विकास की राह पर छूटे गांव

संतु दास

 |  31 Mar 2025 |   179
Culttoday

स्वतंत्र पत्रकार आनंद दत्त ने इंडियास्पेंड के लिए अपनी मार्मिक लेखनी से झारखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। उनकी रिपोर्ट, “झारखंड: खाट की बैसाखी पर टिका आदिवासियों का स्वास्थ्य,” विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था होने का दर्प भरने वाले भारत को यथार्थ का दर्पण दिखाती है। एशिया की तीसरी शक्ति होने के गर्व से अभिभूत राष्ट्र को हाशिये पर पड़ी जिंदगियों को सँवारने का आह्वान करती है। अमरमुनि नागेसिया के असहनीय कष्ट के माध्यम से, यह रिपोर्ट हर विकास सूचकांक को कड़वी सच्चाई से अवगत कराती है। इंडियास्पेंड के पोर्टल पर 18 दिसंबर, 2024 को प्रकाशित होने के तीन महीने बाद भी, स्थितियों में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ है। तेज बहादुर और विकास आर्यन की संवेदी तस्वीरों ने इस रिपोर्ट को जीवंत कर लोगों की संवेदनाओं को झकझोरने का प्रयास किया है। यह सिर्फ अमरमुनि की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों आदिवासी परिवारों की व्यथा है जिनके लिए स्वास्थ्य सेवाएँ एक स्वप्न मात्र हैं। इसी उद्देश्य से, हम इस कहानी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए पुनः साभार परिमार्जित संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि यह विडंबना व्यापक स्तर पर संज्ञान में आए...

 

जीवन की हरीतिमा से आच्छादित झारखंड की लाल मिट्टी, आज आदिवासियों के दर्द और लाचारी की गवाह बनी हुई है। यहाँ, विकास की किरणें अब तक नहीं पहुँची हैं, और आदिवासी समुदाय, सदियों से अपनी जड़ों से जुड़े रहने के बावजूद, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। यहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ खाट की बैसाखी पर टिकी हैं, और हर दिन, हर गर्भवती महिला, मृत्यु के मुँह में झाँकती हुई, अपने बच्चे को जन्म देने की आस में एक अनिश्चित यात्रा पर निकलती है।
बीते 17 अक्टूबर, 2024 की सुबह, आठ महीने की गर्भवती अमरमुनि नागेसिया के लिए भी एक ऐसी ही सुबह थी। यह सुबह सिर्फ एक दिन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि दो जिंदगियों को दांव पर लगाने का एक कठिन फैसला था। एक तरफ स्वयं अमरमुनि की जान थी, और दूसरी तरफ, उनकी कोख में पल रहा बच्चा, जो अभी दुनिया की रोशनी देखने को भी तरस रहा था। अमरमुनि ने अपने ढाई साल के बेटे को प्यार से खाना खिलाया, उसे नहीं पता था कि उसकी माँ आज एक ऐसी यात्रा पर जा रही है, जहाँ से वापसी की कोई गारंटी नहीं है। उसने खुद को तैयार किया, यह तैयारी किसी उत्सव के लिए नहीं, बल्कि एक भयावह यात्रा के लिए थी।
यह तैयारी थी, चार घंटे तक एक टोकरी में बैठकर अस्पताल जाने की। यह टोकरी, कोई आलीशान पालकी नहीं थी, बल्कि लकड़ी और रस्सी से बनी एक अस्थायी व्यवस्था थी, जिसे चार लोग बारी-बारी से अपने कंधों पर उठाकर ले जाने वाले थे। अमरमुनि के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। ढाई साल पहले, जब उनका पहला बच्चा होने वाला था, तब भी उन्हें इसी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।
यह कहानी सिर्फ अमरमुनि की नहीं है, बल्कि झारखंड के उन हजारों आदिवासी परिवारों की है, जिनके लिए स्वास्थ्य सेवाएँ एक सपने से भी बढ़कर हैं। यह कहानी उस भारत की कड़वी सच्चाई है, जहाँ हर दसवां बच्चा बिना डॉक्टर, नर्स, दाई या किसी अन्य स्वास्थ्यकर्मी की मदद के पैदा होता है। यानी जन्म के समय उन्हें किसी भी तरह की स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती है।
