पुस्तकों की ओर वापसी - क्या कागज़ी पाठ्यपुस्तकें ही भविष्य का रास्ता हैं?
संदीप कुमार
| 02 Mar 2025 |
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हाल ही में स्वीडन ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। पंद्रह वर्ष पहले, जब पूरी दुनिया डिजिटल शिक्षा की ओर बढ़ रही थी, स्वीडन ने सबसे पहले कक्षाओं में डिजिटल पाठ्यपुस्तकों को अपनाया। अब, इतने वर्षों के बाद, उन्होंने देखा कि बच्चों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, पढ़ने-लिखने के कौशल में गिरावट आई है। इसलिए स्वीडन ने डिजिटल पुस्तकों को हटाकर फिर से कागज़ी किताबें लाने का फैसला किया है। इसके लिए स्वीडन की सरकार 104 मिलियन यूरो का निवेश कर रही है ताकि विद्यालयों में कागज़ी पुस्तकों का पुनर्प्रवेश किया जा सके।
स्वीडन की शिक्षा एजेंसी को यह जाँचने का कार्य सौंपा गया है कि डिजिटल उपकरणों का उपयोग किस प्रकार हो रहा है और इसका प्रभाव क्या है। इसके आधार पर, वे डिजिटल उपकरणों के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे। अब तक, स्वीडन के प्री-स्कूल पाठ्यक्रम में प्रत्येक बच्चे के लिए डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता अनिवार्य थी, जिसे अब संशोधित कर 'वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त शैक्षणिक समर्थन' के आधार पर 'चुनिंदा' उपयोग तक सीमित कर दिया गया है।
यह प्रवृत्ति केवल स्वीडन तक सीमित नहीं है। फिनलैंड के कुछ स्कूलों में भी डिजिटल-केन्द्रित शिक्षा पद्धति को छोड़कर छात्रों की एकाग्रता बढ़ाने और स्क्रीन के समय को कम करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया में भी शैक्षणिक अधिकारियों ने छात्रों के पढ़ने की क्षमता में गिरावट को लेकर चिंता व्यक्त की है, जिसे आंशिक रूप से स्क्रीन के बढ़ते उपयोग से जोड़ा जा रहा है। विशेषज्ञ अब छात्रों को प्रिंटेड किताबों से पढ़ने और हाथ से लिखने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, ताकि इस संकट से निपटा जा सके।
स्क्रीन-मुक्त शिक्षा का प्रभाव
कैम्ब्रिज, यूनाइटेड किंगडम का हेरिटेज स्कूल, जिसे देश का एकमात्र 'स्क्रीन-मुक्त विद्यालय' माना जाता है, ने यह सिद्ध कर दिया है कि बिना किसी डिजिटल उपकरण के भी सर्वोत्तम शैक्षिक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। इस स्कूल में लैपटॉप, मोबाइल फोन, इंटरनेट, या इंटरैक्टिव व्हाइटबोर्ड का उपयोग नहीं होता है और फिर भी यहाँ के छात्रों ने बेहतरीन शैक्षणिक परिणाम हासिल किए हैं। स्कूल अपनी इस टेक्नोलॉजी-मुक्त शैक्षणिक पद्धति को 'नवोन्मेषी' मानता है और इसे 'एक ऐसा शैक्षणिक दृष्टिकोण, जिसकी कई अभिभावक अपने बच्चों के लिए खोज कर रहे हैं' के रूप में पहचाना जाता है।
अध्ययन बताते हैं कि बच्चों में पढ़ने के कौशल और उनकी स्वतंत्र रूप से पढ़ने की रुचि के बीच एक सहायक संबंध है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों (जैसे कि पीआईआरएलएस और पीआईएसए) ने संकेत दिया है कि बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि में कमी आ रही है। इसका सीधा असर उनके पढ़ने के कौशल पर पड़ता है। जहाँ एक ओर कागज़ी किताबों का पढ़ना कम हो रहा है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया जैसी मल्टीमीडिया सामग्री का उपभोग बढ़ता जा रहा है। यह दर्शाता है कि स्कूल शिक्षा में डिजिटल पाठ्यपुस्तकों की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक हो गया है।
गहन अध्ययन और समझ
