अरविंद केजरीवाल का उदय भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के रूप में हुआ था, जहाँ उन्होंने अपने समर्थकों को यह भरोसा दिलाया कि वे धर्म, जाति और वर्ग से ऊपर उठकर देश में एक नई राजनीतिक संस्कृति की स्थापना करेंगे। उनके शुरुआती कदमों से यह संदेश साफ़ था कि वह पारंपरिक राजनीति के विपरीत, एक ऐसी व्यवस्था लाना चाहते थे जो पूरी तरह से भ्रष्टाचार मुक्त हो और जनसेवा पर आधारित हो। लेकिन हाल के वर्षों में, केजरीवाल की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया है—जिसे विश्लेषक 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राजनीति के रूप में परिभाषित करते हैं।
हाल ही के एक इंटरव्यू में, केजरीवाल ने स्वयं को हनुमान भक्त के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे बचपन से ही हनुमान जी की पूजा करते आ रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं को सार्वजनिक रूप से साझा किया हो। 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करने से पहले भी, वे हनुमान मंदिर गए थे और मीडिया के कैमरों के सामने हनुमान चालीसा का पाठ किया। यह न सिर्फ़ धार्मिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन है, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि केजरीवाल की राजनीति अब हिंदू प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है।
यह बदलाव केवल धर्म के सार्वजनिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। केजरीवाल ने अपने राजनीतिक मंचों पर रामायण और हनुमान चालीसा का उल्लेख कर विरोधियों पर निशाना साधने का तरीका अपनाया है। यह एक ऐसे नेता के रूप में उनकी छवि से अलग है, जो एक दशक पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ़ खड़ा हुआ था, और जिसकी राजनीति धर्म और जाति से परे थी। इस परिवर्तन का कारण समझने के लिए, हमें पिछले कुछ वर्षों में उनकी राजनीतिक रणनीति पर गौर करना होगा।
केजरीवाल के इस परिवर्तन का मुख्य कारण राजनीतिक लाभप्राप्ति है। जब 2017 के एमसीडी चुनाव में 'आप' को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, तब से केजरीवाल ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। एमसीडी की कुल 270 सीटों में से 'आप' ने मात्र 48 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी ने 181 सीटों पर जीत दर्ज की। इस हार के बाद से केजरीवाल ने जनता से जुड़ने और चुनावी गणित साधने के लिए धर्म और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करना शुरू किया।
2018 में, दिल्ली की 'आप' सरकार ने बुजुर्गों के लिए मुफ्त तीर्थ यात्रा योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत उन्हें अयोध्या, रामेश्वरम, वैष्णो देवी जैसे धार्मिक स्थलों पर ले जाया जाता है। इस कदम से 'आप' ने अपने लिए एक बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक वर्ग तैयार किया, जो विशेषकर हिंदू मतदाताओं को साधने के लिए था।
2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान, केजरीवाल ने नोटों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर छापने की बात कही थी। यह सुझाव सीधा हिंदू भावनाओं को साधने के उद्देश्य से किया गया था, ताकि बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे के समानांतर एक 'सॉफ़्ट हिंदुत्व' की छवि प्रस्तुत की जा सके। केजरीवाल ने यह भी दावा किया कि उनकी सरकार रामराज्य के सिद्धांतों का पालन करती है, जो हिंदू धार्मिक और नैतिक आदर्शों से प्रेरित हैं।
केजरीवाल के इस धार्मिक झुकाव को कई विश्लेषक 'सॉफ़्ट हिंदुत्व' का उदाहरण मानते हैं, जो भारतीय राजनीति में हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव का परिणाम है। 2014 के बाद से, बीजेपी ने 'हिंदुत्व निहित राष्ट्रवाद' को बढ़ावा दिया, जिसने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को चुनौती दी। इसी के तहत कई राजनीतिक दलों ने यह महसूस किया कि केवल धर्मनिरपेक्ष राजनीति से सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।
2018 तक केजरीवाल धर्म के नाम पर राजनीति नहीं करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे एक राजनीतिक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। हनुमान मंदिरों में जाने और हनुमान चालीसा का पाठ करने जैसी गतिविधियाँ इस बात का संकेत हैं कि अब केजरीवाल भी धर्म की राजनीति में उतर चुके हैं। यह बदलाव उनकी पार्टी की व्यापक स्वीकार्यता और चुनावी सफलताओं के लिए ज़रूरी हो सकता है, लेकिन यह उनके पुराने आदर्शों और भ्रष्टाचार विरोधी छवि से अलग है।
चुनावी रणनीति और भविष्य
'आप' ने हाल ही में पुजारी-ग्रंथी योजना की घोषणा की है, जिसमें मंदिरों में काम करने वाले पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों को मासिक वेतन देने का वादा किया गया है। इसके साथ ही, दिल्ली में बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ़ कड़े कदम उठाने का निर्णय भी 'आप' की चुनावी रणनीति का हिस्सा है।