आदिवासी लोगों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-21 के आँकड़ों से पता चलता है कि आदिवासी समुदाय में लगभग हर छठा बच्चा बिना किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की मदद के पैदा होता है। झारखंड में 32 जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनमें से आठ को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यहाँ ऐसे बच्चों के जन्म की संख्या पूरे देश में पाँचवें नंबर पर सबसे ज़्यादा है।
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, “स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपस्थिति और परिवहन की कमी के कारण कमजोर जनजातियाँ समय पर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं।” साल 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में जनजातीय लोगों की आबादी 8.6 मिलियन है, जो राज्य की आबादी का 26% है। यह राष्ट्रीय आँकड़े 8.6% से तीन गुना ज़्यादा है।
अमरमुनि नागेसिया के पिता, सुखदेव नगेसिया, और गाँव के ही दो लोगों ने लकड़ी की टोकरी से पालकी बनाई और उसे रस्सियों से बाँस पर बाँध दिया। अमरमुनि को प्रसवपूर्व जाँच के लिए उनके गाँव से लगभग सात किलोमीटर दूर महुआडांर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाना था। किसान जनजाति की 26 वर्षीय अमरमुनि नगेसिया अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थीं।
झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 178 किलोमीटर दूर, लातेहार जिले के महुआडांर ब्लॉक के जंगलों के बीचोबीच ग्वालखार गाँव बसा है। गाँव की आबादी लगभग 1,500 है, जिसमें ज़्यादातर लोग किसान, कोरवा और बिरिजिया जनजाति के हैं। इन समुदायों के लिए महुआडांर जाने का मतलब है, उन खतरनाक रास्तों से होते हुए निकलना, जहाँ पर कोई साइकिल तक नहीं चलती है। बारिश और खराब मौसम की स्थिति में यह रास्ता और भी जोखिम भरा हो जाता है।
“ट्राइबल हेल्थ इन इंडिया” रिपोर्ट के अनुसार, 81.8% जनजातीय महिलाओं को प्रसवपूर्व केवल एक जाँच मिलती है, वहीं केवल 15% जनजातीय महिलाओं को तीन प्रसवपूर्व जाँच मिल पाती हैं। यह देश में किसी भी समुदाय के बीच सबसे कम दर है।
अमरमुनि टोकरी में बैठ जाती हैं, और गाँव के दो लोग उसे उठाकर चल देते हैं। बड़े-बड़े पत्थर, तो कहीं कंटीले झाड़, पहाड़ की चढ़ाई को पार करना आसान नहीं है। लगभग दो घंटे लगातार चलने के बाद सब लोग एक जगह रुककर थोड़ा आराम करते हैं। थकान से चूर, उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं।
सुखदेव कहते हैं, “यहाँ हालात बहुत खराब हैं। बीती रात हुई बारिश ने रास्ते को और भी फिसलन भरा बना दिया है। अगर कोई फिसल गया, तो पता नहीं, माँ और बच्चे का क्या होगा।” उनकी आवाज़ में डर और लाचारी साफ़ झलक रही थी।
स्थानीय स्वास्थ्य सहिया, प्यारी नेगेसिया कहती हैं, “झारखंड में यह स्थिति आम है। यहाँ, खासकर जंगलों में रह रहे आदिवासी समुदायों के लिए स्वास्थ्य केंद्र पहुँच से काफ़ी दूर हैं।” प्यारी, जो खुद इसी समुदाय से आती हैं, इन मुश्किलों को अपनी आँखों से देखती आ रही हैं।
