प्राचीन युग से ही समाज में नारी का एक विशेष स्थान रहा है. हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी नारी को पूजनीय एवं देवी तुल्य माना गया है और कहा भी जाता है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:"अर्थात् जहां महिलाओं का सम्मान होता है वही देवता निवास करते हैं. मनुस्मृति के अनुसार, जिस घर में महिलाओं से बुरी तरह से बात की जाती है या उनका सम्मान नहीं किया जाता, ऐसे घर में भगवान भी नहीं रहते. स्त्रियों का सम्मान न करने वाले मनुष्य को हर समय किसी न किसी परेशानी का सामान करना ही पड़ता है. वैसे, भारतमें नारी को विशिष्ट सम्मान के साथ पूजनीय दृष्टि से देखा जाता रहा है और उसे त्याग, प्रेम और करुणा जैसे अनेक भावनाओं का साक्षात मूर्ति माना जाता है. यही बजह है कि उसकी तुलना सीता,सावित्री,दुर्गा, लक्ष्मी, अनसुइया, गायत्री आदि अनगणित देवियों से की जाती रही है.
सवाल उठता है कि आखिर महिलाओं को जब शक्ति स्वरूपा देवी का दर्जा प्रदान किया जाता है,फिर उनके अधिकारों का हनन कर उन्हें शक्तिहीन क्यों बनाया जाता है? यहां तक कि संविधान में भी महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग कर वर्णित नहीं किया गया है बल्कि सभी को नागरिक मानते हुए उनको समान अवसर प्रदान करने की बात कही गई है. महिलाओं को ही नहीं बल्कि महिला और पुरुष दोनों को समान रुप से अनुच्छेद 14, अनु.15,अनु.16,अनु.19 और अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है. महिलाओं की स्थानीय स्वशासन में सक्रिय भागीदारी बन सके इसके लिए एक तिहाई सीट आरक्षित की गई है, जिससे महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाया जा सके. इसी लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु सरकार ने महिलाओं के लिए अनेक योजनाए भी चलाई हैं, जिससे महिलाओं की मदद की जा सके और वे एक गरिमा पूर्ण जीवन व्यतीत कर सके. सरकार ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना चलाया, जिसमें लिंगानुपात के साथ महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सके. महिला उद्यमिता बढ़ाने हेतु कौशल विकास योजना,उज्ज्वला योजना, बालिका शिक्षा योजना आदि भी चलाया गया है.
सर्वविदित है कि महिलाओं के विकास पर ही समूचा समाज का एक स्वस्थ ढांचा खड़ा होता है. कोई भी परिवार, समाज अथवा राष्ट्र तब तक सच्चे अर्थों में प्रगति की ओर अग्रसर नहीं हो सकता, जब तक वह नारी के प्रति भेदभाव, निरादर अथवा हीनभाव का त्याग नहीं करता. लेकिन समाज की मानसिकता आज भी पुरुषों को सबसे ऊपर रखने की बनी हुई है. हमारा समाजिक ढ़ांचा ही ऐसा बना है, जिसमे बच्चों को वंश की प्रगति को बढ़ाने वाला माना जाता है. साथ में, मृत्यु के बाद मुखाग्नि हेतु बेटे की इच्छा की जाती है, जिसकी वजह से महिलाओं पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है, जितना कि लैंगिक समानता लाने बाबत आवश्यक है.
महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाना किसी भी राष्ट्र के निर्माण की पूर्व शर्त होती है. जब महिलाएं सशक्त होती हैं तो समाज की स्थिरता भी सुनिश्चित हो जाती है. महिलाओं का सशक्तीकरण बहुत जरूरी है क्योंकि उनके विचार और मूल्य प्रणाली से अच्छे परिवार,अच्छे समाज और अंततः अच्छे राष्ट्र का भी निर्माण होता है. इसीलिए महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रुप से मजबूत किए बिना कोई भी देश प्रगति की लक्ष्मण रेखा को लाघ नही सकता. स्त्री को मात्र कल्पना रुपी दुर्गा और लक्ष्मी का रुप प्रदान कर सिंहासन पर बैठा देने मात्र से हम समाज को प्रगतिवान नही बना सकते है. संविधान में महिलाओं के लिए इतने प्रावधान होने के बावजूद लैंगिक समानता रिपोर्ट मे देश क्यों नीचे जा रहा है?आखिर क्या कारण है कि भारत का लैंगिक समानता रिपोर्ट 2020 की 153 देशों में भारत 112 वें स्थान पर काबिज है. यूएन रिपोर्ट में भारत में आज भी सत्तर प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी प्रकार की हिंसा से शिकार होती हैं.
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिस देश में नारी को देवी माना जाता है,फिर उस देवी के साथ इतनी भेदभाव क्यों? क्या हमने महिलाओं को देवी का स्वरूप प्रदान कर उनके अधिकारों का हनन करने का अच्छा रास्ता खोज लिया है? वास्तव में आज भी सामाजिक ढ़ाचा ऐसा बना हुआ है जिसमें महिलाओं को दोयम दर्जे का ही माना जाता है,यही बजह है कि आज भी समाज महिलाओं को मनुष्य का दर्जा नहीं दे सका है. सिमोन दबोबा की पुस्तक द "सैकेंड सेक्स" में उल्लेख है कि "स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि समाज द्वारा बनाई जाती है." इसी का परिणाम है कि महिलाओं को शक्ति और अधिकार देने के बाद भी उनकी स्थिति को सुधारा नहीं जा सका है. सवाल उठता है,फिर महिलाओं की स्थिति कैसे सुधरेगी? जबाव है, जब हम सब मानसिक जिहाद की ओर अग्रसर होंगे और उनको झूठे दर्जे आदि के भ्रम से मुक्त कर उनको इंसान के रूप में स्वीकार करेंगे.
