उदारवाद, राष्ट्रवाद, यथार्थवाद, नवउदारवाद, अनेकवाद और मीनू मसानी

श्रीराजेश

 |  31 May 2017 |   210
Culttoday

उदारवादः 

उदारवाद शब्द का मूल आज़ादी या स्वतंत्रता है. दूसरे शब्दों में यहां केंद्र बिंदू व्यक्ति है. समाज व्यक्ति की मदद के लिए है और न कि व्यक्ति समाज के लिए जैसा कि साम्यवाद या समाजवाद जैसी व्यवस्थाएं परिभाषित करने की कोशिश करती हैं. उदारवाद के मूल तत्व व्यापक हैं और जीवन के हर पहलू को छूते हैं. जहां तक मनोभाव की बात है तो सहनशीलता, खासतौर पर असहमति को लेकर, ही इसका आधार है. मामला चाहे धार्मिक हो, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय या फिर जाति या भाषाई समूह से ताल्लुक रखता हो, दूसरे के विचारों को लेकर सहनशीलता और इसे लेकर तर्क करने की तैयारी, उदारवाद का सार हैं.

जहां तक धर्म की बात है तो उदारवाद धर्मविरोधी नहीं है, लेकिन गैर-सांप्रदायिक और शायद नास्तिक भी है.

एक अच्छा उदारवादी सभी धर्मों पर वैसा हमला नहीं बोलता जैसा कि ‘धर्मनिरपेक्ष.’ एक अच्छा उदारवादी सभी धर्मों को लेकर सहनशील होगा और सबका एक समान सम्मान करेगा. एक लिहाज से, गांधीजी का धर्म को लेकर व्यवहार काफी उदारवादी था, उन लोगों की तुलना में जो खुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहते हैं और जो हर धर्म को दुर्भावनापूर्ण तरीके से ही देखते हैं. इस लिहाज से भारतीय संविधान बहुत उदारवादी है और सभी धर्मों और धार्मिक संस्थाओं को बराबरी की सम्मान की नजर से देखता है.

यथार्थवादः

उदारवाद का एक और आधारभूत गुण किसी वक्त विशेष पर हुई समस्या को लेकर उसकी यथार्थवादी सोच है. उदारवादी किसी भी समस्या को अड़ियल या पूर्वाग्रह भरे नजरिये से नहीं देखता. सभी मसलों को लेकर वह खुला दिमाग रखता है. इसलिए, उदाहरण के लिए, जहां तक समाजवादी लोकतंत्र की बात है, उदारवादी किसी देश, मामले या काल की परिस्थितियों को देखते हुए काफी हद तक सरकारी नियंत्रण को भी स्वीकार लेगा. इस सोच के रहते भी कि प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ता की प्राथमिकता और बाजार के कानून का वर्चस्व होना चाहिए, उदारवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था की वास्तविक प्रकृति को लेकर लचीला व्यवहार अपनाएगा, जो कि उस स्थिति विशेष में जरुरी होगी.

अनेकवादः

उदारवादी मूलतः अनेकवाद में विश्वास रखता है, यानी वह किसी भी मत विशेष या पूर्वाग्रह या समाज के एक ही वर्ग के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करता. उदारवादी के मकान में कई कमरे होते हैं, जिनमें हर किसी के लिए एक कमरा होता है. इसलिए उदारवादी एक अनेकवादी समाज में यकीन रखता है, जहां पर सरकार के विभिन्न अंगों के कामकाज पर निगरानी रखने के लिए, कार्यकारी, विधायी और न्यायिक तंत्र होते हैं. संघीय सरकार में भी निगरानी का तंत्र होता है जो संघीय सरकार और राज्य सरकार के बीच संतुलन साधता है. भारत जैसे बहु-धार्मिक, बहुजातीय और बहुभाषीय देशों के मामलों में उदारवादी का ध्यान अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा में होता है. व्यक्ति और सरकार के बीच की लड़ाई में, नागरिकों के कुछ मूलभूत अधिकार होने चाहिए जिनके लिए वह कानून की अदालत की शरण ले सके. राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों पृथक्करण होना चाहिए. दूसरे शब्दों में उदारवादी सीमित सरकार में विश्वास रखता है. ‘सीजर की वस्तुएं सीजर को दें और भगवान की भगवान को, इस मामले में भगवान व्यक्ति की अंतकरण की आवाज है. उदारवादी कभी भी नियतीवादी नहीं होता. वह मार्क्सवादियों की तरह यह नहीं कहता कि ऐसा होकर ही रहेगा. वह इतना ही कह सकता है कि एक तार्किक विश्लेषण को देखकर लगता है कि अगर ऐसा हुआ तो वैसा होगा.