ग्वालखार में मई 2023 की एक घटना को याद करते हुए, 46 वर्षीय स्वास्थ्य सहिया ने बताया कि एक महिला ने घर पर ही बच्चे को जन्म दिया। उसे बहुत ज़्यादा रक्तस्राव होने लगा, तो उसे महुआडांर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। उसकी हालत गंभीर थी, इसलिए उसे वहाँ से लगभग 90 किलोमीटर दूर लातेहार के जिला अस्पताल में रेफर कर दिया गया। लेकिन बहुत ज्यादा रक्तस्राव के कारण अस्पताल में ही उसकी मौत हो गई। प्यारी की आँखों में उस दिन का दर्द आज भी ताज़ा है।
प्यारी ने बताया, “तीन साल पहले एक और महिला को प्रसव के दौरान बहुत दर्द होने पर, इसी तरह टोकरी में लादकर अस्पताल ले जाया गया था। प्रसव पीड़ा तेज हो जाने पर, उसे गाँव की महिलाओं की मदद से बीच जंगल में बच्चे को जन्म देना पड़ा।”
“ट्राइबल हेल्थ इन इंडिया” रिपोर्ट के अनुसार, एक चौथाई से ज़्यादा, यानी 27% आदिवासी महिलाएँ घर पर ही बच्चे को जन्म देती हैं, जो सभी जनसंख्या समूहों में सबसे अधिक है।
चार घंटे लंबे इस फिसलन भरे पहाड़ी रास्ते पर अमरमुनि के साथ रहीं प्यारी ने बताया कि ऐसी स्थिति चाईबासा, गुमला, साहिबगंज, पाकुड़, सिमडेगा, खूंटी और यहाँ तक कि राज्य की राजधानी रांची जैसे इलाकों में भी आम है। इन इलाकों में रहने वाले आदिवासी लोग अक्सर चिकित्सा सुविधाओं के लिए ऐसे मुश्किल रास्तों और दूसरे आदिवासियों की मदद पर निर्भर रहते हैं। यह एक दुष्चक्र है, जहाँ गरीबी और अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी और मृत्यु का कारण बन जाते हैं।
यह पूछे जाने पर कि स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने की यह समस्या कब से है, सुखदेव बताते हैं, “दो या तीन पीढ़ियों से ज़्यादा समय से ऐसा ही चलता आ रहा है। सड़क का न होना हमेशा से समस्या रहा है। हम लगातार सड़क की माँग करते आ रहे हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है। सड़क न होने की वजह से लोग मरते हैं। हमारे गाँव के तीन या चार बच्चे पहले ही मर चुके हैं। साल 2021 में मेरी पत्नी को लकवा मार गया। हमारे पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे, तो वह भी मर गई। हम क्या कर सकते हैं?” सुखदेव का सवाल एक चीख है, जो विकास के दावों पर सवाल उठाती है।
ये चुनौतियाँ सिर्फ़ झारखंड तक ही सीमित नहीं हैं। बीते 27 सितंबर को आंध्र प्रदेश के पिंजरीकोंडा गाँव की एक गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने के लिए उफ़नते बाँध से एक नाले को पार करना पड़ा था। हर साल, ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जो देश के दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को उजागर करते हैं।
ग्वालखार जैसे वन गाँवों में सड़कों का अभाव नौकरशाही और पर्यावरण नियमों के बीच फँसा मसला है। विकास और पर्यावरण के बीच एक जटिल संघर्ष है, जिसमें आदिवासी समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होता है।
वन और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले 17 छोटे-बड़े स्वयंसेवी संगठनों के मंच, झारखंड वन अधिकार मंच (जेवीएएम), और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस द्वारा किए गए 2021 के एक संयुक्त सर्वेक्षण में पाया गया कि झारखंड में वन क्षेत्रों में 14,850 गाँव हैं।
झारखंड वन अधिकार मंच के संयोजक, सुधीर पाल के अनुसार, अगर प्रति गाँव 100 लोगों को भी लिया जाए, तो इस अनुमान के साथ भी लगभग 14.8 लाख लोग इन दूरदराज के क्षेत्रों में रहते हैं, और उनमें से कई आपात स्थिति में अस्पतालों तक पहुँचने के लिए खाट जैसे अस्थायी परिवहन पर निर्भर रहने के लिए मजबूर हैं।
