Cult Current ई-पत्रिका आवरण कथा (फरवरी, 2025 ) : ट्रंप 2.0ः 'अमेरिका फर्स्ट' या निरंतरता का रास्ता?
संदीप कुमार
| 01 Feb 2025 |
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी 2025 को सत्ता में लौटे हैं। दुनिया भर में उनकी नई विदेश नीति किस दिशा की ओर इशारा करती है, चर्चा तेज हो गई है। उनके पूर्ववर्ती, जो बाइडेन, के शासन के दौरान जहां एक ओर लोकतंत्र और वैश्विक सहयोग पर जोर दिया गया, वहीं ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को प्राथमिकता दी थी। दोनों नेताओं के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर है, लेकिन यह भी देखा गया है कि कुछ क्षेत्रों में निरंतरता बनी रहती है। भले ही प्रत्येक राष्ट्रपति अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण और शैली में अंतर रखते हों, लेकिन यह निरंतरता मुख्यतः अमेरिका की भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं से उत्पन्न होती है। राष्ट्रपति चाहे जो भी हो, अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों और मूल्यों की रक्षा करने के लिए एक स्थिर मार्ग का पालन करता है।
ट्रंप और बाइडेन की विदेश नीति में प्रमुख अंतर:
बाइडेन के कार्यकाल में, अमेरिका ने यूक्रेन का समर्थन किया, ताइवान की रक्षा का संकल्प लिया, जलवायु परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित किया, और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा दिया। इसके अलावा, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों और चीन के खिलाफ वैश्विक गठजोड़ को प्राथमिकता दी। बाइडेन की सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया कि अमेरिका का वैश्विक नेतृत्व कायम रहे, और उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते में फिर से वापसी की।
वहीं, ट्रंप के दृष्टिकोण में कई महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं। ट्रंप ने यूक्रेन के समर्थन पर प्रश्न उठाया, ताइवान के मामले में संकोच दिखाया, जलवायु परिवर्तन को नकारा और मानवाधिकारों और लोकतंत्र को बढ़ावा देने में रुचि कम दिखाई। उन्होंने अमेरिका के रक्षा खर्च में अपने सहयोगियों द्वारा योगदान को लेकर आलोचना की और चीन के खिलाफ कड़े कदम उठाए। ट्रंप का यह मानना था कि अमेरिका को अपने हितों को पहले रखना चाहिए और जो भी वैश्विक सहयोग हो, उससे अमेरिका को ठोस लाभ मिलना चाहिए।
ट्रंप और बाइडेन के शासनकाल में निरंतरता:
हालाँकि, विदेश नीति के क्षेत्रों में काफी भिन्नताएँ हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में निरंतरता भी देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, बाइडेन ने चीन और रूस को अमेरिका के सबसे बड़े वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के रूप में पहचाना, जो ट्रंप की नीति का हिस्सा था। इसके अलावा, बाइडेन ने ट्रंप द्वारा लगाए गए चीन पर टैरिफ़ और तकनीकी नियंत्रण को बरकरार रखा। बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का ट्रंप द्वारा की गई समझौते के तहत पालन किया, और यूक्रेन को लेथल सहायता भी दी, जैसा कि ट्रंप के शासन में किया गया था।
इसके अतिरिक्त, बाइडेन ने अब्राहम समझौतों (Abraham Accords) को आगे बढ़ाया, जो ट्रंप प्रशासन की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता थी। बाइडेन ने सऊदी अरब के साथ अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश की, जो ट्रंप के समय से ही एक अहम मुद्दा था। इसलिए, बाइडेन और ट्रंप की नीतियों में भले ही शैलियों में अंतर हो, लेकिन मूल नीति में निरंतरता देखी गई है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में संभावित बदलाव:
