गेम ऑन, पेरेंट्स ऑफ़ ?

संदीप कुमार

 |  02 Sep 2025 |   229
Culttoday

लोकसभा ने पिछले सप्ताह ऑनलाइन गेमिंग विधेयक, 2025 पारित किया। इसके वादे सादे और सशक्त हैं—ऑनलाइन गेमिंग को सुरक्षित बनाना, ख़ासकर बच्चों के लिए। इसमें स्पष्ट तौर पर दांव लगाने पर पाबंदी है, बच्चों के लिए खेलने का समय सीमित करने का प्रावधान है, और गेमिंग कंपनियों को जवाबदेह ठहराया गया है। सबसे अहम बात: अब नाबालिग बच्चे तभी ऑनलाइन गेम खेल सकेंगे जब उनके माता-पिता अनुमति देंगे।
सुनने में यह बेहद सरल लगता है। लेकिन असलियत इतनी सरल नहीं।
यह पहली बार नहीं है जब भारतीय क़ानून ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए माता-पिता को अंतिम ताले के रूप में देखा है। डिजिटल डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 ने भी यही किया था—बच्चों के डाटा की प्रोसेसिंग से पहले अभिभावक की सहमति ज़रूरी। उस समय भी आलोचकों ने कहा था कि हम माता-पिता को ‘सर्वज्ञ संरक्षक’ मानकर ऐसे जहाज़ का पायलट बना रहे हैं जिसे उड़ाना उन्होंने कभी सीखा ही नहीं।
दो साल बाद, वही कहानी फिर दोहराई जा रही है। बस इस बार जहाज़ और भी जटिल हो गया है। चमकती रोशनी, इनामों के लुभावने चक्र, और ऐसे वर्चुअल संसार जहाँ बच्चे सहजता से घूमते हैं, जबकि उनके माता-पिता पर्यटक की तरह लड़खड़ाते हैं।
क़ानून की भाषा में यह विधेयक मज़बूत दिखता है। इसमें ‘गेमिंग के नाम पर जुए’ को पहचानकर दंडित किया गया है, कंपनियों को रजिस्ट्रेशन और अनुपालन का आदेश है, और बच्चों के लिए समय व ख़र्च की सीमा तय की गई है।
लेकिन वास्तविकता लीविंग रूम में तय होती है, अदालतों में नहीं।
अगर कोई माता-पिता बिना समझे 'मैं सहमत हूँ' पर क्लिक कर दें, तो वे सुरक्षा का कवच नहीं बल्कि सिर्फ़ रबर स्टैम्प बन जाते हैं। अगर कोई कहे, 'मुझे ये ऐप्स समझ नहीं आते', तो इसका मतलब है उन्होंने अपने बच्चे को जुए के अड्डे में अकेला छोड़ दिया और उम्मीद कर ली कि सब ठीक रहेगा।
क़ानून की महत्वाकांक्षा और परिवार की वास्तविकता के बीच का अंतराल बेहद चौड़ा है। बच्चे इस डिजिटल दुनिया में ‘नेटिव्स’ की तरह चलते हैं, और अभिभावक ‘यात्री’ की तरह भटकते हैं।
नियंत्रण का भ्रम
यह दृश्य नया नहीं है। जब स्मार्टफ़ोन भारतीय घरों में पहुँचे, बच्चे इंस्टाग्राम ट्रेंड और डिस्कॉर्ड सर्वर तलाश रहे थे, जबकि माता-पिता अब भी परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप को म्यूट करना सीख रहे थे।
नतीजा यह हुआ कि बच्चों की डिजिटल गति बहुत तेज़ थी, जबकि घरों के नियम वही पुराने clichés रहे: 'बस ज़्यादा फोन मत चलाओ' या 'पढ़ाई पर ध्यान दो'।
ऑनलाइन गेमिंग विधेयक इस अंतर को ‘अनिवार्य सहमति’ से भरने की कोशिश करता है। लेकिन समझ के बिना सहमति का कोई अर्थ नहीं। अगर अभिभावक को यह ही न पता हो कि ‘लूट बॉक्स’ क्या है या इन-गेम ख़रीद कैसे काम करती है, तो उनकी अनुमति अंधेरे में सिर हिलाने जैसी है।