न्याय और आधुनिकता:

उदारवादी हमेशा कमजोर को न्याय दिलाने के पक्ष में होता है फिर वह चाहे जो हो. इसलिए वह भले ही महिलाओं को आज़ादी दिलाने वाली गुमराह बातों के पक्षधर न हों, वे महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के पक्षधर होते हैं. उदारवादी बच्चों को उनके अधिकार और अच्छा व्यवहार दिलाने के लिए उठ खड़े होते हैं. यहां तक कि वे बुजुर्गों के अलावा अपराधियों से भी बेहतर बर्ताव का पक्ष लेते हैं.

उदारवादी आधुनिकतावादी होता है. वह परिवर्तन की वकालत करता है. वह आधुनिक प्रौद्योगिकी और उसके असर को खुले दिल से हंसी-खुशी स्वीकारता है. वह उद्योग और कारोबार के अलावा जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी प्रबंधन के कौशल का महत्व स्वीकारता है. वह आधुनिक समाज में विज्ञान के महत्व को स्वीकारता है. यह महज इत्तफाक नहीं कि प्रौद्योगिकी स्वतंत्रता में ही फलती-फूलती है, जहां स्वतंत्रता नहीं दी जाती वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद् बेकार हो जाते हैं. आधुनिकतावाद और सुधारवादियों के बीच, किसी भी देश में, या फिर जाति या धर्म के बीच विवाद में उदारवादी हमेशा आधुनिकतावाद और परिवर्तन के पक्ष में ही होते हैं. उदारवादी परंपराओं के खिलाफ नहीं हैं. इसके विपरीत उदारवादी लोगों की परंपराओं की अच्छी बातों का समर्थन करते हैं और परंपरा के आधार पर ही परिवर्तन का पक्ष लेते हैं. इस लिहाज से उदारवादी भड़काऊ या बाधक नहीं हैं बल्कि परिवर्तन का सकारात्मक तत्व हैं.

"रोटी या आज़ादी?":

उदारवादी हमेशा ही साम्यवादियों और फासिस्टों की आज़ादी या रोटी को लेकर भ्रमित करने वाली सोच के खिलाफ रहे हैं. वह पूछते हैः आप क्या चाहते हैं रोटी या आज़ादी, मानो आपको केवल एक का ही चयन करना है. जैसे कि जब आपको आज़ादी मिल जाएगी तो रोटी नहीं होगी और रोटी होने का मतलब है कि आपको अपनी आज़ादी गंवानी पड़ेगी? यह एक बहुत बड़ा छलावा है. क्योंकि वास्तविकता में आपको आज़ादी के बगैर रोटी मिल ही नहीं सकती. इंसान के इतिहास में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जिसमें गुलामों के देश को रोटी मिली हो. रोटी का मतलब महज रोटी नहीं है. रोटी से हमारा मतलब है जिंदगी की अच्छी चीजें-जीवन का वास्तविक मूल्य, उपभोक्ता सामान, जैसा कि हम उन्हें कहते हैं. इंसान के इतिहास में आज तक एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जहां पर लोगों से आज़ादी छीनकर आपने उन्हें समृद्ध जीवन दिया हो. इसके विपरीत, ‘प्रभावी समाज’ तभी देखने को मिलता है जब अधिकाधिक आज़ादी हो.