अरविंद केजरीवाल का यह राजनीतिक सफर इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राजनीति में 'सॉफ़्ट हिंदुत्व' का आकर्षण बढ़ रहा है। चुनावी सफलता और व्यापक जन समर्थन पाने के लिए धर्म का सहारा लेना अब सिर्फ़ बीजेपी तक सीमित नहीं रहा है।
दिल्ली की 7 विधानसभा सीटें, जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इनमें सीलमपुर, ओखला, मुस्तफाबाद, चांदनी चौक, बल्लीमारान, मटिया महल और बाबरपुर सीटें प्रमुख हैं। लेकिन केवल मुस्लिम वोटों के सहारे चुनाव जीतने की असंभवता को समझते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब वह हिंदू मतदाताओं को भी साधने की कोशिश में हैं।
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि दिल्ली में कांग्रेस का पतन और उसके वोट बैंक का आम आदमी पार्टी की तरफ शिफ्ट होना इस बदलाव का मुख्य कारण है। कांग्रेस, जो पहले मुस्लिम मतदाताओं का प्रमुख आधार मानी जाती थी, अब आम आदमी पार्टी के आगे कमजोर हो गई है। केजरीवाल को विश्वास है कि मुस्लिम वोट उनके पास सुरक्षित हैं, इसलिए उन्होंने हिंदू प्रतीकों का सहारा लेना शुरू किया है। इसी क्रम में उन्होंने हनुमान मंदिर में माथा टेकना शुरू कर दिया और हनुमान चालीसा का पाठ भी किया। ये बदलाव उनकी 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की छवि को दर्शाता है, जो उन्हें बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व से अलग दिखाता है।
जब दिल्ली दंगों के दौरान अरविंद केजरीवाल ने मुस्लिम समुदाय के दर्द को नहीं सुना, तब यह स्पष्ट हो गया कि केजरीवाल अपने हिंदू वोट बैंक को खोना नहीं चाहते थे। शाहीन बाग़ में चल रहे धरनों से भी दूरी बनाकर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनकी छवि मुस्लिम समर्थक के रूप में न बने, ताकि वे हिंदू मतदाताओं को न खोएं।
दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल का यह रुख एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। एक समय था जब अरविंद केजरीवाल मुस्लिम समुदाय के बीच लोकप्रिय थे, लेकिन अब उन्होंने गोल टोपी की जगह हनुमान की गदा थाम ली है। इस बदलाव का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना है। चुनावी राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है, और हनुमान का चयन करके केजरीवाल ने हिंदुत्व के साथ एक संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।
बीजेपी ने भगवान राम को पहले ही अपने राजनीतिक केंद्र में रखा हुआ है, जबकि केजरीवाल ने हनुमान का चुनाव किया। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में हनुमान चालीसा का पाठ और प्रचार के दौरान हनुमान की गदा लेकर वोट मांगने की उनकी तस्वीरें इस बात का प्रमाण हैं। यह केवल प्रतीकों का चयन है, जिसका उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना है। केजरीवाल बीजेपी को जवाब नहीं दे रहे, बल्कि वे हिंदुत्व के विमर्श का हिस्सा बन गए हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की भी चर्चा हुई है। आम आदमी पार्टी ने 6 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा। बीजेपी का रुख साफ है, वे मुस्लिम समुदाय को चुनावी प्रक्रिया में शामिल नहीं करते। जबकि केजरीवाल मुस्लिमों को भी साधने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी का कट्टर हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से अलग, केजरीवाल एक 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पर हैं, जो उन्हें मुस्लिम समुदाय से दूर नहीं होने देता।
अरविंद केजरीवाल का असली लक्ष्य हिंदू वोट हैं, लेकिन वे मुस्लिम वोटों को छोड़ना भी नहीं चाहते। इस स्थिति में वे एक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें वे दोनों समुदायों के बीच विश्वास को कायम रखने का प्रयास कर रहे हैं।
केजरीवाल एक धर्म विशेष के वोट पाने के लिए दूसरे धर्म के खिलाफ नफरत का व्यापार नहीं कर रहे हैं, बल्कि संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, यह संतुलन केजरीवाल नहीं बना रहे हैं, बल्कि परिस्थिति खुद इसे बना रही है।
आखिर में, दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल की 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की नीति और मुस्लिम वोटों को साधने की कोशिश को एक चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। वह अपने हिंदू वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने के लिए धार्मिक प्रतीकों का सहारा ले रहे हैं, जबकि मुस्लिम वोटों को भी अपने पक्ष में बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। इसका उद्देश्य सत्ता हासिल करना है, और इस रणनीति ने उन्हें दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।
इस चुनावी समीकरण में अरविंद केजरीवाल की सफलता का एक बड़ा कारण यह है कि वे धार्मिक प्रतीकों का सावधानीपूर्वक उपयोग कर रहे हैं, जिससे वे हिंदू और मुस्लिम दोनों मतदाताओं को आकर्षित करने में सक्षम हो रहे हैं। उनका यह संतुलन न केवल दिल्ली की राजनीति में बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक स्थिति में भी एक नया आयाम जोड़ रहा है।