हाल ही में झारखंड में हुए विधानसभा चुनावों में, कई लोगों ने बुनियादी ढाँचा मुहैया कराने में सरकार की विफलता का विरोध करते हुए चुनावों का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया था। उदाहरण के लिए, बोकारो जिले के टुंडी निर्वाचन क्षेत्र के बामनाबाद गाँव और गिरिडीह जिले के बेंगाबाद ब्लॉक के ताराटांड गाँवों को ही लें। यहाँ के निवासियों ने वन गाँवों की श्रेणी में नहीं आने के चलते चुनाव का बहिष्कार किया। यह बहिष्कार, सिस्टम के प्रति आक्रोश और बदलाव की आस का प्रतीक था।
पर्यावरण मंत्रालय ने दिसंबर 2023 में संसद को बताया कि भारत में लगभग 6,50,000 गाँव हैं, जिनमें से 1,70,000 गाँव जंगलों के पास स्थित हैं। लगभग 30 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं। वन और पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वय की कमी, इन गाँवों में विकास की राह में एक बड़ी बाधा है।
संसद में साल 2021 में दिए गए जवाब में कहा गया था कि झारखंड के आदिवासी इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के 142 पद खाली पड़े हैं। केंद्रीय बजट 2023-24 में 42 मंत्रालयों/विभागों के कुल योजना बजटीय आवंटन में से अनुसूचित जनजातियों के लिए विकास कार्य योजना (DAPST) निधि के रूप में 1,17,944 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। बजट आवंटन तो होता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उसका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है।
हालिया विधानसभा चुनाव 2024 में, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के घोषणापत्रों में राजनीतिक वादे किए गए। इसमें 5,000 परिवारों पर एक एम्बुलेंस, प्रत्येक पंचायत में एक स्वास्थ्य उप-केंद्र, स्वास्थ्य कर्मियों के मानदेय में 50 फीसदी की वृद्धि और स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करने जैसे वादे शामिल थे। चुनावों के दौरान किए गए वादे, अक्सर चुनावी जुमले बनकर रह जाते हैं, और आदिवासी समुदाय, हर बार नई उम्मीदों के साथ ठगा हुआ महसूस करता है।
 

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पार्टियों के इन घोषणाओं पर सुधीर पाल कहते हैं, “ये वादे कागज़ पर तो अच्छे लगते हैं, लेकिन वे बुनियादी समस्याओं को हल करने में विफल रहते हैं। बड़ा सवाल ये हैं कि इन दूरदराज के गाँवों तक वास्तव में कैसे पहुँचा जाए। सड़कें बनाने या बुनियादी ढाँचे में सुधार की स्पष्ट योजनाओं के बिना ये वादे सिर्फ़ खोखले बयानबाज़ी बनकर रह जाते हैं।”
झारखंड के स्वास्थ्य सचिव, अजय कुमार सिंह ने इस पूरी स्थिति पर सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि राज्य में स्वास्थ्य सुविधा पहुँचाने के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट काम कर रही हैं। सिंह ने कहा, “एक तरह से ये यूनिट ओपीडी सेवाएँ देती हैं, लेकिन जिन इलाकों या गाँवों में सड़कें नहीं हैं, वहाँ ये यूनिट भी काम नहीं कर पाती हैं। ऐसे इलाकों में ग्रामीण विकास विभाग को काम करना होगा।” पूरे राज्य में 100 से ज़्यादा यूनिट काम कर रही हैं। मोबाइल मेडिकल यूनिट, एक तात्कालिक समाधान है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए बुनियादी ढाँचे का विकास ज़रूरी है।
पिछले 15 सालों से महिला अधिकारों के लिए काम कर रहीं, ध्वनि फाउंडेशन की झारखंड स्टेट ट्रेनर, रेशमा कहती हैं कि वन क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को लगातार नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है।