क़ानून ने माता-पिता को गेमिंग का जॉयस्टिक थमा दिया है। पर सच्चाई यह है कि अधिकांश को यह नहीं पता कि बटन कहाँ हैं।
इन-ऐप ख़र्च का जाल
पिछले साल दिल्ली की एक 14 वर्षीय छात्रा ने गुप्त रूप से अपने पिता के क्रेडिट कार्ड से ₹2.3 लाख खर्च कर डाले। परिवार को तब पता चला जब बैंक से अलर्ट आया। यह राशि मुख्यतः गेमिंग ऐप्स पर ‘लूट बॉक्स’ और इन-ऐप ख़रीद पर गई थी।
माता-पिता ने कभी यह नहीं समझा था कि 'फ्री टू प्ले' गेम वास्तव में मुफ्त नहीं होते। उनके लिए यह बस मोबाइल पर खेलने वाला एक खेल था। लेकिन बच्चे के लिए यह वर्चुअल कैसिनो था।
यह घटना दिखाती है कि सहमति और निगरानी के बिना सिर्फ़ ‘अनुमति क्लिक’ कोई सुरक्षा नहीं देती।
पालन-पोषण को चाहिए नया अवतार
आसान समाधान है—माता-पिता को दोष देना। कहना कि वे लापरवाह हैं या डिजिटल रूप से निरक्षर। लेकिन वास्तविकता कहीं गहरी है। भारत ने कभी माता-पिता को डिजिटल युग के लिए तैयार करने में निवेश ही नहीं किया।
आज खेल का मैदान पार्कों से ऐप्स पर, गली-कूचों से गेम सर्वरों पर खिसक गया है। अजनबी अब दरवाज़ा खटखटाने नहीं आते, वे फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। पॉकेट मनी अब सिक्कों और नोटों में नहीं मिलती, बल्कि गेमिंग ऐप्स में ख़र्च होकर गायब हो जाती है।
नया पालन-पोषण यानी रिबूटेड पेरेंटिंग का अर्थ स्क्रीन बैन करना नहीं है। इसका अर्थ है माता-पिता को जागरूकता, औज़ार और आत्मविश्वास देना ताकि वे बच्चों को इस नए परिदृश्य में समझदारी से दिशा दे सकें।
स्कूल: पहली पंक्ति की चौकी
सबसे स्वाभाविक प्रवेश बिंदु है—स्कूल। आज अभिभावक-शिक्षक बैठकों का लगभग पूरा समय अंक, उपस्थिति और अनुशासन पर जाता है। वही बैठक अगर 20 मिनट डिजिटल सुरक्षा पर हो—ऑनलाइन गेमिंग के नियम, इन-ऐप ख़र्च की चालाकियाँ, साइबरबुलिंग के खतरे—तो फर्क आ सकता है।
नया डिजिटल सामाजिक अनुबंध
भारत को भी यही करना होगा। राज्य सिर्फ़ कानून न बनाए, बल्कि सरल भाषा में गाइडबुक्स और प्रशिक्षण भी दे। माता-पिता सिर्फ़ 'अनुमति क्लिक' करने वाले न बनें, बल्कि वास्तविक रेफरी बनें। और कंपनियाँ सिर्फ़ नफ़े की चिंता न करें, बल्कि सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी मानें।
दांव बहुत ऊँचे हैं
पालन-पोषण का अर्थ हमेशा रहा है बच्चों को उस दुनिया के लिए तैयार करना जिसमें वे रहते हैं। अब वह दुनिया डिजिटल है।
ऑनलाइन गेमिंग विधेयक माता-पिता को रेफरी बनाता है। लेकिन अगर उन्हें नियम ही न पता हों, तो सीटी बजाना व्यर्थ है।
इसलिए भारत को तुरंत निवेश करना होगा—डिजिटल साक्षरता, स्कूल-स्तरीय प्रशिक्षण और सामुदायिक कार्यशालाओं में। तभी यह कानून सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि असल ज़िंदगी में बच्चों को सुरक्षित बनाएगा।


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