आखिर वो कौनसे देश हैं जहां खाने-पीने की कोई कमी न हो? निश्चित तौर पर आज़ादी का अग्रदूत अमेरिका. स्वाभाविक भी है आखिर गुलामों को कौन अच्छा खाना देगा? आखिर सरकार अपने गुलामों को क्यों अच्छा खाना दे? मिस्र के लोगों ने पिरामिड बनाने के लिए जिन कारीगरों का इस्तेमाल किया, उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया था. उनको पिरामिड बन जाने तक चाबुकों से पीटा जाता था और वे ऐसे ही काम करते और पीटते हुए मर जाते थे. केवल स्वतंत्र इंसान को ही रोटी मांगने का अधिकार है. चूंकि उसे अधिकार मिला हुआ है इसलिए उसे शक्ति मिली हुई है, वह मतदान कर सकता है, आप इसे जिस नाम से चाहें पुकार लें.

एक मुक्त अर्थव्यवस्था:

इसलिए एक मुक्त अर्थव्यवस्था का मतलब है सरकार की भूमिका काफी हद तक सीमित ही होगी. सामाजिक नियंत्रण भी बहुत ज्यादा सीमित रखना होगा. नियंत्रण की सोच का आधार ही यह है कि वह उसी वक्त हस्तक्षेप करे जब लोग कोई गलत कदम उठाएं. आप किसी व्यक्ति को चोरी से रोकते  हो, किसी दूसरे को पीटने से रोकते हो, किसी को ठगने से रोकते हो, मालिक को नौकर को ठगने सो रोकते हो-यह जायज है. लेकिन आप किसी व्यक्ति को उसका काम करने से नहीं रोकते. इसलिए नियंत्रण तो पुलिसी उपाय है ताकि किसी को वह काम करने से रोका जाए जो उसे नहीं करना चाहिए. सरकार को मां की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए कि मैरी से यह कहे कि जाकर देखो कि जॉन क्या कर रहा है और उसे रोको, बल्कि होना यह चाहिए कि जॉनी को तभी रोका जाए जब वह ऐसा काम कर रहा हो जो उसे नहीं करना चाहिए.