उन्होंने कहा, “इस चुनाव में इन मुद्दों पर कुछ नहीं बोला गया। इस बार मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना से लाभान्वित महिलाओं ने मौजूदा सरकार के पक्ष में भारी मतदान किया है। सरकार को अब उन्हें बेहतर सड़कें और स्वास्थ्य सेवाएँ देकर जनता के प्रति अपना आभार व्यक्त करना चाहिए।”
“हमारी सरकार का मुख्य लक्ष्य हर झारखंडी की सेवा करना और उनके कल्याण को सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से उन लोगों का जो दूर-दराज के क्षेत्रों में रहते हैं,” झारखंड के मुख्यमंत्री, हेमंत सोरेन ने कहा। “चाहे वे जंगलों के गाँवों में रहते हों या अन्य दुर्गम क्षेत्रों में, उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा प्रदान करना हमारी प्राथमिकता बनी हुई है।
“हम स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए एक व्यापक योजना तैयार कर रहे हैं, जिसमें स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और वन विभाग के समन्वय से मोटर चलने योग्य सड़कों का निर्माण शामिल है। हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक, चाहे वह कितना भी दूर क्यों न हो, बिना किसी बाधा के आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं तक पहुँच सके,” उन्होंने कहा।
महि‍या सम्मान योजना के बारे में बात करते हुए, सोरेन ने कहा, “यह महत्वाकांक्षी सामाजिक कल्याण योजना महिलाओं और उनके परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर केंद्रित है। ₹2,500 की मासिक वित्तीय सहायता के साथ, 50 लाख से अधिक महिलाएँ इस कार्यक्रम से लाभान्वित हो रही हैं। यह सिर्फ़ वित्तीय सहायता नहीं है—यह महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
झारखंड वन अधिकार मंच के संयोजक, जॉर्ज मोनोपल्ली ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम 2006 में एक बड़ी खामी है। इसमें वन गाँवों में एक हेक्टेयर ज़मीन पर मकान बनाने की इजाज़त दी गई है, लेकिन सिर्फ़ 75 पेड़ काटने की अनुमति मिलती है। इससे जंगल के अंदरूनी गाँवों तक सड़कें बनाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि ये गाँव अक्सर मुख्य सड़क से कई किलोमीटर दूर होते हैं।
मोनोपल्ली का मानना है कि इसका समाधान एक स्पष्ट और कारगर योजना में छिपा है। उन्होंने कहा, “राज्य सरकार को सड़कों की ज़रूरत वाले क्षेत्रों की एक सूची तैयार की जानी चाहिए, उनकी दूरी मापनी चाहिए और अनुमति के लिए केंद्रीय वन मंत्रालय से संपर्क करना चाहिए।”
झारखंड के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ), लाल रत्नाकर सिंह के अनुसार, “यह सही है कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत प्रति हेक्टेयर 75 पेड़ों की कटाई की अनुमति है। लेकिन इसके बावजूद जंगल के उन इलाकों में सड़कें बनाई गई हैं, जहाँ बहुत कम लोग रहते हैं।”
सिंह कहते हैं, “अगर सरकार और वन विभाग चाहें तो जंगल में कहीं भी ऑल वेदर रोड (बारहमासी सड़कें) बनाई जा सकती हैं। चूँकि ऐसी जगहों पर गाँव दूर-दूर पर हैं, वहाँ बहुत कम लोग रहते हैं, इसलिए सरकार उन पर ध्यान नहीं देती। यहाँ रहने वाले लोग अपनी समस्याएँ भी ठीक से उन तक नहीं पहुँचा पाते हैं।”
