भू-राजनीति का नया मोड़:क्या टूट रहा है ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन?
मनोज कुमार
| 01 Apr 2025 |
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डोनाल्ड ट्रंप, जिन्हें विवादों का पर्याय माना जाता है, उन्होंने फरवरी 2024 में दक्षिण कैरोलिना में एक चुनावी रैली के दौरान एक ऐसा बयान दिया, जिसने अमेरिका और यूरोप के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया। उन्होंने एक “बड़े यूरोपीय देश” के राष्ट्रपति के साथ हुई अपनी बातचीत का ज़िक्र करते हुए कहा कि अगर वह देश नाटो में अपने हिस्से की राशि नहीं चुकाता है, तो अमेरिका उसकी रक्षा नहीं करेगा। इतना ही नहीं, ट्रंप ने ये भी कहा कि वह रूस के राष्ट्रपति पुतिन को नाटो के उन देशों के ख़िलाफ़ “जो कुछ भी वो चाहता है” करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे, जो “अपने बिल नहीं चुकाते” हैं।
इस बयान ने तत्काल ही अमेरिका और यूरोप के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया। राष्ट्रपति बाइडेन और यूरोपीय नेताओं ने इसे ट्रंप के संभावित दूसरे कार्यकाल में ट्रांस-अटलांटिक संबंधों के पूरी तरह से टूट जाने के संकेत के रूप में देखा। हालांकि इस डर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया हो सकता है, लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की नीतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका और यूरोप के संबंधों में कुछ बड़े बदलाव आने वाले हैं। ट्रंप और उनकी टीम अमेरिका-यूरोप संबंधों को नए नियमों और अपेक्षाओं के तहत आधारभूत बदलाव लाने और नया आकार देने के लिए तैयार हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और शीत युद्ध के अंत के बाद अमेरिका और यूरोप ने घनिष्ठ सहयोग के तहत काम किया। यूरोपीय देश यह मानते रहे कि उनकी सुरक्षा की अंतिम गारंटी अमेरिका की है। अमेरिका की सुरक्षा गारंटियों और यूरोपीय महाद्वीप पर उसकी सैन्य उपस्थिति ने न केवल अमेरिका को रूस का मुकाबला करने में सक्षम बनाया, बल्कि उसे दुनिया भर में खुद को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में भी मदद की। हालांकि, इसने यूरोप को किसी भी खतरे से निपटने की प्रतिरोधक क्षमता दी, लेकिन साथ ही अमेरिका को भी यह फायदा हुआ कि यूरोप की विदेश नीति पर उसका काफी असर बना रहा।
ट्रांस-अटलांटिक नेताओं की नजरों में यह अनुबंध अब तक सफल रहा है। यूरोप के देश अमेरिका के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा करते हैं। यूरोपीय संघ, अमेरिका का सबसे बड़ा द्विपक्षीय व्यापार और निवेश भागीदार है। अमेरिका को एक ‘उदार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था’ का प्रबंधन करने में यूरोप मदद करता है। इस लिहाज से देखें तो यूरोप को अमेरिका द्वारा दी जा रही सुरक्षा की गारंटी इन सब कामों की एक छोटी सी कीमत है।
लेकिन डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन में काम करने वाले लोगों ने अब इसे देखने का नजरिया बदल दिया है। यही लोग अब अमेरिका की प्राथमिकताएं तय कर रहे हैं। उनकी इस सोच से ही यह समझा जा सकता है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान अमेरिका-यूरोप संबंध कैसे विकसित हो सकते हैं। ट्रंप के सहयोगियों के मुताबिक, अमेरिका ने यूरोप को काफी लाड़-प्यार दिया है। पिछले 35 सालों में यूरोप को लेकर अमेरिका का रवैया बहुत नरम रहा है और यूरोपीय देशों को इसका एकतरफा फायदा मिलता रहा है। यूरोप की सुरक्षा पर अमेरिका बहुत खर्च करता है और इसकी वजह से अमेरिका दूसरी जगहों पर अपनी शक्ति नहीं दिखा पा रहा, जबकि यूरोपीय देशों को अमेरिकी गारंटी की वजह से अपनी सुरक्षा पर ज़्यादा खर्च नहीं करना पड़ता। इन बचे हुए पैसों को यूरोप के देश अपने सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर खर्च करते हैं।
यूरोपीय देशों को अब यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भी अमेरिका और यूरोप के रिश्ते पहले की तरह बने रहेंगे। फरवरी में नाटो की अपनी पहली यात्रा के दौरान अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने दो-टूक शब्दों में यह बात स्पष्ट कर दी थी। उन्होंने अपने यूरोपीय सहयोगियों से कहा कि वह “सीधे और स्पष्ट रूप से यह बात कहने यहां आए हैं कि कुछ कठोर रणनीतिक वास्तविकताएं अमेरिका को मुख्य रूप से यूरोप की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने से रोकती हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि अपनी सुरक्षा के लिए “यूरोपीय देशों को आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए।” अमेरिका के इस संदेश ने यूरोपीय देशों को हैरान कर दिया, लेकिन यह विचार नया नहीं है। ड्वाइट डी. आइजनहॉवर और उनसे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपति भी यह शिकायत करते रहे हैं कि यूरोप को अमेरिका की पीठ पर सवारी करने की आदत पड़ गई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि इन सब बदलावों को वास्तविकता का जामा पहनाकर ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को कैसे सुधारा जाए। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान यूरोपीय देशों को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि यूरोप की सुरक्षा के लिए अमेरिकी समर्थन में थोड़ी कमी आएगी। यूरोपीय महाद्वीप में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी में भी कमी आ सकती है। ट्रंप ने पहले ही कहा था कि वह यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की संख्या में कमी लाकर इसे 20 हज़ार तक करना चाहते हैं। इतना ही नहीं, ट्रंप ने यह भी कहा कि वह यूरोप में तैनात बाकी बचे सैनिकों के लिए भी अपने यूरोपीय सहयोगियों से सब्सिडी की मांग करना चाहते हैं।
रक्षा और सुरक्षा के अलावा अमेरिका और यूरोप में राजनीतिक परिदृश्य भी अलग-अलग मानदंडों और मूल्यों के दबाव में दरकने लगा है। अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी. वेंस ने फरवरी में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान इसे स्पष्ट शब्दों में जाहिर भी कर दिया। वेंस के मुताबिक, ट्रंप की टीम का मानना है कि यूरोप का खतरा आंतरिक है। उन्होंने यूरोप पर उन पारंपरिक लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछे हटने का आरोप लगाया, जो ऐतिहासिक रूप से अमेरिका के साथ साझा थे। इसमें मुख्य रूप से स्वतंत्र अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता और माइग्रेशन का मुद्दा शामिल है।
इसका एक मतलब यह भी है कि यूरोप के प्रति ट्रंप अब एक अत्यधिक व्यापारिक दृष्टिकोण अपनाएं, विशेष रूप से उन देशों के साथ जो राजनीतिक रूप से उनके साथ नहीं हैं। चीन पर यूरोप की आर्थिक निर्भरता के मामले में ट्रंप का यह रुख स्पष्ट रूप से दिख सकता है। ट्रंप और उनकी टीम का मानना है कि यूरोप के मामले में चीन दोनों तरफ का फायदा उठाता है। चीन की यूरोपीय बाजारों और उसके महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे तक सीधी पहुंच है। इससे चीन को अपनी वैश्विक आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की ताकत मिलती है। हालांकि यह भविष्यवाणी करना मुश्किल है कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे, लेकिन इतना तय है कि यूरोपीय संघ (और विभिन्न यूरोपीय देशों) को अगले चार सालों तक चीन नीति के संबंध में अमेरिका के दबाव का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस दौरान यूरोप को ऐसा महसूस हो सकता है कि उसे एक पक्ष चुनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। चीन नीति को लेकर यूरोप के देशों का नजरिया पहले से ही खंडित है, ऐसे में अमेरिका का दबाव पहले से ही टूटे हुए इस दृष्टिकोण को और कमजोर कर सकता है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती महीनों ने ही ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी को संकट में डाल दिया है। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी नेताओं ने यूरोप को जो कड़े संदेश दिए, उससे ये देश हैरान हैं। हालांकि उन्हें इसे लेकर आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए था। 2020 में राष्ट्रपति बनने के बाद जब बाइडेन ने “अमेरिका इज बैक” का नारा दिया था, उसी समय यूरोपीय देशों को इसके निहितार्थ समझ लेने चाहिए थे।
यूरोप एक बार फिर से पहले की स्थिति में आ गया है। यूरोपीय देश अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अगले चार सालों तक उन्हें अमेरिका के साथ कैसे निपटना है। ट्रंप और उनकी टीम 80 वर्षों के ऐतिहासिक परिपाटी को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रही है। हालांकि मौजूदा सूरत में यह कहा जा सकता है कि अमेरिका और यूरोप के संबंध कायम रहेंगे, लेकिन इन संबंधों में कुछ मौलिक बदलाव हो सकते हैं। अब यूरोप को अपने पैरों पर खड़ा होने की तैयारी करनी होगी। क्या यूरोप इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है? क्या वह अपनी सुरक्षा और विदेश नीति की बागडोर अपने हाथों में ले पाएगा? ये सवाल आने वाले सालों में भू-राजनीति को आकार देंगे।
(लेखिका रेचल रिज़ो, अटलांटिक काउंसिल के यूरोप सेंटर में नॉन रेज़िडेंट सीनियर फेलो हैं।)