मुक्त समाज की दूसरी विशेषता यह है कि उपभोक्ता ही राजा है. हर काम उद्योगपति, व्यापारी या फैक्टरी के श्रमिक नहीं बल्कि उपभोक्ता की जरुरतों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए. उपभोक्ता के लिए जो आम आदमी है. हम सभी उपभोग करते हैं. भारत में आज एक भी ऐसा इंसान नहीं है जो किसी न किसी वस्तु का उपभोग न करता हो. ऐसा नहीं करता तो वह मर चुका होता. हम उपभोग करते हैं, आप और आपके बच्चे भी करते हैं. आखिर उपभोक्ता ही राजा है का क्या मायने है? इसका मतलब है कि उपभोक्ता ही उत्पादन स्वरूप तय करेगा. उपभोक्ता को ही उद्योगपति को बताना चाहिए कि वह किस चीज का उत्पादन करे और किस चीज का नहीं. उपभोक्ता ऐसा अपनी क्रय शक्ति से कर सकता है, उसकी जेब में मौजूद जरा से धन से. उद्योगपति या व्यापारी केवल वही माल बनाते हैं जो उनकी राय में लाभ देगा. दूसरे शब्दों में, किसी माल की मांग है और आप उसका उत्पादन करते हैं. अगर मांग नहीं है तो आप उस माल का उत्पादन करके खुद को बेवकूफ ही साबित करेंगे, क्योंकि कोई उसे खरीदेगा नहीं और आपको भारी नुकसान होगा. मुक्त देश में इस तरह से छोटा सा उपभोक्ता भी उत्पादन का स्वरूप तय कर सकता है. हम जब भी सामान खरीदने जाते हैं तो अपना मतदान करके ही आते हैं. जिस तरह से आप घोड़े पर बैठने के लिए टिकट खरीदते हैं, ठीक वैसे ही दुकान में जाकर कहते हैं मुझे हमाम दो, लिरिल दो या इसी तरह कुछ और. आप साबुन के उस ब्रांड विशेष के पक्ष में और दूसरे ब्रांड के खिलाफ मत देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि आप कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को मत देते हैं या फिर किसी एक घोड़े पर दांव लगाते हैं, दूसरे पर नहीं. साबुन, इत्र, ब्रेड, बिस्कुट, केक या जो भी सामान आप खरीदते हैं उसका आर्थिक महत्व देखा जाता है. इसके बाद व्यापारी और उद्योगपति जान लेते हैं कि क्या लोकप्रिय है और लोग किसे प्राथमिकता दे रहे हैं. और वे मांग के ही लिहाज से अपने उत्पादन को बदल देते हैं. यही उपभोक्ता के राजा होने का मतलब है. इसी के चलते इतिहास में सबसे ज्यादा समृद्धि, जीवनस्तर और मौकों, हैसियत में समानता हासिल की गई है. यह एक विरोधाभास है. जिन देशों में सबसे ज्यादा समानता है-कहीं भी दोषहीन समानता नहीं है और हो भी नहीं सकती-लेकिन जहां पर मौकों और हैसियत में समानता है तो ऐसा केवल पूंजीवादी देशों में ही है. वह कौनसा देश है जहां पर कर्मचारी अपने बॉस को नाम लेकर पुकारते हैं? अमेरिकी कर्मचारी कभी अपने बॉस को श्रीमान या ऐसे किसी संबोधन से नहीं बुलाता, वे उसे उसके पहले नाम जैसे टॉम या जॉन कहकर बुलाते हैं. यह संयुक्त राज्य अमेरिका है. यूरोप के लोग इसका दोष परवरिश में कमी को देते हैं क्योंकि वे अब भी वर्गवाद के जाल में उलझे पड़े हैं. इस तरह से आप यह चौंकाने वाला घटनाक्रम देखते हैं, जिसमें आपको सबसे ज्यादा समृद्धि तो मिलती ही है, सबसे ज्यादा समानता भी देखने को मिलती है, जो कि आमतौर पर समाजवाद का लक्ष्य माना जाता है, केवल तथाकथित पूंजीवादी या मेरे शब्दों में उदारवादी देशों में. सिंगापुर के बेहद बुद्धिमान प्रधानमंत्री ली कुआन यू, जो कि एक समाजवादी हैं, कुछ साल पहले भारतीय समाजवादियों से मिलने मुंबई आए थे और उन्होंने एक सवाल पूछा था. उन्होंने पूछा, ‘यह पूछना सुसंगत होगा कि आखिर मुक्त अर्थव्यवस्था वाले जापान, हांगकांग, फार्मोसा, थाइलैंड और मलेशिया जैसे एशियाई देशों ने कामयाबी हासिल कर ली, जबकि समाजवाद की राह पकड़ने वाले देश संतोषजनक परिणाम क्यों नहीं दे सके?’ दिल्ली में अमेरिकी राजदूत रह चुके और नेहरु के वक्त में पक्के समाजवादी योजनाकार प्रोफेसर केनेथ गालब्रेथ ने एक किताब ‘द न्यू इंडस्ट्रियल स्टेट’ लिखी थी. उन्होंने अपनी किताब में ये लिखाः

