रणभूिम 2.0ः भारत की एआई शक्ति

संदीप कुमार

 |  30 Jun 2025 |   83
Culttoday

तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) युद्ध की परंपरागत परिभाषा को बदल रही है। जहां पहले युद्ध टैंक, पैदल सेना और तोपों पर निर्भर था, वहीं अब यह ड्रोन, साइबरस्पेस और मशीन लर्निंग द्वारा संचालित हो रहा है। एआई अब केवल एक तकनीकी सहायता नहीं, बल्कि युद्ध की रणनीति और संचालन का केंद्रीय तत्व बन गया है।
आज के युद्धक्षेत्र में एआई-सक्षम ड्रोन दुश्मनों को पहचानकर उन्हें निशाना बना सकते हैं, जबकि निगरानी प्रणालियाँ वास्तविक समय में डेटा विश्लेषण कर निर्णय लेने में मदद करती हैं। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों के साथ भारत भी अब इस दौड़ में शामिल हो गया है। इसका सबसे हालिया उदाहरण “ऑपरेशन सिंदूर” है, जो एक अत्यंत सफल आतंकवाद-रोधी अभियान था।
ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सशस्त्र बलों ने स्वदेशी एआई तकनीक का व्यापक उपयोग किया। इसमें स्वायत्त ड्रोन नेटवर्क शामिल था, जो चेहरे की पहचान, दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी और पर्यावरणीय मानचित्रण कर सकते थे। इन ड्रोनों को DRDO और भारतीय टेक स्टार्टअप्स ने मिलकर विकसित किया था। ये दुर्गम इलाकों में लंबे समय तक उड़ान भर सकते थे और उच्च-रिज़ॉल्यूशन डेटा कमांड सेंटरों तक पहुंचाते थे।
जमीन पर तैनात एआई आधारित टोही प्रणालियों ने सेंसर डेटा, सोशल मीडिया गतिविधियों और उपग्रह चित्रों का उपयोग कर खतरे का समग्र मूल्यांकन किया, जिससे अधिकारी घुसपैठ या हमले की भविष्यवाणी कर सके। इसके साथ ही भारतीय साइबर यूनिट्स ने मशीन लर्निंग के ज़रिए साइबर हमलों का समय रहते पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय किया।
इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पक्ष “नेत्रा-एआई” था, जो एक रणनीतिक निर्णय लेने वाला एल्गोरिद्म है। यह प्रणाली विभिन्न युद्ध परिदृश्यों की सिमुलेशन कर उनके संभावित परिणामों का विश्लेषण करती है और सैन्य नेतृत्व को सूचित निर्णय लेने में मदद करती है। यह आकलन युद्धक्षेत्र की स्थिति, रसद, दुश्मन की तैनाती और नागरिक प्रभाव जैसे कारकों के आधार पर होता था।
भारत का यह नवाचार वैश्विक प्रवृत्तियों के अनुरूप है। रक्षा मंत्रालय अब एआई प्रयोगशालाओं, क्वांटम कंप्यूटिंग और रोबोटिक युद्ध प्रणालियों में निवेश कर रहा है। हालांकि, इसके साथ कई नैतिक और कानूनी प्रश्न भी उठते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एआई ड्रोन किसी नागरिक को गलती से निशाना बनाता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी—मशीन की, प्रोग्रामर की, या ऑपरेटर की?
इन चुनौतियों को देखते हुए “ह्यूमन-इन-द-लूप” की अवधारणा को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसमें अंतिम निर्णय मानव द्वारा ही लिया जाए। भारत ने एक “डिफेंस एआई काउंसिल” की स्थापना की है, जो घातक स्वायत्त हथियारों के नैतिक उपयोग हेतु दिशा-निर्देश तैयार कर रही है। यह परिषद पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने हेतु वैश्विक मानकों का भी सुझाव दे रही है।
विपरीत एआई (Adversarial AI) का खतरा भी गंभीर है। दुश्मन एआई सिस्टम को भ्रमित करने के लिए गलत इनपुट या स्पूफिंग तकनीकों का उपयोग कर सकता है। ऐसे परिदृश्य में एआई प्रणाली का विफल होना युद्ध की दिशा बदल सकता है।
AI के अत्यधिक स्वचालन से संभावित खतरों का भी ध्यान रखना होगा। उदाहरण के लिए, 2023 में अमेरिकी सेना के एक सिमुलेशन में एआई ड्रोन ने अपने मानव नियंत्रक को ही खतरा मान लिया था। भले ही यह प्रयोग काल्पनिक बताया गया, पर यह घटना एआई की सीमाओं और खतरों को उजागर करती है।
भारत के लिए तकनीकी आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक है। AI पर आधारित हथियार प्रणालियों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने हेतु देश को न केवल सॉफ़्टवेयर बल्कि चिप्स, डेटा स्टोरेज, और ऑपरेटिंग सिस्टम तक का स्वदेशीकरण करना होगा। विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता न केवल सामरिक कमजोरी बन सकती है, बल्कि जासूसी और डेटा चोरी का जोखिम भी बढ़ा सकती है।
भारत की iDEX (Innovations for Defence Excellence) जैसी पहलें स्टार्टअप्स और नवाचारों को बढ़ावा दे रही हैं। यह पहल रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीकों के विकास हेतु वित्तीय सहायता और संसाधन प्रदान करती है। जैसे कि टॉनबो इमेजिंग, न्यूस्पेस रिसर्च और आइडाफोर्ज जैसे स्टार्टअप सीमावर्ती क्षेत्रों में एआई आधारित रणनीतिक बढ़त दे रहे हैं।भविष्य में AI भारतीय सशस्त्र बलों के संयुक्त अभियान सिद्धांत का मुख्य आधार बन सकता है। यह थल, जल, नभ और साइबर सभी डोमेनों में समन्वय को सक्षम करेगा। साथ ही, एआई का उपयोग मनोवैज्ञानिक युद्धों में भी हो सकता है—जैसे कि डीपफेक, बॉट्स और दुष्प्रचार के ज़रिए दुश्मन को भ्रमित करना।
निष्कर्षतः, युद्ध अब केवल हथियारों से नहीं, बल्कि डेटा, एल्गोरिद्म और तकनीकी प्रभुत्व से लड़ा जा रहा है। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से सिद्ध किया है कि वह इस नई युद्धशैली में न केवल प्रतिस्पर्धा कर सकता है, बल्कि उसमें नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकता है—यदि वह नैतिकता, नीति और तकनीकी आत्मनिर्भरता के संतुलन को बनाए रखे।

अकांक्षा शर्मा अपने कार्य में जिज्ञासा एवं दृढ़ विश्वास के साथ कल्ट करंट में योगदान देती हैं।


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