करीब चार घंटे पैदल चलने के बाद, सुखदेव, गाँव वाले और स्वास्थ्यकर्मी नज़दीकी सड़क पर पहुँचे, जहाँ एक एम्बुलेंस अमरमुनि का इंतज़ार कर रही थी। अमरमुनि की आँखों में थकान और राहत के मिले-जुले भाव थे।
जन स्वास्थ्य अभियान के ग्लोबल कोऑर्डिनेटर, त्यागराजन सुंदररामन का कहना है कि अगर लोगों को अस्पताल जाने के लिए चार घंटे पैदल चलना पड़े, तो यह बहुत बड़ी नाकामी है। केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति के गाँव से एक किलोमीटर के अंदर सड़क हो, जो पूरे साल खुली रहे। 2011-12 में झारखंड के दूरदराज इलाकों का नक्शा बनाया गया था, ताकि गर्भवती महिलाओं के लिए अस्पताल एक घंटे के भीतर पहुँच में हों। लेकिन पैसे की कमी और सरकार की लापरवाही के कारण इस पर काम में देरी हुई है।
झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री, डॉ. इरफान अंसारी ने हाल ही में विभाग संभाला है। उन्होंने कहा, “देखिए आठ-दस किलोमीटर सफर करने से कोई नहीं मरता है। अगर कोई मरता है तो उसे पहले से कोई न कोई गंभीर बीमारी रही होगी।” स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
वह आगे कहते हैं, “मैंने तय किया है कि डॉक्टर जिस जिले का रहने वाला है, उसे वहीं पोस्टिंग दी जाए। इससे कोई भी डॉक्टर उन इलाकों में जाने से इंकार नहीं करेगा। और साथ ही वेतन बढ़ाने पर भी बातचीत चल रही है। महुआडांर अस्पताल की स्थिति अभी मेरी जानकारी में आई है, मैं उसे बेहतर बनाने का वादा करता हूँ।”
स्वास्थ्य सहिया, प्यारी नगेसिया ने एनीमिया, पोषण संबंधी कमियों और अपर्याप्त चिकित्सा सलाह की कमी से जूझ रही, ऐसे इलाकों की गर्भवती महिलाओं के संघर्षों के बारे में भी बताया।
यूनिसेफ कहता है कि गर्भवती महिलाओं को दिन में तीन बार अच्छा और घर का बना खाना खाना चाहिए। साथ ही उन्हें हल्का नाश्ता और तीन से पाँच बार फल और सब्ज़ियाँ भी लेनी चाहिए। खाने में साबुत अनाज, प्रोटीन और हरी पत्तीदार सब्ज़ियों से भरपूर आहार ज़रूरी है। इसके अलावा आयरन, फोलिक एसिड और कैल्शियम सप्लीमेंट्स के साथ-साथ हाइड्रेशन के लिए भरपूर मात्रा में साफ़ पानी पीने की सलाह दी जाती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं को टिटनेस के इंजेक्शन लगवाने, 100 फोलिक एसिड की गोलियाँ लेने और दूध से बने उत्पाद व हरी सब्ज़ियाँ खाने की सलाह दी जाती है। इन ज़रूरी चीज़ों की कमी के कारण, गर्भधारण में कई जटिलताएँ पैदा होती हैं, जिससे अक्सर प्रसव लंबा हो जाता है। ऐसे में कभी-कभी घर पर प्रसव कराना एक जोखिम भरा हो जाता है।
प्यारी कहती हैं, “अनिवार्य जाँच करवाने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँचना तो दूर की बात है, जब भारी बारिश होती है तो गर्भवती महिलाओं के लिए फोलिक एसिड जैसी दवाएँ भी गाँव तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ सकता है।”
एनएफएचएस-5 के अनुसार, झारखंड ग्रामीण क्षेत्र में 5 वर्ष से कम आयु के 42% बच्चे बौने (उम्र के हिसाब से लंबाई) हैं, 22.3% बच्चे कमजोर (ऊंचाई के हिसाब से वजन) हैं, 8.8% बच्चे गंभीर रूप से कमजोर हैं, जबकि 5 वर्ष से कम आयु के 41.14% बच्चे कम वजन के हैं। कुपोषण, आदिवासी बच्चों के जीवन पर एक काला साया बनकर मंडरा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, गर्भवती महिलाओं को 8वें से 14वें सप्ताह (डेटिंग स्कैन) और फिर 18वें से 22वें सप्ताह (एंटे स्कैन) के बीच अल्ट्रासाउंड करवाना ज़रूरी है। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान हार्मोन (एचसीजी), थायरॉइड फंक्शन, शुगर लेवल, हीमोग्लोबिन और ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) की जाँच की सलाह भी दी जाती है।