“भारत और श्रीलंका के अलावा कुछ नये अफ्रीकी देशों में, सार्वजनिक उपक्रमों को ब्रिटेन की तरह स्वायत्तता नहीं दी गई है. यहां पर लोकतांत्रिक समाजवादी परमाधिकार पूरी तरह से थोप दिया गया है. खासतौर पर भारत को उपनिवेशवादी प्रशासन विरासत में मिला है, यहां आधिकारिक सार्वभौमिकता का भ्रम मौजूद है जो कई बेहद तकनीकी फैसलों को भी प्रभावित करता है...स्वायत्तता नहीं दिए जाने के कारण इन देशों में सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज में अदक्षता बढ़ती ही जा रही है. भारत और श्रीलंका में तो तमाम सार्वजनिक उपक्रम घाटे में ही चल रहे हैं. अन्य नये देशों में भी ऐसे ही हालात हैं. एक परिणाम यह हुआ है कि कई सारे समाजवादी इस सोच के हो गए हैं कि सार्वजनिक निगम का स्वभाव ही, विल्सन सरकार के एक मंत्री के शब्दों में, गैरजिम्मेदार होकर जनता या लोकतांत्रिक नियंत्रण के प्रति जवाबदेह नहीं होते.”

ऐसा होने का कारण बहुत आसान सा है. राजनीतिक तंत्र हमारे अपने शरीर की तरह है. इसमें समाज द्वारा हमारे बंदर से इंसान बनने के बीच के पिछले कई हजार सालों में विकसित अंग हैं. जिस तरह से इंसान का समाज विकसित होता है वैसी ही संस्थाएं भी बनती जाती हैं. जॉइंट स्टॉक कंपनी को कारोबार करने के लिए पिछले 200 साल से तैयार किया गया है. सरकार या शासन को नियम और व्यवस्था बनाने के लिए तैयार किया गया है. हमारा शरीर भी वैसा ही है. हम नाक से सूंघते हैं, मुंह से खाते हैं, कान से सुनते हैं, फेंफड़ों से सांस लेते हैं, अमाशय खाना पचाता है आदि आदि. अब क्या हो अगर हम अपने अंगों को उनके मूल काम की बजाय दूसरा काम करने को मजबूर करें. अगर हम अमाशय से सांस लेने की कोशिश करें और फेंफड़ों से खाना पचाने या कान से सूंघने और मुंह से सुनने की कोशिश करें? क्या होगा? यह बेकार ही होगा. ठीक यही होता है जब हम समाज के विभिन्न अंगों के दुरुपयोग की कोशिश करते हैं. समाज और सभ्यताओं ने सरकारों का गठन देश पर बाहरी हमलों, एक-दूसरों पर हमलों, न्याय के लिए किया था. दूसरे शब्दों में सरकार का काम कानून और व्यवस्था की स्थिति बनाए रखना है, लोगों को न्याय देना, लोगों का संरक्षण, देश को बाहरी हमलों से बचाना है. सरकार के मूलभूत काम बस इतने ही हैं. जब सरकार फैक्टरी चलाने की कोशिश करती है, पेनिसिलिन, इस्पात या कुछ और बनाने की कोशिश करती है तो वह नाकाम हो जाती है क्योंकि सरकार लाभ कमाने या सामान के उत्पादन के लिए नहीं बनाई गई हैं. सरकारों को किसी उत्पादन के लिए नहीं बनाया गया है. सरकार को व्यवस्था बनाए रखने का काम करना चाहिए, आपको उत्पादन करने का मौका देना चाहिए. इसलिए समाजवादी या साम्यवादी सरकारें सामाजिक विकास के मूलभूत कानून का विकृत रुप हैं. इसलिए इनका नाकाम होना लाजिमी है. इस तरह से इसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि हमें इस बंजर रास्ते को छोड़कर उदारवाद की राह पकड़नी चाहिए.

