परिसीमन:क्या बदलेगा भारत का संघीय भविष्य?
मनोज कुमार
| 01 Apr 2025 |
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भारत एक संघीय गणराज्य है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 1 में 'राज्यों का संघ' बताया गया है। यह ढांचा, जहां देश की विविधता को एकता के सूत्र में बांधता है, वहीं केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की चुनौतियां भी खड़ी करता है। भारतीय संविधान की धाराओं और संशोधनों के ज़रिए राज्यों को स्वायत्तता देने की कोशिश की गई है, लेकिन अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास ही रहता है। परिसीमन का मुद्दा भी इसी संघीय ढांचे का एक अहम पहलू है, जो राज्यों और केंद्र के बीच सत्ता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करना है, ताकि हर निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या का समान प्रतिनिधित्व हो। हालांकि, जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा 1971 की जनगणना के आधार पर होने वाले परिसीमन को 2026 तक स्थगित कर दिया गया था। अब जब 2026 नज़दीक है, तो परिसीमन का मुद्दा फिर से चर्चा में है, और ऐसा लगता है कि परिसीमन आयोग इस काम को नए सिरे से करेगा। लेकिन अगर यह प्रक्रिया सही तरीके से नहीं हुई, तो यह पुरानी क्षेत्रीय समस्याओं को फिर से उभार सकती है, जैसा कि अतीत में भाषा और राज्य निर्माण से जुड़े आंदोलनों के दौरान हुआ था।
भारतीय संघीय ढांचे की खासियत यह है कि केंद्र और राज्य दोनों के पास अपनी-अपनी शक्तियां और अधिकार हैं, जिनका बंटवारा संविधान के अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची के तहत किया गया है। परिसीमन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 81 और 170 के तहत आती है। अनुच्छेद 81 लोकसभा सीटों के वितरण को नियंत्रित करता है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर राज्य में जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व हो। इसी तरह, अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं की सीटों के पुनर्निर्धारण को विनियमित करता है।
परिसीमन आयोग का गठन जनसंख्या में बदलाव के हिसाब से निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करने के लिए किया जाता है, ताकि हर नागरिक के वोट का महत्व बराबर रहे। लेकिन, जब 1976 में जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए 1971 की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन को स्थगित कर दिया गया, तो यह तय हुआ कि 2026 तक कोई नया परिसीमन नहीं होगा। इस फैसले का मकसद यह था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए, उन्हें उनके प्रयासों के लिए दंडित न किया जाए। अब, जब यह स्थगन खत्म हो रहा है, तो नए परिसीमन को लेकर बहस छिड़ गई है।
अगर 2026 का परिसीमन वर्तमान जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर किया जाता है, तो यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक नए किस्म के राजनीतिक संघर्ष को जन्म दे सकता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सफलता से अपनाए हैं, को यह डर है कि परिसीमन के बाद उनकी लोकसभा में सीटों की संख्या कम हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे उत्तरी राज्य, जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर ज़्यादा रही है, उनकी सीटों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में एक असमानता पैदा हो सकती है, जो संघीय ढांचे में असंतुलन का कारण बन सकती है।
परिसीमन का यह असंतुलन सिर्फ राजनीतिक शक्ति तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वित्तीय और विकासात्मक असमानताओं को भी बढ़ावा दे सकता है। चूंकि भारत की वित्तीय व्यवस्था केंद्रीयकृत है और राज्य सरकारें अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा केंद्र से हासिल करती हैं, इसलिए संसदीय प्रतिनिधित्व राज्य के वित्तीय हितों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। अगर किसी राज्य की लोकसभा सीटें कम होती हैं, तो उसकी केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने की क्षमता भी कमज़ोर हो सकती है।
परिसीमन के बाद क्षेत्रीय और भाषाई असमानताएं भी बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए, अगर उत्तर भारत के राज्यों को लोकसभा में ज़्यादा सीटें मिलती हैं, तो हिंदी भाषी राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है। यह स्थिति गैर-हिंदी भाषी राज्यों, खासकर दक्षिणी राज्यों में सांस्कृतिक और भाषाई असंतोष को जन्म दे सकती है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन पहले से ही इस मुद्दे पर विरोध जता रहे हैं और इसे दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय बता रहे हैं।
इसके अलावा, अगर लोकसभा में ज़्यादा जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ता है, तो इसका असर राजनीतिक और वित्तीय मुद्दों पर भी पड़ेगा, जहां दक्षिणी राज्यों के हित और प्राथमिकताएं पीछे छूट सकती हैं। यह स्थिति संघीय ढांचे की मौजूदा कमज़ोरियों को और बढ़ा सकती है और क्षेत्रीय असंतोष को भड़काने का कारण बन सकती है।
इस परिसीमन संकट का हल ढूंढने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। सबसे आसान उपाय यह हो सकता है कि परिसीमन को फिर से स्थगित कर दिया जाए, जैसा कि एम. के. स्टालिन ने सुझाव दिया है। या यह हो सकता है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाई जाए, ताकि राज्यों की वर्तमान सीटें बनी रहें, लेकिन नई जनसंख्या वास्तविकताओं के अनुसार सीटों का फिर से वितरण हो सके। हालांकि, यह भी एक आदर्श उपाय नहीं होगा, क्योंकि इससे उत्तरी राज्यों की सीटें फिर भी ज़्यादा हो जाएंगी, जिससे दक्षिणी राज्यों का प्रभाव कम हो जाएगा।
और सबसे प्रभावी उपाय यह हो सकता है कि परिसीमन प्रक्रिया में सिर्फ जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन के बजाय विकासात्मक मानदंडों को भी शामिल किया जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सिर्फ जनसंख्या वृद्धि के आधार पर राज्यों को राजनीतिक शक्ति न मिले, बल्कि उनकी शासन और विकासात्मक उपलब्धियों के आधार पर भी उनका प्रतिनिधित्व तय हो।
यह परिसीमन सिर्फ संख्या का खेल नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे विकास, प्रगति और शासन की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इससे भारत के संघीय ढांचे को मज़बूत किया जा सकेगा और एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर आगे बढ़ा जा सकेगा।