Cult current ई-पत्रिका (फऱवरी, 2025) राजनीति का नया ‘वाद’: लोकवाद
जलज वर्मा
| 01 Feb 2025 |
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साल 2025, हमने नई दहलीज पर कदम रखते ही हमें वैश्विक राजनीति में एक अनूठा और रोमांचक चलन उभरता दिखाई देने लगा है- ‘पॉपुलिज्म’ अर्थात लोकवाद। वर्तमान दौर की राजनीति अब न सिद्धांतों की बंदिशों में बंधी है और न ही विचारधाराओं की कठोर सीमाओं में कैद। यह जनता की इच्छाओं, उनकी अपेक्षाओं और उनकी ताकत का प्रतिबिंब बनकर उभरी है। दुनिया का नया राजनीतिक युग अब लोकवाद के हाथों में है, और पुरानी विचारधाराएं उस पर असर डालने के लिए संघर्षरत हैं, जैसे एक गुज़रा हुआ वक्त अपनी पहचान की तलाश कर रहा हो।
वह दौर था, जब वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यमार्गी विचारधाराएं — विचारधाराओं की जटिलता से राजनीति को दिशा देते थे, लेकिन अब बीते दिनों की बात होने लगी है। ये वाद, जो कभी जनता की धड़कनों के साथ जुड़कर राजनीति के हर रंग को तय करते थे, अब हाशिए पर खड़े खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की जद्दोजहद में हैं। एक नई लहर, एक नए युग का आगमन हो चुका है—इसका नाम है ‘पॉपुलिज़्म’ या लोकवाद। यह नया वाद न केवल तेजी से उभर रहा है, बल्कि राजनीतिक परंपराओं की दीवारों को तोड़ते हुए पुराने वादों को पीछे छोड़ता जा रहा है। आज की राजनीति एक ऐसी धारा की ओर मुड़ चुकी है जहाँ जनता का सीधा जुड़ाव और उनके सरोकार ही केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। पॉपुलिज़्म ने राइट, लेफ्ट और सेंटर की जड़ों को हिला कर रख दिया है। चाहे भारत हो या अमेरिका और यूरोप के वे देश जहाँ जनता का असंतोष और आकांक्षाएँ नये नेतृत्व की इबारत लिख रही हैं-लोकवाद का परचम हर कोने में लहरा रहा है।
वर्तमान समय में पश्चिमी देशों में वामपंथ एक प्रकार से अस्तित्वहीन स्थिति में पहुंच चुका है। न केवल राजनीतिक स्तर पर, बल्कि सामाजिक परिप्रेक्ष्य में भी वामपंथ की पकड़ अत्यंत क्षीण हो चुकी है। यूरोप के अधिकांश हिस्सों में यह विचारधारा अपने प्रभाव खो चुकी है, और ब्रिटेन शायद इस प्रवृत्ति का एक अपवाद कहा जा सकता है। वहाँ प्रधानमंत्री केर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी अभी भी अस्तित्व में है, लेकिन उसकी स्थिति भी लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। स्टार्मर, जिन्हें एक पारंपरिक वामपंथी नेता के रूप में देखा जाता है, खुद को एलन मस्क जैसे धुर दक्षिणपंथी व्यक्तित्वों के बढ़ते प्रभाव से घिरा पाते हैं। मस्क, जो अपने नवाचारों और राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं, लेबर पार्टी और उसके नेतृत्व के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि ब्रिटेन की लेबर पार्टी भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, जबकि शेष यूरोप में वामपंथ की पहचान लगभग समाप्त हो चुकी है।
दूसरी ओर, दक्षिणपंथ भी अपनी पुरानी शक्ति और तेज खो चुका है। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी, जो परंपरागत रूप से एक मजबूत दक्षिणपंथी आधार वाली पार्टी मानी जाती थी, अब डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक और विभाजनकारी नेतृत्व के कारण अंदरूनी संकट से जूझ रही है। ट्रंप की 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (मागा) आंदोलन ने रिपब्लिकन पार्टी की पारंपरिक दक्षिणपंथी विचारधारा से पूरी तरह दूरी बना ली है। ट्रंप ने अपनी आलोचनात्मक और अपमानजनक रणनीति के तहत पार्टी के प्रमुख नेताओं को निशाना बनाया है, जिससे पार्टी के भीतर विभाजन गहरा हो गया है। निक्की हेली को उन्होंने 'बर्डब्रेन' कहकर अपमानित किया, तो जॉन बोल्टन को 'डंब ऐज़ अ रॉक' कहकर उनकी आलोचना की। इतना ही नहीं, ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी के पुराने स्तंभों, जैसे डिक चेनी और उनकी बेटी लिज़ चेनी, को भी अपने आक्रामक अभियान का हिस्सा बनाया है।