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में हमें कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सबसे पहले, अमेरिका के सहयोगियों के साथ रिश्तों में एक कठोर दृष्टिकोण देखने को मिल सकता है। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में यह दावा करते थे कि कई देशों ने अमेरिका की सुरक्षा में मुफ्त लाभ उठाया है, और वह इसे बदलने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा, उनका ध्यान हमेशा व्यापार घाटों और आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर रहा है, खासकर चीन के साथ। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह नीति और भी सख्त हो सकती है।
चीन के संदर्भ में, ट्रंप प्रशासन संभवतः चीन को अमेरिकी आर्थिक और सुरक्षा हितों के खिलाफ एक प्रमुख चुनौती के रूप में देखेगा। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ट्रंप अमेरिका के साझेदारों के साथ मजबूत गठबंधन बनाने की कोशिश करेंगे, जैसे कि भारत, जापान, और ऑस्ट्रेलिया के साथ। इसका एक उदाहरण क्वाड (Quad) और ऑकस (AUKUS) जैसे रक्षा समझौते हैं, जो ट्रंप के समय में शुरू हुए थे और बाइडेन प्रशासन ने उन्हें आगे बढ़ाया।
शैली में अंतर और समानताएँ:
ट्रंप और बाइडेन के विदेश नीति में शैली का अंतर स्पष्ट है। ट्रंप को एकतरफा निर्णय लेने वाला और अपने साथी देशों के साथ ज्यादा संवाद न करने वाला नेता माना जाता है, जबकि बाइडेन ने अपने सहयोगियों के साथ परामर्श और कंसल्टेशन पर जोर दिया। ट्रंप अपनी नीतियों को ट्विटर और सोशल मीडिया के माध्यम से स्पष्ट करते थे, जबकि बाइडेन अधिक परंपरागत कूटनीतिक तरीकों को अपनाते हैं। फिर भी, बाइडेन प्रशासन ने भी कई मामलों में एकतरफा फैसले लिए हैं, जैसे कि चीनी तकनीकी कंपनियों पर निर्यात नियंत्रण लगाना।
विदेश नीति की स्थिरता:
विभिन्न प्रशासनों में विदेश नीति में बदलाव होने के बावजूद कुछ क्षेत्रों में निरंतरता बनी रहती है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रपति ओबामा ने जॉर्ज बुश के 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' की आलोचना की थी, लेकिन उन्होंने भी बुश से अधिक देशों में सैन्य कार्रवाई की। इसी प्रकार, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने अभियान में NAFTA और अमेरिका-कोरिया मुक्त व्यापार समझौते की आलोचना की, लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने उनके संशोधित संस्करणों पर हस्ताक्षर किए। यह बताता है कि, भले ही राष्ट्रपति चुनावी वादों के दौरान नीतियों को बदलने का वादा करते हैं, वास्तव में प्रशासन में बदलाव के बावजूद कई क्षेत्र समान रहते हैं।
स्थिर अमेरिकी हित:
अमेरिका के विदेश नीति के कई कारक समय के साथ स्थिर रहते हैं, जैसे कि यूरोएशिया में एक शत्रुतापूर्ण शक्ति का प्रभुत्व न होने देना, समुद्री स्वतंत्रता की रक्षा करना (जो व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है), मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता बनाए रखना, और इस्राइल का समर्थन करना। इन स्थिर हितों के कारण, अमेरिकी नीति में परिवर्तनशीलता कम होती है, और यह हर राष्ट्रपति के तहत अधिक या कम समान रहती है।
नियमित अमेरिकी हस्तक्षेप:
अमेरिका की विदेश नीति में कई क्षेत्रों में निरंतरता है। उदाहरण के लिए, क्यूबा में राजनीतिक परिवर्तन लाने की नीति राष्ट्रपति आइजनहावर से ही चली आ रही है। NATO देशों को रक्षा पर अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित करने की नीति राष्ट्रपति केनेडी से जारी है। साथ ही, अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने हितों की रक्षा करने के लिए सैन्य ताकत का उपयोग किया है, जो कि राष्ट्रपति जिमी कार्टर से लेकर अब तक जारी है। इसके अलावा, नॉर्थ कोरिया के साथ वार्ता, इजरायल-फिलिस्तीनी शांति प्रक्रिया, और मिसाइल रक्षा योजनाएं सभी अमेरिकी प्रशासनों में एक समान रही हैं।
कांग्रेस की भूमिका:
