खबर पत्रकार से मिले ये ज़रूरी तो नहीं

श्रीराजेश

 |  01 Oct 2018 |   40
Culttoday

तीन दशक बाद वाली तेज तर्रार पत्रकारिता के इस दौर में भविष्य में समाचारों के ऐसे स्रोतों की बाढ़ आ जायेगी जिनमें से ज्यादातर गैर पत्रकारिक होंगे. कंटेट एजेंसीज, सरकारी स्रोत, कारपोरेशन, शैक्षिक संस्थान, सभागोष्ठी, एनजीओ, बहसें, वैकल्पिक या अल्टरनेटिव न्यूज एजेंसी के अलावा भी दर्जनों नॉनजर्नलिज्म न्यूज प्रोड्यूसर्स होंगे, जिनसे खबरों का प्रवाह इतनी विविधतापूर्ण और भारी मात्रा में होगा कि पत्रकारिता के समुद्र तल का स्तर ऊंचा उठ जायेगा. अधिकतर खबरें नेटवर्क न्यूज होंगी. यानी एक ही खबर में आवश्यकतानुसार विभिन्न स्थानों से लिये गये संवादों का संकलन उसमें शामिल होगा. मूल खबर का उद्भव भले ही एक खास स्थान पर हो, पर उसमें उसी समयांतराल में उस जैसी दूसरी खबरों, उनसे संबंधित ऐसे उद्धरण जो देश-विदेश से उसी समय इकट्ठे किए गये होंगे, साथ ही मिलेंगी. कई समाचार स्रोतों से समाचार जब बहुतायत में आयेंगे तो अधिकतर एक जैसे या अधकचरे होंगे.

कचरा खबरों की अधिकता होगी, पर उसके बावजूद खबरों की गुणवत्ता बहुत बढ़ जायेगी. यह पत्रकारिता की सेहत के लिये एक सुखद संकेत होगा, लेकिन इन ढेर सारी ज़रूरी गैरजरूरी रोचक तथा रुटीन खबरों में देश, समाज हित, सार्थक, सूचनाप्रद तथा वास्तविक अर्थों में समाचार की कसौटियां पूरी करने वाले सूचना अथवा समाचारों को इस आधार पर छांटने में सम्पादकीय विवेक ही काम आयेगा. ऐसे में उसकी चुनौतियां बेहिसाब बढ़ जायेंगी. अपने प्रयोग और अपने खास पाठक वर्ग को आकर्षित करने के लिये समाचार प्रस्तुत करने वाले मंच समाचारों को संपादन प्रक्रिया के दौरान नये सिरे से इनको वैल्यू एडीशन या गुणवत्ता संवर्धन कर फिर से तैयार करेंगे. इस प्रक्रिया को न्यूज क्यूरेशन कहा जायेगा. मल्टीमीडिया का जम कर इस्तेमाल होगा. इस दौर में क्यूरेटेड कंटेंट या न्यूज का ही बोल बाला होगा. अपने पाठकों को आकर्षित करने के लिये समाचार पत्र नये-नये समाचार वर्ग बनायेंगे और उसके तहत उनकी रुचि के समाचार संकलित या संश्लेषित कर परोसेंगे

रोबोरी पोर्टर द्वार समाचारों का संकलन तो नहीं पर लेखन शुरू हो चुका है. पर यह लेखन कुछ खास तरह की बिजनेस खबरों और प्रेस रिलीज बनने तक ही संभव है. इनसे काम लेने वाले बताते हैं कि हम इन्हें नये सिरे से संवरवाने वाले हैं जिससे ये सामान्य विवरण से युक्त खेल समाचार भी लिख सकेंगे, पर हां, हम अभी इनसे राजनीतिक या इस तरह की कोई संवेदनशील खबर नहीं लिखवाने वाले. इनकी लिखी खबरों में भी रचनात्मकता है, पर फिर भी मानवीय कौशल और उसकी पठनीय सरसता तथा खबर की प्रकृति के आधार पर उसके ट्रीटमेंट का अभाव कहीं-कहीं दिखता है. संचार विज्ञानियों का कहना है कि यह समस्या भविष्य में बहुत हद तक दूर हो जायेगी, पर यह पूरी तरह मानवीय विकल्प बन जाये ऐसा न हो सकेगा. रोबोरीपोर्टर के अलावा समाचार कक्ष में विभिन्न तरह के ऑटोमेशन और तरह-तरह की तकनीक का प्रवेश आने वाले समय में होगा और उसका प्रभाव न सिर्फ समाचार की प्रस्तुति पर पड़ेगा बल्कि समाचार के पाठकों, उपभोक्ताओं पर भी. समाचार के क्षेत्र में मोबाइल और डाटा इन दो शब्दों का कब्जा होगा और अधिकतर समाचार संगठन अपने को बाजार और मांग के अनुरूप पुनर्गठित कर बेहद सीमित हो जायेंगे. स्थानीयता और व्यक्तीकरण का समाचार जगत में विशेष स्थान होगा.