प्यारी ने कहा, “जंगलों में बसे गाँवों में गर्भवती महिलाओं के लिए इनमें से कोई भी चीज़ आसानी से उपलब्ध नहीं है।” आधुनिक चिकित्सा जाँचों की कमी, गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डालती है।
भारत में 23% आदिवासी बच्चे घर पर ही जन्म लेते हैं। एनएफएचएस-5 के अनुसार, झारखंड (ग्रामीण) में शिशु मृत्यु दर 41.4 है, वहीं नवजात मृत्यु दर 30.4 है, जबकि पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 1,000 जीवित जन्मों पर 49.2 है। यहाँ यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली मातृ स्वास्थ्य सेवाएँ अक्सर आदिवासी लोगों की स्वास्थ्य संबंधी मान्यताओं और तरीकों के अनुरूप नहीं होती हैं। सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ, स्वास्थ्य सेवाओं का वितरण ज़रूरी है।
ग्वालखार की एक अन्य स्वास्थ्य सहिया, जसिंता कोरवाइन ने बताया कि स्वास्थ्य केंद्र के ब्लड प्रेशर, शुगर और ब्लड टेस्ट करने वाले उपकरण चार साल से खराब पड़े हैं। जसिंता ने कहा, “नए उपकरण खरीदने के लिए राज्य सरकार ने अक्टूबर 2024 में धनराशि स्वीकृत की थी, लेकिन केवाईसी नहीं होने के कारण इसे अभी तक खरीदा नहीं जा सका है।” लाल फ़ीताशाही और भ्रष्टाचार, विकास की राह में एक बड़ी बाधा हैं।
प्रसवपूर्व जाँच गर्भावस्था के दौरान कम से कम तीन बार होनी चाहिए, जो उपकरणों और सुविधाओं की कमी के चलते सिर्फ़ एक या दो बार ही हो पाती है। जसिंता कहती हैं कि पर्याप्त संसाधनों के अभाव में, स्वास्थ्य कर्मियों को भी अपने काम को सही ढंग से करने में मुश्किल होती है।
लातेहार के सिविल सर्जन, अवधेश सिंह कहते हैं, “मशीनें स्वास्थ्यकर्मियों (सहिया) के पास नहीं रखी जाती हैं। उन्हें आंगनबाड़ी केंद्रों में रखा जाता है और स्वास्थ्यकर्मी वहीं से उनका इस्तेमाल करते हैं। खराब मशीनों को बदलने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है।” जवाबदेही और जवाबदेही का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
जसिंता आगे बताती हैं, “हमें तो साफ़ पानी भी नसीब नहीं होता है। हम चुआं (पहाड़ी नदियों के गड्ढों में जमा पानी) से पीते हैं। साफ़ पानी की कमी और भी कई तरह की बीमारियों को लेकर आती है।” स्वच्छ पानी की कमी, आदिवासी समुदाय के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला एक और महत्वपूर्ण कारक है।
झारखंड और भारत भर के अन्य आदिवासी क्षेत्रों में लगभग यही स्थिति है, जहाँ पानी की गुणवत्ता खराब है और स्वास्थ्य सेवाएँ दुर्लभ हैं।
झारखंड वन अधिकार मंच के सुधीर पाल, एक संभावित कानूनी उपायों पर बात करते हैं। वे कहते हैं, सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) समझौते की धारा 3-2 के तहत, अगर ग्राम सभा मंजूरी दे, तो सामुदायिक विकास के लिए 1 हेक्टेयर तक की वन भूमि आवंटित की जा सकती है, जिसमें सड़कें, स्वास्थ्य केंद्र और पानी के साथ-साथ दूरसंचार सुविधाओं के लिए ज़मीन का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस अधिनियम के तहत प्रति हेक्टेयर 75 पेड़ काटे जा सकते हैं।
मोनोपल्ली का मानना है कि इसका समाधान एक स्पष्ट और कारगर योजना में छिपा है। उन्होंने कहा, “राज्य सरकार को सड़कों की ज़रूरत वाले क्षेत्रों की एक सूची तैयार की जानी चाहिए, उनकी दूरी मापनी चाहिए और अनुमति के लिए केंद्रीय वन मंत्रालय से संपर्क करना चाहिए।”