अमेरिकी कांग्रेस विदेश नीति में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उदाहरण के लिए, ताइवान से पेइचिंग को मान्यता देने के बाद, कांग्रेस ने ताइवान संबंध कानून (Taiwan Relations Act) पारित किया, जिसने ताइवान के समर्थन की गारंटी दी। इसी तरह, जब राष्ट्रपति कार्टर ने 1977 में दक्षिण कोरिया से अमेरिकी बलों को हटाने की योजना बनाई थी, तो कांग्रेस ने हस्तक्षेप किया। इसी प्रकार, जब ट्रंप ने रूस के प्रति गर्मजोशी दिखाई, तो कांग्रेस ने ओबामा-कालीन कार्यकारी आदेशों को कानूनी रूप में लागू किया।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की निरंतरता:
अमेरिका का विदेश नीति ढांचा यह सुनिश्चित करता है कि मुख्य विदेशी सहयोगी देशों के साथ संबंध हमेशा बनाए रहें। उदाहरण के तौर पर, इज़राइल, सऊदी अरब और चीन के साथ अमेरिका के संबंधों में भले ही विभिन्न प्रशासनों में दृष्टिकोण अलग-अलग हो, लेकिन उनके साथ संवाद और सहयोग का सिलसिला हमेशा कायम रहा है। चाहे बाइडेन हो या ट्रंप, अमेरिका ने हमेशा चीन को वैश्विक चुनौती के रूप में देखा और सऊदी अरब से अपने रणनीतिक संबंधों को जारी रखा।
विदेश नीति में व्यक्तित्व का प्रभाव:
यह लेख यह भी स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति के व्यक्तित्व और उनकी नेतृत्व शैली का भी विदेश नीति पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, ओबामा और ट्रंप दोनों की विदेश नीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा अपनाई गई मूल नीति में ज्यादा अंतर नहीं था। ट्रंप और बाइडेन दोनों ने व्यक्तिगत रिश्तों की शक्ति पर जोर दिया, हालांकि उनका तरीका भिन्न था। ट्रंप ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, जबकि बाइडेन ने अधिक पारंपरिक कूटनीतिक विधियों को अपनाया।
नीति में परिवर्तन की सीमाएँ:
राष्ट्रपति चाहे कोई भी हो, अमेरिका की विदेश नीति में मौलिक बदलाव करने के लिए केवल शब्दों और धमकियों से काम नहीं चलता। उदाहरण के लिए, NATO से बाहर निकलने के बजाय, एक राष्ट्रपति केवल यह संकेत दे सकता है कि वह किसी सहयोगी देश की रक्षा नहीं करेगा यदि वह हमले का शिकार होता है। यह एक प्रकार से नीति को नुकसान पहुँचाने का तरीका है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिरता को चुनौती देता है, लेकिन उसे पूरी तरह से बदलता नहीं है। इसी प्रकार, यदि कोई राष्ट्रपति जापान से असंतुष्ट होता है, तो वह अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति को लेकर दबाव बना सकता है।
क्षेत्रीय प्राथमिकताएँ:
ओबामा और बाइडेन ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को अमेरिकी विदेश नीति में प्राथमिकता दी, वैसे ही ट्रंप प्रशासन भी इस क्षेत्र को अपने विदेश नीति के एजेंडे में शामिल कर सकता है। हालांकि, यह क्षेत्रीय प्राथमिकता चुनौतियों से भरी होती है, जैसे कि चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को संभालना।
संघर्ष से बचाव की नीति:
अंत में, विदेश नीति में यह भावना बनी रहती है कि अमेरिकी प्रशासन सैन्य संघर्षों से बचने की कोशिश करता है। जैसे बाइडेन ने रूस, अफगानिस्तान और मध्य पूर्व में सैन्य संघर्ष से बचने की कोशिश की, वैसे ही ट्रंप भी अपनी रणनीति में इस तरह के संघर्षों से बचने का प्रयास कर सकते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल अमेरिकी विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला सकता है, जो कि उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत होगा। जहां बाइडेन ने वैश्विक सहयोग, लोकतंत्र और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं ट्रंप का ध्यान मुख्य रूप से अमेरिका के आर्थिक और सुरक्षा हितों पर होगा। हालांकि दोनों के दृष्टिकोण में बड़े अंतर हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में निरंतरता भी देखने को मिलती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में वैश्विक कूटनीति में कैसे बदलाव आते हैं और उनका नेतृत्व अमेरिका और बाकी दुनिया के लिए क्या नई दिशा तय करता है।