अनुसंधान से पता चला है कि कागज़ी पुस्तकों का भौतिक रूप, जैसे उसे पकड़ना, पन्ने पलटना, और उसकी सुगंध, गहरे स्तर पर मस्तिष्क को संलग्न करता है। इससे पाठक जानकारी को अधिक गहराई से समझ पाते हैं। दूसरी ओर, ई-पुस्तकें, जो कि हाइपरलिंक, स्क्रॉलिंग और मल्टीमीडिया सुविधाओं से भरपूर होती हैं, पाठक को अस्थिर और विचलित कर देती हैं। विशेषकर छोटे बच्चों के मामले में, ऑनलाइन पढ़ाई में फोकस और समझ की कमी देखी गई है। डिजिटल पठन भी पाठकों के व्यवहार और पसंद को प्रभावित करता है, जिससे वे धीमे और अधिक सोची-समझी पठन प्रक्रियाओं में रुचि खोने लगते हैं।
2000 से 2017 के बीच किए गए 54 अध्ययनों के एक विश्लेषण में यह निष्कर्ष निकाला गया कि स्क्रीन पर पढ़ाई की तुलना में कागज़ी पठन अधिक प्रभावी है। यह परिणाम पाठकों की आयु, शिक्षा स्तर, पाठ की लंबाई और समझ के प्रकार जैसे कारकों से प्रभावित नहीं हुआ। खासकर समय की कमी वाले स्थितियों में और सूचनात्मक पाठों के संदर्भ में, कागज़ी पठन के लाभ अधिक स्पष्ट थे।
संवेदी संलग्नता और इंटरएक्टिविटी
कई शोध यह दिखाते हैं कि डिजिटल किताबों के मल्टीमीडिया फीचर्स, जैसे संगीत और ध्वनि प्रभाव, चित्रों की एनिमेशन, और अंतर्निर्मित शब्दकोश, छात्रों की रुचि और प्रेरणा को बढ़ाते हैं। हालांकि, इन सुविधाओं का शैक्षणिक प्रभाव पूरी तरह से उनके डिज़ाइन और उनकी प्रासंगिकता पर निर्भर करता है। ई-पाठ्यपुस्तकों को विभिन्न शिक्षण शैलियों के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे विविध कक्षाओं में व्यक्तिगत शिक्षा को लागू करना आसान हो जाता है।
हालांकि, यदि ई-पुस्तकें अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई हैं और उनके उपयोग में शिक्षक की मदद मिलती है, तभी वे कागज़ी पुस्तकों से बेहतर परिणाम दे सकती हैं। लेकिन अगर डिजिटल किताबों में केवल वॉयसओवर या पॉपअप जैसी मामूली विशेषताएँ हैं, तो कागज़ी किताबें बेहतर परिणाम देती हैं। यद्यपि डिजिटल टेक्स्ट छात्रों को संलग्न करने में बेहतर हैं, वे अक्सर केवल सतही संलग्नता ही पैदा करती हैं, क्योंकि छात्रों की एकाग्रता कई बार बिखर जाती है। दूसरी ओर, कागज़ी किताबों से पढ़ाई में छात्रों का ध्यान अधिक केंद्रीत और बिना किसी बाधा के होता है।
स्वास्थ्य संबंधी विचार
बच्चों में स्क्रीन उपयोग पर किए गए स्वास्थ्य अध्ययन मुख्य रूप से इंटरनेट और सोशल मीडिया की लत पर केंद्रित रहे हैं। हालाँकि, कुछ अध्ययन यह भी बताते हैं कि ई-पाठ्यपुस्तकों के लगातार उपयोग से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। इनमें आँखों की थकावट, गर्दन या पीठ में दर्द, और सूखी त्वचा जैसी समस्याएं शामिल हैं। साथ ही, छात्रों में तनाव, घबराहट, और निराशा जैसी मानसिक समस्याएँ भी देखी गई हैं। कागज़ी किताबें, जिनमें स्क्रीन की चमक नहीं होती, बच्चों के शरीर और मन के लिए अधिक आरामदायक पठन अनुभव प्रदान करती हैं।
नीति निर्धारण के लिए संदेश
जहाँ ई-पुस्तकें छात्रों को कुछ लाभ प्रदान करती हैं, वहीं उनके व्यापक उपयोग से पहले उनके दीर्घकालिक प्रभावों की पूरी तरह से समीक्षा करना आवश्यक है। यह जरूरी नहीं है कि डिजिटल पाठ्यपुस्तकों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे मूलभूत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कागज़ी पाठ्यपुस्तकों का पूरक बनें, न कि उनका प्रतिस्थापन।
भविष्य में शिक्षा का स्वरूप एक गतिशील मिश्रण होगा, जहाँ कागज़ी और डिजिटल दोनों माध्यमों का सही संतुलन छात्रों की आवश्यकताओं, उनके शैक्षिक संदर्भों और पाठ्यक्रम उद्देश्यों के अनुसार किया जाएगा।
अर्पण तुलस्यान ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं।