप्रत्याशित और कठोर नीतियों से उन्हें प्रभावित करता है। यूरोप में कोई ऐसा आंदोलन दिखाई नहीं देता जो अमेरिकी प्रभाव से छुटकारा पाने की ओर बढ़ रहा हो। अमेरिका के नियंत्रण में पश्चिमी यूरोप की स्वतंत्र रणनीतिक नीति की कल्पना अभी भी एक सपना मात्र है।
हालांकि, अमेरिका की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति ने ट्रांसअटलांटिक संबंधों में तनाव पैदा किया है, परंतु यूरोप पर अमेरिकी प्रभुत्व की नींव इतनी गहरी है कि इसे हिलाना फिलहाल असंभव सा प्रतीत होता है
यह लेख सबसे पहले ‘Vzglyad’ अखबार में 'EU leaders fear the US more than Russia' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। लेखक टिमोफे बोरडाचेव वल्दाई क्लब के कार्यक्रम निदेशक हैं और इसे कल्ट करंट डेस्क द्वारा अनुवादित और संपादित किया गया है।