ध्यातव्य बात है कि महिलाओं को सशक्त बनाने और उनको सम्मान युक्त जीवन प्रदान करने में महिला के पति का महत्वपूर्ण योगदान होता है. अगर पुरुष अपने पत्नी को सम्मान के साथ सहयोग करे और उसे मनुष्य समझे तो महिलाएं घरेलू हिंसा से मुक्त हो सकती हैं और एक गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकती है. आज पुरुष समाज को यह समझना होगा कि सम्मान करने का मतलब है,बतौर मनुष्य उनका सम्मान किया जाना चाहिए,वहीं महिलाओं को भी यह जानने की दरकार है कि जहां पर उचित बराबरी की बात न हो वहां सम्मान के नाम पर अतिरिक्त सुविधा मांगना गलत है. वैसे तो सदैव महिलाएं यही चाहती हैं कि उनकी उपलब्धियों को लड़की होने से जोड़कर देखने की बजाय उनकी मेहनत और कौशल से जोड़कर देखा जाए और तब उसका सम्मान किया जाए.
गौर करने की बात है कि आज महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या है कि उनको अपने ही घर में उचित सम्मान और अधिकार नही मिल पाता क्योंकि पुरुष प्रधानता की मानसिकता ने महिलाओ के विकास राह में जंजीर डालने का काम किया है. प्रायः देखा जाता है कि महिलाओं को घर के साथ कार्यस्थल पर भी कामों की जिम्मेदारी से दो चार होना पड़ता है. लेकिन महिला का घर से बाहर कार्य करना अथवा उसका उद्यमी होना घर के सदस्यों को मंजूर नही होता. यही बजह है कि बिना पारिवारिक सहयोग के महिलाएं घर से बाहर कार्य करने में असमर्थ है और देश में महिला उद्यमिता मात्र 27 प्रतिशत पर ही सिमटी हुई है. ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक ओर तो हम यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः की बात करते है. लेकिन दूसरी ओर महिलाओं का अनादर करना, उनको सहयोग न करना और उन्हे आर्थिक कमजोर करने की भावना रखते है. वही एक ओर हम सब नारी को श्रद्धा मानते है और दूसरी ओर उससे कटुता का भाव रखते है. क्या पुरुष श्रेष्ठता की मानसिकता महिलाओं को अपना अधिकार दिला पायेंगी? जबाव है, नही. जब तक पुरुष अपना दंभ भरता रहेगा तब तक नारी केबल श्रद्धा मात्र ही बनी रहेगी और उसकी पूजा होती रहेगी लेकिन विकास बाधित रहेगा.
आखिर, पुरुष वर्ग अपने परंपरावादी सामंती विचारधाराओं से ऊपर कैसे उठे? पुरुष तो सदैव से पुरुषत्व और श्रेष्ठता का दंभ भरता आया है. उसे तो स्वयं को महिलाओं का पालनकर्ता मानकर महानता और श्रेष्ठता की अनुभूति होती आयी है. निश्चित तौर पर यही बजह है जिसका परिणाम घरेलू हिंसा के रूप में समाज में प्रकट होता रहा है. लेकिन सवाल है कि पुरुष प्रधान समाज अपनी प्राचीनतम सोच को लेकर उत्तर आधुनिक युग के समाज को नई दिशा प्रदान कर सकता है? जब तक हम अपने विचारों और परंपराओं का आधुनिकीकरण नही करते तब तक समाज में महिलाओं की दशा सुधार पाना संभव नही होगा. महिला और पुरुष दोनो ही समाज के निर्माता हैं. यही आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक के वाहक भी हैं. किसी एक के योगदान न देने पर प्रगति बाधित होगा और देश पतन के गर्त में चला जाएगा. वास्तविकता यह है कि मनुष्य का सामाजिक उत्थान और पतन उसके मानसिकता पर निर्भर करता है क्योकि आजादी के सत्तर साल बाद भी मानसिक क्रांति नहीं हो सकी है और महिलाओं को सशक्त बनाने हेतु अनगिनत प्रयास और प्रावधान के बाद भी उनकी स्थिति मे बेहतर सुधार नही हो पाया है.
परिणामतः,महिलाओं को किसी और मदद की दरकार है और वह है,समाज में मानसिक जिहाद. साथ ही पति को पत्नी के प्रति सम्मान के भाव के साथ बराबरी का दर्जा देना जो उसे सर्वोत्तम मददगार साबित होगा जिसकी आवश्यकता सदियों से महसूस की जा रही है और जिसकी कमी के कारण सभी सरकारी प्रयास विफल होते रहे हैं. आज आवश्यकता है कि नारी तुम केवल श्रद्धा हो से ऊपर उठकर,नारी तुम केवल मनुष्य हो कि बात सभी को करनी होगी तभी महिलाओं का अपना अधिकार और सम्मान प्राप्त हो सकेगा.
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रिसर्चर हैं.)