पाकिस्तान: पतन के मुहाने पर एक परमाणु शक्ति संपन्न देश

मनोज कुमार

 |  02 Apr 2026 |   2
Culttoday

2026 की पहली तिमाही का सूरज जब पाकिस्तान की सरजमीं पर रोशनी बिखेर रहा होता है, तो वह किसी नई उम्मीद को नहीं, बल्कि एक और डूबते हुए दिन को रोशन करता है। पाकिस्तान आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां से आगे की राह नहीं, केवल खाई है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में अब इसे 'आर्थिक संकट' नहीं, बल्कि 'राज्य की पूर्ण विफलता' की संज्ञा दी जा रही है। एक ऐसा देश जिसके पास परमाणु बम तो हैं, लेकिन अपने नागरिकों को रोटी खिलाने के लिए आटा नहीं, और जिसके पास अपनी सरहद की सुरक्षा के दावे तो हैं, लेकिन अपनी ही गलियों में छिपे आतंकवाद का मुकाबला करने का साहस नहीं। पाकिस्तान की बुनियाद अब ईंट-पत्थरों पर नहीं, बल्कि कर्ज की उन परतों पर टिकी है जो किसी भी क्षण ढह सकती हैं। यह पतन केवल आकस्मिक नहीं है, यह दशकों की उन गलत नीतियों का परिणाम है, जहां 'रणनीतिक गहराई' के नाम पर आतंकवाद को पाला गया और अर्थव्यवस्था को सेना की सनक की बलि वेदी पर चढ़ा दिया गया।
कर्ज का मायाजाल जिसने संप्रभुता लील ली
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय 'इंटेंसिव केयर यूनिट' में पड़ी एक ऐसी मरीज है, जिसका ऑक्सीजन सिलेंडर भी अब खाली हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ उसका संबंध अब आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि 'कठोर गुलामी' का बन गया है। हम उस दौर में हैं जहां पाकिस्तान नया कर्ज केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए ले रहा है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे 'पॉन्जी स्कीम' से बेहतर और क्या कहा जा सकता है?
महंगाई का तांडव अब किसी सांख्यिकीय आंकड़े में सिमटा नहीं है, यह हर घर के चूल्हे की राख बन चुका है। आटा, बिजली और पेट्रोल अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होकर विलासिता की वस्तुएं बन चुके हैं। मध्यम वर्ग, जो किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होता है, वह अब तेजी से गरीबी रेखा की उस गहरी खाई में गिर रहा है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। चीन और सऊदी अरब की 'रोलओवर' कर्ज की भीख ने पाकिस्तान की संप्रभुता को गिरवी रख दिया है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, जो कभी 'गेम चेंजर' बताया जाता था, अब एक 'डेब्ट ट्रैप' के रूप में गूंज रहा है। पाकिस्तान की बंद हो चुकी फैक्ट्रियां और खंडर हो रहे औद्योगिक क्षेत्र इस बात के गवाह हैं कि बिना उत्पादन के, केवल कर्ज पर चलने वाला देश लंबे समय तक अपना अस्तित्व नहीं बचा सकता।
सेना बनाम जनता का खूनी द्वंद्व
पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार 'एस्टेब्लिशमेंट'—यानी सेना—और आम जनता के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि उसे अब किसी भी चुनावी मुखौटे से नहीं ढका जा सकता। हाइब्रिड शासन का जो मॉडल सेना ने पिछले कुछ वर्षों में गढ़ा था, वह पूरी तरह से भस्म हो चुका है। राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती शत्रुता और नफरत ने देश की नीतिगत निरंतरता को समाप्त कर दिया है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और सैन्य नेतृत्व के बीच का टकराव अब एक 'ओपन वार' में तब्दील हो चुका है। जब देश के संस्थान आपस में ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने में मशगूल हों, तो शासन व्यवस्था का पंगु होना स्वाभाविक है। जनता का अपने राजनीतिक नेतृत्व से भरोसा इस कदर उठ चुका है कि भविष्य में किसी बड़े नागरिक विद्रोह की आहट स्पष्ट सुनाई दे रही है। यह केवल सत्ता का संघर्ष नहीं है, यह उस व्यवस्था के प्रति नफरत है, जिसने जनता को केवल भ्रष्टाचार और खाली पेट के सिवाय कुछ नहीं दिया। सेना आज भी पर्दे के पीछे से डोर हिला रही है, लेकिन अब जनता ने भी धागे काट दिए हैं।