स्रोतः गंभीर समाचार

अगले तीन दशकों में समाचारों का सूखा इस कदर दूर होगा कि समाचार परोसने वाले परेशान हो जायेंगे कि वे क्या-क्या और कहां-कहां कैसे इनको परोसें. सूचना और समाचारों का प्रवाह बेहद तीव्र होगा. खबरों की गति इतनी तीव्र होगी कि वर्तमान के ब्रेकिंगन्यूज की परिभाषा बदलनी पड़ जायेगी. लोगों को चौबीसों घंटे सातों दिन खबर देने के नारे की बजाये इंस्टेंट खबर यानी समाचार तत्काल का नारा आम होगा. न्यूजइवेंट या समाचार की कोई ऐसी घटना जिसमें लगातार विकास जारी है जैसे कोई त्रासदी या अन्य कार्यक्रम टीवी पर मुंबई हमले की तरह लाइव ग्लोबल विंडो या खिड़की बन जाये, ऐसा नहीं होगा. बल्कि सोशल मीडिया, टीवी और दूसरे कई माध्यम सामूहिक तौर पर मिलकर इस तरह का साझा वातावरण तैयार करेंगे कि पाठक या दर्शक उस स्थान और घटना विशेष से आभासी स्तर पर जुड़ जायेगा और  प्रत्यक्षदर्शी अथवा वहां पर उपस्थित लोगों से खुद सवाल जवाब कर सकेगा. यह किसी भी जीवंत प्रसारण से कहीं अधिक जीवंत होगा. यह पाठक तब रिपोर्टिंग और उसके रहस्योद्घाटन पर निर्भर नहीं रहेगा. पर इस तेज़ तर्रार पत्रकारिता के उलट इसका एक पहलू स्लो पत्रकारिता का भी होगा. इसके तहत बेहद गहरायी तक खोज करने वाली डाक्यूमेंट्रीज का निर्माण होगा. इनका चलन अभी बहुत कम है भविष्य में इसके प्रति खासा रुझान होगा.

समाचार संगठनों, न्यूज एजेंसियों को बाजार के अनुसार अपने को पुनर्संगठित करना होगा. स्थानीय स्तर की समाचार एजेंसियों का बोलबाला रहेगा. बहुत कम ही बड़ी समाचार एजेंसियां रह जायेंगी. आने वाले समय में तकनीक की कृपा से न्यूज रूम छोटे होंगे. न्यूज-मॉनीटरिंग और न्यूज-मैंनेजमेंट अथवा समाचार प्रबंधन एक बेहद जटिल और तकनीकिपूर्ण तथा एक विशेषज्ञतापूर्ण भूमिका होगी. कुशल और सक्षम समाचार एजेंसी अपने को मांग के अनुसार लगातार बदलते रहने और समाचारों के प्रारूप और प्रस्तुतीकरण में तब्दीली के लिये हर समय तैयार रहेगी. लोग जानने चाहेंगे कि समूचे संसार को छोड़ उनकी अपनी दुनिया में क्या घट रहा है, उनके शहर इलाके और आस पास या फिर उनकी रुचि अथवा पेशे के क्षेत्र में हर क्षण क्या बदलाव क्या समाचार हैं. खबरें वैयक्तिक तौर पर भेजी जाने की व्यवस्था होगी जैसे किसी को अपने मोबाइल पर महज कानपुर की या घाटमपुर की अथवा बिजनेस या गोल्फ की खबर चाहिये, तो यह व्यवस्था समाचार एजेंसिंया सीधे मुहैया करायेंगी. तब समाचार एक सेवा होगी न कि उत्पाद.

मोबाइल और डेटा यानी आंकड़े खबरों की दुनिया में तो शब्दों का खासा चलन होगा. बिग डाटा, जो आज एक कम प्रचलित शब्द है, भविष्य के समाचार जगत का एक बहुप्रचलित शब्द होगा. भविष्य में समाचार प्रस्तुत करने के लिये केवल टीवी, अखबार या वेबपोर्टल अथवा मोबाइल ही नहीं, तमाम अन्य प्लेटफार्म या मंच होंगे. नये समाचार माध्यमों के अनुरूप नयी तरह की प्रस्तुति न सिर्फ समाचार लेखन बल्कि उसके तेवर पर भी असर डालेगी. बेहद रचनात्मक सरल भाषा में, सुनने की कला को समझते हुये बहुत सहज सरल लेखन, सोद्देश्यपूर्णता और भावनात्मकता का सम्मिश्रण तो होगा ही, साथ ही खबरों को एल्गोरिद्म के अनुसार इस तरह लिखा जायेगा कि सामाजिक जिम्मेदारी जन जुड़ाव के अहसास के साथ व्याख्यात्मक, जुड़ाव के और सरस होगी. कुल मिलाकर समाचारों के भविष्य के बारे में समाचार शुभ है.


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