2025 की इस उमस भरी जुलाई में, जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर दौड़ लगा रही है, चीन ने एक ऐसा दांव चला जिसने भारत की इलेक्ट्रिक वाहन(EV) महत्वाकांक्षाओं के पहियों को जाम करने की धमकी दे दी है।
दुनिया के सबसे बड़े रेयर-अर्थ (दुर्लभ खनिज) प्रोसेसर चीन ने पिछले हफ्ते EV और पवन ऊर्जा में इस्तेमाल होने वाले हाई-ग्रेड मैग्नेट पर निर्यात प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। और इसके साथ ही भारत की “मेक-इन-इंडिया” EV क्रांति के सामने एक नई, अदृश्य चुनौती खड़ी हो गई।
क्यों इतना अहम है यह प्रतिबंध?
भारत में बनने वाली लगभग हर इलेक्ट्रिक कार, टू-व्हीलर और यहां तक कि पवन टरबाइन की मोटर में रेयर-अर्थ मैग्नेट का इस्तेमाल होता है। इन मैग्नेट के निर्माण में नियोडिमियम, प्रासियोडिमियम और डाइसप्रोसियम जैसे खनिज लगते हैं— जिनका 85% से ज़्यादा हिस्सा चीन से आता है।
यानी हमारी EV इंडस्ट्री की धड़कन, हमारी अपनी धरती से नहीं, बीजिंग से आती है।
इसीलिए जब चीन ने निर्यात पर रोक की घोषणा की, तो भारतीय ऑटो कंपनियों में अचानक बेचैनी छा गई। निवेशकों की निगाहें बैटरी की कीमतों पर टिक गईं, नीति-निर्माता आपात बैठकें करने लगे और स्टार्टअप्स को अपने रोडमैप फिर से खंगालने पड़े।
“मेक-इन-इंडिया” की नींव कब तक चीन के भरोसे?
पिछले कुछ सालों में भारत ने EV निर्माण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। टाटा, महिंद्रा, ओला, हीरो जैसे ब्रांड्स से लेकर दर्जनों स्टार्टअप्स तक— सभी ने उत्पादन बढ़ाया। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन गाड़ियों का दिल, यानी मोटर के मैग्नेट, आज भी चीन से आते हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत 2024 में EV मोटर्स के लिए ज़रूरी रेयर-अर्थ मैग्नेट का 95% हिस्सा चीन से इम्पोर्ट कर रहा था। इसके बिना गाड़ियों की रेंज घट सकती है, कीमत बढ़ सकती है और उत्पादन में देरी भी हो सकती है।
विकल्प कहाँ हैं? क्या कर रहा है भारत?
सरकार ने हाल में अहम कदम उठाए हैं:
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और आंध्र प्रदेश में रेयर-अर्थ खनिजों की खोज तेज़ की। और सार्वजनिक और निजी साझेदारी से घरेलू मैग्नेट उत्पादन के लिए नई इकाइयां लगाने की योजना शुरू की। इसके अलावा, जापान, ऑस्ट्रेलिया और वियतनाम जैसे देशों से भी रेयर-अर्थ आयात बढ़ाने की कोशिश हो रही है। कुछ स्टार्टअप्स ने 'फेराइट मैग्नेट' और 'रिसाइकल्ड मैग्नेट' पर रिसर्च शुरू कर दी है।
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि नई खदानें चालू करने में 5–7 साल लग सकते हैं। और तब तक क्या होगा? यही वह दौर है जहां भारत को सबसे चतुराई से संतुलन साधना होगा।
क्या दांव पर सिर्फ EV सेक्टर है?
नहीं। EV सेक्टर भारत की हरित अर्थव्यवस्था का चेहरा है। अगर चीन की नीति से EV की लागत बढ़ती है या उत्पादन रुकता है, तो पॉल्यूशन घटाने, तेल आयात घटाने और ग्रीन जॉब्स पैदा करने के सपनों पर भी असर पड़ेगा। यानी यह सिर्फ कारोबारी संकट नहीं, बल्कि भारत के क्लीन एनर्जी गोल्स की अग्निपरीक्षा भी है।
संकट में छुपा नेतृत्व का अवसर
चीन के प्रतिबंध ने भारत को आईना दिखाया है: आत्मनिर्भरता सिर्फ नारे से नहीं, ठोस रणनीति से आती है। अगर भारत आज घरेलू खनन, रिसाइक्लिंग और वैकल्पिक टेक्नोलॉजी में तेज़ी से निवेश करता है, तो यही संकट हमें चीन पर निर्भरता से आज़ादी दिला सकता है।
आख़िर में सवाल वही है:
क्या भारत इस चुनौती से डरकर कदम पीछे खींचेगा, या इसे मौके में बदलकर अपनी ग्रीन क्रांति की रफ्तार दोगुनी करेगा?
यह समय डरने का नहीं, नेतृत्व का है।
श्रेया गुप्ता कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके
निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।