पुराना उदारवादः

भारत में उदारवाद की शुरुआत है. लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब उदारवाद ने भारत की जमीन पर कदम रखा हो. ऐसा 19वीं सदी में भी हुआ था. भारत में तब पुराना उदारवाद था. इसके नेता दादाभाई नौरोजी, रानडे, गोखले, राममोहन रॉय, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नामवर लोग थे. जब मैं बच्चा या छात्र था मैंने इनमें से कई को देखा था. श्रीनिवास शास्त्री का लेक्चर सुनने के वक्त तो मैं हमारे पड़ोस में दादाभाई नौरोजी के पैरों में खेलने वाला एक छोटा सा बच्चा था. मैंने दिनशा वाच्छा, फिरोजशाह मेहता को देखा है. मैं सप्रू और जयकर को जानता था. वे सब विदा हो गए और साथ ही पुराना उदारवाद भी. महात्मा गांधी ने इसे मार डाला. जब तिलक और लाजपतराय के बाद गांधीजी एक तेजतर्रार राष्ट्रवादी के तौर पर सामने आए थे, पुराना उदारवाद उनके काम का नहीं था, क्योंकि पुराने उदारवादी ब्रिटिश राज के खिलाफ नहीं थे. वे तो भारतीयों की अपनी सरकार के पक्षधर थे. जैसा कि आपको पता ही है दादाभाई नौरोजी ने ही स्वराज शब्द गढ़ा था. लेकिन उनका लड़ाई का तरीका बहुत शांत और नरमपंथी था. वे एक उदारवादी सदस्य के तौर पर ब्रिटिश संसद से भी जुड़े. उन्होंने भारत का पक्ष भी रखा, लेकिन वे संविधान में विश्वास रखने वाले थे. उदारवादी लोग सड़कों पर उतरकर उत्पात मचाने वाले लोगों पर हमला बोलने वाले नहीं होते. आज भी वे ऐसे नहीं हैं. इसलिए संविधान में यकीन के कारण वे बेहद नरमपंथी लगते थे. युवावस्था में मैं अपने पिता और इस तरह के उदारवादियों को लेकर बेहद उतावला रहता था क्योंकि वे एक दुष्ट विदेशी शासन को लेकर इतने सहज और धीमा विरोध करते थे.

राष्ट्रवादः

आज भी मैं राष्ट्रवाद के खिलाफ नहीं हूं. एक वक्त था जब मैं बेहद कट्टर राष्ट्रवादी था. लेकिन जब हम आजाद हो जाते हैं तो हमें राष्ट्रवाद की जरुरत नहीं होती. यह खसरे की तरह होता है. जब आप बड़े हो जाते हैं तो आपको बच्चों को होने वाली छोटी माता, खसरे जैसी बीमारियां नहीं होतीं. राष्ट्रवाद विदेशी राज की एक बीमारी है. जब कोई आपके सीने पर बैठा हो तो आप निश्चित ही ज्यादा शिद्दत के साथ आजाद होना चाहते हैं. आज़ादी के बगैर आप ऐसी स्थिति में सांस तक नहीं ले सकते. लेकिन जब आप स्वतंत्र हो जाते हैं तो आपको हरदम राष्ट्रवाद का बिगुल फूंकने की जरुरत नहीं. परिपक्व, विकसित देश राष्ट्रवादी नहीं हैं. उनको इसकी जरुरत ही नहीं है. स्विट्जरलैंड चले जाइए, लोग बहुत ज्यादा देशभक्त हैं, लेकिन वे स्विट्जरलैंड को दुनिया का सबसे सुंदर देश बताते नहीं फिरते. इसलिए जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं राष्ट्रवाद को लेकर बचपने की जरुरत नहीं. निश्चित तौर पर देशप्रेम तो होना ही चाहिए. जब देश पर हमला होता है, हमें उसकी रक्षा के लिए आगे आना ही चाहिए. हमें हर रोज इसके लिए त्याग करना ही चाहिए. लेकिन हमें अपने देश की श्रेष्ठता को लेकर पूर्वाग्रह से बचना चाहिए. हमें विदेशियों से घृणा करने की जरुरत नहीं. हमें अपने मिशनरियों को देश के बाहर करने की जरुरत नहीं है. राष्ट्रवाद एक अच्छी चीज है, लेकिन उसका वक्त गुजर चुका. हम इस मुद्दे पर सहज हो सकते हैं.