आतंकवाद का 'भस्मासुर' 
पाकिस्तान की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने जिन आतंकियों को अपने पड़ोसी देशों के खिलाफ 'रणनीतिक एसेट' के तौर पर पाला था, आज वही उनके गले की फांस बन चुके हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का पुनरुत्थान इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान का आंतरिक सुरक्षा ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के इलाकों में सुरक्षा बलों पर होने वाले हमले अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं।
सबसे दुखद और विद्रूप स्थिति यह है कि काबुल में 'मित्र सरकार' होने का दावा करने के बावजूद, पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा अब एक असुरक्षित और खूनी सीमा बन चुकी है। काबुल में बैठे तालिबानी हुक्मरान अब इस्लामाबाद की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। सीमा विवाद और सीमा पार से होने वाली गोलीबारी ने पाकिस्तान की उस 'रणनीतिक गहराई' की अवधारणा को ही दफन कर दिया है, जिसकी दुहाई देकर वे दशकों से सुरक्षा की मांग करते रहे थे। जिस 'आतंकवाद के सांप' को पाकिस्तान ने दशकों तक दूध पिलाया, आज वह सांप उसी के बेडरूम में घुसकर अपने ही आका के सीने पर फन फैलाए बैठा है।
बलूचिस्तान बना सुलगता हुआ बारूदखाना
बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान के संघीय ढांचे के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की बढ़ती ताकत और चीनी हितों पर होने वाले लगातार हमले यह दर्शाते हैं कि राज्य का नियंत्रण अब केवल कागजों तक सीमित रह गया है। बलूचिस्तान के लोग अब खुद को पाकिस्तान का हिस्सा मानने के बजाय एक 'कब्जे वाले क्षेत्र' की तरह देख रहे हैं। चीनी परियोजनाओं पर होने वाले हमले यह भी बताते हैं कि बीजिंग के लिए भी अब पाकिस्तान की जमीन सुरक्षित नहीं रही। यदि बलूचिस्तान में आग इसी तरह भड़कती रही, तो पाकिस्तान का संघीय ढांचा ताश के पत्तों की तरह बिखरने में देर नहीं लगाएगा।
अपने देश से ही मोहभंग
पाकिस्तान की वर्तमान जर्जर स्थिति का सबसे भयावह संकेत वहां के युवाओं का पलायन है। रिकॉर्ड संख्या में पढ़े-लिखे युवा—डॉक्टर, इंजीनियर और स्किल्ड वर्कर्स—देश छोड़कर भाग रहे हैं। एक देश जिसका भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होना चाहिए था, आज वह देश अपने ही बच्चों को सुरक्षित भविष्य नहीं दे पा रहा है। यह युवाओं का 'मौन विद्रोह' है, जो देश के प्रति अपनी वफादारी छोड़कर किसी भी कीमत पर विदेश जाने को तत्पर हैं। जब किसी देश की पूरी एक पीढ़ी अपनी मातृभूमि से मोहभंग कर ले, तो समझ लेना चाहिए कि वह देश अंदर से खोखला हो चुका है।
अस्तित्व का अंतिम युद्ध
पाकिस्तान के लिए  'करो या मरो' की स्थिति है। देश के लिए अब समय खत्म हो चुका है। यदि वह अपनी सैन्य प्राथमिकताओं, भारत-विरोधी जुनून और धार्मिक कट्टरवाद को छोड़कर आर्थिक सुधारों और क्षेत्रीय शांति—विशेषकर भारत के साथ व्यापारिक संबंधों—की ओर नहीं बढ़ता, तो उसका एक 'विफल राष्ट्र'  बनना तय है। परमाणु हथियारों से लैस एक देश का इस तरह अस्थिर होना पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है।
 


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