यह साफ तौर पर दर्शाता है कि ट्रंप का 'मागा' आंदोलन अब ग्रैंड ओल्ड पार्टी की परंपरागत दक्षिणपंथी विचारधारा से बहुत दूर जा चुका है। यह एक नई विचारधारा के रूप में उभरा है, जो पारंपरिक दक्षिणपंथ से न केवल भिन्न है, बल्कि उसे चुनौती भी दे रहा है। इस प्रकार, वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों ही पश्चिमी राजनीति में अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं, और नए, उग्र विचारों के बीच सत्ता की लड़ाई छिड़ चुकी है, जो राजनीति के बदलते परिदृश्य का प्रतिबिंब है।
वर्तमान समय में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक विचारधाराओं का परिदृश्य तीव्र गति से बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। यह परिवर्तन सिर्फ मतपेटियों और चुनाव परिणामों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं। आर्थिक विश्लेषक रुचिर शर्मा ने हाल ही में अपने एक लेख में इस प्रवृत्ति की ओर संकेत किया कि जिन विकासशील देशों में हाल के चुनाव हुए, वहां 85% सत्ताधारी दलों को हार का सामना करना पड़ा। यह आँकड़ा न केवल राजनीतिक अस्थिरता की ओर इशारा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पारंपरिक राजनीतिक विचारधाराएं अब जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल हो रही हैं। फ्रांस और इटली जैसे देशों में नई विचारधाराओं का उदय इस बदलाव का प्रतीक है, और जर्मनी भी जल्द ही इसी राह पर चल सकता है। स्पष्ट है कि पारंपरिक वामपंथ और दक्षिणपंथ अपने पुराने रूप में अब संघर्षरत हैं, और दुनिया तेजी से एक नई विचारधारा की ओर अग्रसर हो रही है।
इस नई विचारधारा का नाम है—लोकवाद (पॉपुलिज़्म)। यह एक ऐसा राजनीतिक दृष्टिकोण है जो परंपरागत वाम, दक्षिण और मध्यमार्गी विचारधाराओं को चुनौती दे रहा है। इस आंदोलन के सफलतम प्रतीकों में डोनाल्ड ट्रंप, जियोर्जिया मेलोनी, विक्टर ओर्बन और मरीन ली पेन जैसे नेता शामिल हैं। इन नेताओं की नीतियां और रणनीतियाँ पारंपरिक दक्षिणपंथ से भिन्न हैं, और इन्हें दक्षिणपंथी करार देना एक सरलीकृत दृष्टिकोण होगा। पॉपुलिज़्म का उदय इस बात का प्रमाण है कि जनता अब जटिल विचारधाराओं और भारी-भरकम सिद्धांतों से ऊब चुकी है और उसे सरल, प्रत्यक्ष और व्यावहारिक नीतियों की ओर आकर्षण हो रहा है।
लोकवाद और इसकी परिभाषा पॉपुलिज़्म की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता और व्यावहारिकता में निहित है। यह एक ऐसी विचारधारा है जो जटिल नैतिकता, इतिहास की गहराई या तथ्यों की पेचीदगियों में उलझने के बजाय सीधी और सरल राजनीति की बात करती है। यह लोगों के दैनिक जीवन के मुद्दों को प्राथमिकता देती है और इसीलिए इसकी अपील व्यापक और प्रभावशाली है। पॉपुलिज़्म का यह रूप अब दुनिया के विभिन्न देशों में उभर रहा है, और भारत इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले 'रेवड़ी संस्कृति' का उल्लेख करते हुए इसकी आलोचना की थी, जिसमें वोट पाने के लिए मुफ्त सुविधाएं और सेवाएं देने का प्रलोभन दिया जाता है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया था। लेकिन कर्नाटक चुनाव के बाद भाजपा ने भी इस लोकवादी राजनीति का सहारा लिया और मुफ्त बिजली, पानी और अन्य लाभों की पेशकश की। यह एक स्पष्ट संकेत है कि पॉपुलिज़्म की राजनीति अब मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी है, और यह न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक धारा के रूप में उभर रही है।
पॉपुलिज़्म का यह उदय उन देशों और नेताओं की ओर इशारा करता है, जो तेजी से बदलती दुनिया में लोगों की आकांक्षाओं का प्रत्यक्ष उत्तर देने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ पुरानी विचारधाराएँ और 'इज़्म' जटिलता में उलझे हैं, वहीं पॉपुलिज़्म साधारण, प्रत्यक्ष और लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं पर आधारित राजनीति का पक्षधर है। यही कारण है कि यह आंदोलन आज के समय में राजनीतिक परिदृश्य पर गहराई से अपनी जड़ें जमा रहा है।