परिणाम और साधनः

समाजवाद अपने उद्देश्यों की पूर्ति में नाकाम रहा है. यह बड़ी आबादी को न तो समानता दिला सका है और न ही बेहतर जिंदगी. समाजवाद के उद्देश्य अच्छे हैः उस लिहाज से मैं आज भी समाजवादी हूं. अगर आप मुझसे पूछेंगे, क्या मैं लेनिन के ‘मुक्त और समान समाज’ में यकीन करता हूं, तो मैं कहूंगा ‘हां.’ अगर आज़ादी और समानता समाजवाद का उद्देश्य हैं तो मैं इसके साथ हूं. लेकिन जब मैं इसे एक ऐसे हथियार के तौर पर देखता हूं जो न तो आज़ादी देता है और न समानता, केवल प्रताड़ना, गुलामी, असमानता और गरीबी तो इस हथियार को अच्छा मान लेने पर मैं बेवकूफ ही कहलाऊंगा. मैं इतना परंपरावादी भी नहीं कि दकियानूसी से किसी हथियार से चिपका रहूं. मैं यह कहना चाहता हूं कि समाजवाद के उद्देश्य आज भी वैध हैं, लेकिन तौर-तरीके ऊबाऊ और दकियानूसी. इसके तरीके नाकाम साबित हुए हैं. सरकारी योजना, राष्ट्रीयकरण, सामूहिक कृषि ऐसे हथियार हैं जो इस्तेमाल किए जा चुके हैं और नाकाम साबित हुए हैं. कोई बेवकूफ व्यक्ति ही ऐसे हथियारों का इस्तेमाल करता रहेगा, यह जानकर भी कि इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला. हमें अपने उद्देश्य को लेकर खरा होना होगा, तौर-तरीके को लेकर नहीं. मैंने यह महात्मा गांधी से सीखा, जिनसे मैं युवा समाजवादी के तौर पर तर्क-कुतर्क किया करता था. वे कहते रहते थे कि संदिग्ध तौर-तरीकों से आप एक अच्छा परिणाम हासिल नहीं कर सकते. परिणाम और साधन एक-दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन अंत, साधन का औचित्य साबित नहीं कर सकता. हमने अपने अनुभवों से देखा है कि अन्याय, नियंत्रण, दमन, झूठ से मुक्त और समान समाज हासिल नहीं किया जा सकता.

नवउदारवादः

इसलिए समाजवाद की नाकामी के बाद भारत में नवउदारवाद का आगमन हुआ है. यह पश्चिमी उदारवाद और गांधीजी की सोच का मिश्रण है. जब स्वतंत्र पार्टी का गठन किया गया था और मैं उसका कार्यक्रम बना रहा था, तो मैंने लाइफ मैगजीन में लिखा था-यह प्रयास दो विचारधाराओं के मिलन से रंग लाया है. पश्चिमी उदारवाद, जैसा कि समझा जाता है और गांधीजी की सीख. वो कौनसी सीख हैं जिन्हें हम उदारवाद के साथ मिश्रित करने वाले हैं. पहली यह कि परिणाम और साधन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, अगर हम शालीन समाज बनाना चाहते हैं तो हमारे तौर-तरीके भी शालीन ही होने चाहिए. हम दूसरों का हक छीनकर, दीवाला निकालकर या झूठ बोलकर एक मुक्त और समान समाज की स्थापना नहीं कर सकते, जैसा कि साम्यवादी करने का दावा करते हैं. दूसरा, गांधीजी की सरकार में महत्वपूर्ण चीज है लोगों को आज़ादी देना. तीसरा जिन लोगों के पास जिंदगी की अच्छी बातें हैं, संपत्ति है तो वे इसका इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए करें. हम अपनी सुख-सुविधाओं का तो उपभोग करें, लेकिन अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वाह से भी न चूकें. गांधीजी इसे अमीरों का गरीबों के लिए समझौता कहा करते थे. वे कहते थेः हर अमीर को उसकी संपत्ति का इस्तेमाल करने दो, उसे रखने दो, इसे छीनने की किसी को कोई जरुरत नहीं है, लेकिन उसे इसका इस्तेमाल करने दो ताकि उसकी सोच अच्छी हो कि वह ऐसा काम करे जो उसके आसपास मौजूद कम किस्मतवालों का भी भला कर दे.