झारखंड के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ), लाल रत्नाकर सिंह के अनुसार, “यह सही है कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत प्रति हेक्टेयर 75 पेड़ों की कटाई की अनुमति है। लेकिन इसके बावजूद जंगल के उन इलाकों में सड़कें बनाई गई हैं, जहाँ बहुत कम लोग रहते हैं।”
सिंह कहते हैं, “अगर सरकार और वन विभाग चाहें तो जंगल में कहीं भी ऑल वेदर रोड (बारहमासी सड़कें) बनाई जा सकती हैं। चूँकि ऐसी जगहों पर गाँव दूर-दूर पर हैं, वहाँ बहुत कम लोग रहते हैं, इसलिए सरकार उन पर ध्यान नहीं देती। यहाँ रहने वाले लोग अपनी समस्याएँ भी ठीक से उन तक नहीं पहुँचा पाते हैं।”
करीब चार घंटे पैदल चलने के बाद, सुखदेव, गाँव वाले और स्वास्थ्यकर्मी नज़दीकी सड़क पर पहुँचे, जहाँ एक एम्बुलेंस अमरमुनि का इंतज़ार कर रही थी।
जन स्वास्थ्य अभियान के ग्लोबल कोऑर्डिनेटर, त्यागराजन सुंदररामन का कहना है कि अगर लोगों को अस्पताल जाने के लिए चार घंटे पैदल चलना पड़े, तो यह बहुत बड़ी नाकामी है। केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति के गाँव से एक किलोमीटर के अंदर सड़क हो, जो पूरे साल खुली रहे। 2011-12 में झारखंड के दूरदराज इलाकों का नक्शा बनाया गया था, ताकि गर्भवती महिलाओं के लिए अस्पताल एक घंटे के भीतर पहुँच में हों। लेकिन पैसे की कमी और सरकार की लापरवाही के कारण इस पर काम में देरी हुई है।
आदिवासी समुदाय के सामने, आज भी कई चुनौतियाँ खड़ी हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और सरकारी उदासीनता, उनकी ज़िंदगी को मुश्किल बना रही हैं।
झारखंड में आदिवासी समुदाय की दुर्दशा, एक ऐसी कहानी है, जो हमें विकास के दावों पर सवाल उठाने को मजबूर करती है। यह एक ऐसी कहानी है, जो हमें याद दिलाती है कि विकास सिर्फ़ ऊँची इमारतों और चमकती सड़कों का नाम नहीं है, बल्कि हर नागरिक के जीवन स्तर को सुधारने का नाम है।
अमरमुनि नागेसिया, उस दिन अस्पताल पहुँच तो गईं, लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। उनकी तरह, हजारों आदिवासी महिलाएँ आज भी एक बेहतर कल की आस में जी रही हैं। उनकी उम्मीदों को साकार करने के लिए, हमें मिलकर काम करना होगा। हमें उनकी आवाज़ बनना होगा, और सरकार को उनकी समस्याओं के समाधान के लिए मजबूर करना होगा।
आज, जब हम विकास के नए आयामों की बात करते हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। हमें यह याद रखना होगा कि सच्चा विकास वही है, जो हर नागरिक को साथ लेकर चले, जो किसी को भी पीछे न छोड़े। क्या हम आदिवासी समुदाय के लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर पाएँगे? क्या हम खाट की बैसाखी को हटाकर, उन्हें आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ दिला पाएँगे? यह सवाल, आज हर उस व्यक्ति से है, जो एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज का सपना देखता है।
अमरमुनि की तरह, आज भी हजारों आदिवासी महिलाएँ एक बेहतर कल की आस में जी रही हैं। उनकी उम्मीदों को साकार करने के लिए, हमें मिलकर काम करना होगा। हमें उनकी आवाज़ बनना होगा, और सरकार को उनकी समस्याओं के समाधान के लिए मजबूर करना होगा। तभी हम सच्चे अर्थों में एक विकसित और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर पाएँगे।

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