भारत में पॉपुलिज्म की राजनीति तेजी से उभर रही है और इसने परंपरागत वामपंथ, दक्षिणपंथ, और मध्यमार्गी विचारधाराओं को पीछे छोड़ दिया है। आज की राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धताएं कमजोर पड़ रही हैं, और आम आदमी पार्टी (आप) जैसी पार्टियों ने खुद को इस बदलाव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया है। ये पार्टियां विचारधारा से अधिक लोकलुभावन नीतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो सीधे जनता की समस्याओं से जुड़ी होती हैं। मुफ्त सुविधाओं का वादा, व्यक्तिगत लाभों की पेशकश, और जन-समर्थक नीतियों का प्रचार वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का प्रमुख स्वरूप बन गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी अब इसी राह पर चल रही है। पहले हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद को अपनी पहचान बनाने वाली भाजपा अब पॉपुलिज्म की राजनीति में विश्वास करती दिख रही है। ‘रेवड़ी संस्कृति’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के बावजूद, हालिया चुनावों में भाजपा ने भी मुफ्त सुविधाओं और लोकलुभावन घोषणाओं को अपनी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। इससे यह स्पष्ट होता है कि विचारधारा-रहित राजनीति ने सभी प्रमुख दलों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है, और पॉपुलिज्म का प्रभाव अब भारत की राजनीति में गहराई से समाहित हो गया है। पॉपुलिज्म का स्वरूप हर देश में भिन्न-भिन्न होता है, और इसका उद्देश्य जनता की भावनाओं को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करना है। विकसित देशों में पॉपुलिज्म अक्सर प्रवासियों के निष्कासन, विदेशी संस्कृतियों के प्रति आशंका, और राष्ट्रवादी नीतियों के रूप में प्रकट होता है। डोनाल्ड ट्रंप, विक्टर ओर्बन, और जियोर्जिया मेलोनी जैसे नेता अपने-अपने देशों में राष्ट्रवाद और लोकलुभावन नीतियों के प्रतीक बन चुके हैं, जो उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाती हैं। दूसरी ओर, भारत जैसे विकासशील देशों में पॉपुलिज्म का रूप थोड़ा अलग है। यहाँ पॉपुलिज्म सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, मुफ्त सुविधाओं, और सीधे जनता से जुड़े मुद्दों के रूप में प्रकट होता है। भारत में लोकलुभावन राजनीति के कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ मुफ्त बिजली, पानी, राशन और अन्य सुविधाओं का वादा आम चुनावी घोषणाओं का हिस्सा बन गया है। पॉपुलिज्म के अंतर्गत ऐसी नीतियां न केवल गरीब और मध्यम वर्ग को लक्ष्य बनाती हैं, बल्कि समाज के सभी वर्गों में लोकप्रियता हासिल करती हैं।
पॉपुलिज्म का उदय इस बात का संकेत है कि पुरानी विचारधाराएं—वामपंथ, दक्षिणपंथ, और मध्यमार्गी—अब अपना प्रभाव खो चुकी हैं। ये विचारधाराएं अब जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ हो रही हैं। पॉपुलिज्म इन पुरानी सीमाओं से मुक्त होकर जनता की प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करता है, और इसका मुख्य उद्देश्य लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान देना होता है। यही कारण है कि पॉपुलिज्म तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है और परंपरागत 'इज़्मों' को पीछे छोड़ रहा है। वर्तमान समय में विचारधारा आधारित राजनीति अब हाशिए पर जा रही है। पॉपुलिज्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी विशिष्ट वैचारिक ढांचे में बंधा नहीं है। यह किसी भी पक्ष की विचारधारा को अपनाने की बजाय, जनता की भावनाओं और आवश्यकताओं के अनुसार खुद को ढालने में सक्षम है।
दुनिया की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात हो चुका है, जिसमें पॉपुलिज्म मुख्य धारा के रूप में उभर रहा है। परंपरागत वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यमार्गी विचारधाराएं अब संघर्ष कर रही हैं, क्योंकि वे आधुनिक मतदाताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। लोकवाद की राजनीति, जो जनता के दिल और दिमाग में सीधे तौर पर अपील करती है, अब वैश्विक स्तर पर प्रभुत्व कायम कर रही है। चाहे भारत हो, अमेरिका हो या यूरोप—पॉपुलिज्म का प्रभाव अब हर जगह महसूस किया जा रहा है। यह राजनीति के एक ऐसे युग की शुरुआत है जहाँ मतदाताओं की अपेक्षाएं और जरूरतें विचारधाराओं पर हावी हो चुकी हैं।