अब लोकतंत्र के अपने घाटे हैं. मैं लोकतंत्र को लेकर बेहद अभिभूत नहीं हूं. मैं इसकी सीमाओं को जानता हूं, इसमें अंतर्निहित भ्रष्टाचार, इसकी कमजोरियों को पहचानता हूं. विंस्टन चर्चिल एक महान लोकतंत्रवादी थे. उनको जीवन के अंतिम सालों में लोकतंत्र के बारे में पूछा गया. वे लोकतंत्र का मीठा और कड़वा दोनों ही स्वाद चख चुके थे. द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले वे कई साल तक राजनीतिक निर्वासन का सामना कर चुके थे. उन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध के समय लाया गया और विश्वयुद्ध खत्म होते ही फिर कोने में डाल दिया गया. लोकतंत्र का काम करने का यही तरीका है. हम अपने देश में हमारे महान लोगों को इस तरह से कूड़े के ढेर में नहीं डालते और इसीलिए हम नीचे की ओर जा रहे हैं. कुछ देर सोचकर चर्चिल ने कहा, सरकार चलाने के जितने भी ज्ञात तंत्र हैं, लोकतंत्र उनमें सबसे घटिया है-दूसरों की तुलना में. एशिया के महान उदारवादी कार्लोस रोमुलो को एक बार उसी विश्वविद्यालय में कुछ साम्यवादी छात्रों ने आक्रामक तरीके से घेरा था, एक स्पष्ट नीति की घोषणा के लिए. उनसे पूछा गया, कि आप वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी, उन्होंने जवाब दिया आगे जाने वाला. उदारवाद का यही सार है. न बाएं न दाएं, बल्कि बिलकुल सीधे.

(यह आलेख संक्षिप्त रूप में है जो पहली बार अप्रैल, 1983 में Freedom First में प्रकाशित हुआ था)


RECENT NEWS

आज से ट्रंप राज
श्रीराजेश |  20 Jan 2025  |  39
चले गए मन-मोहन
दीपक कुमार |  08 Jan 2025  |  33
क्या ट्रंप भारत-रूस की मित्रता को तोड़ सकते हैं?
आर्यमान निज्हावन, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के शोधकर्ता और विश्लेषक |  27 Dec 2024  |  37
एक देश एक चुनाव : ज़रूरत या महज़ एक जुमला
पंडित पीके तिवारी |  27 Nov 2020  |  236
नारी तुम केवल श्रद्धा हो.. क्यों?
लालजी जायसवाल |  22 Oct 2020  |  252
इस साल दावा ज्यादा और दवा कम
संजय श्रीवास्तव |  03 Jan 2020  |  135
भारती जी यानी गुरुकुल परंपरा का अनुशासन
टिल्लन रिछारिया |  01 Oct 2018  |  294
नफ़ासत पसंद शरद जोशी
टिल्लन रिछारिया |  01 Oct 2018  |  166
खबर पत्रकार से मिले ये ज़रूरी तो नहीं
संजय श्रीवास्तव |  01 Oct 2018  |  39
क्या कभी कानून से खत्म होगी गरीबी?
स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर |  31 May 2017  |  58
महात्मा गांधी की याद में
पांडुरंग हेगड़े |  03 Feb 2017  |  165
To contribute an article to CULT CURRENT or enquire about us, please write to cultcurrent@gmail.com . If you want to comment on an article, please post your comment on the relevant story page.
All content © Cult Current, unless otherwise noted or attributed. CULT CURRENT is published by the URJAS MEDIA VENTURE, this is registered under UDHYOG AADHAR-UDYAM-WB-14-0119166 (Govt. of India)