NATO: शक्ति या भ्रम?

मनोज कुमार

 |  02 Apr 2026 |   2
Culttoday

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से ही उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) अपनी पहचान के उस गहरे संकट में डूबा है, जहां से वापसी अब असंभव सी जान पड़ती है। 2026 के इस दौर में नाटो एक ऐसी मृतप्राय मशीनरी की तरह व्यवहार कर रहा है, जो बिना किसी प्राणवायु के, बिना किसी दृष्टि के, केवल अपनी पुरानी आदतों और जड़ता के सहारे चल रही है। यूक्रेन का युद्ध इस गठबंधन के लिए संजीवनी बूटी तो साबित हुआ, लेकिन उस संजीवनी ने भी केवल इसके मृत अंगों को कुछ समय के लिए फड़फड़ाने पर मजबूर किया है। भीतर से यह गठबंधन आपसी अविश्वास, बजटीय खींचतान और रणनीतिक विरोधाभासों से इस कदर खोखला हो चुका है कि यह अपनी ही धुरी पर लड़खड़ा रहा है। यह एक ऐसा सैन्य दिग्गज है, जिसके पास टैंक तो हजारों हैं, लेकिन एक दुश्मन को पहचानने की दृष्टि शून्य है।
रणनीतिक भटकाव
नाटो की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसके सदस्य देशों की आंखों पर बंधी पट्टियां अलग-अलग रंगों की हैं। पूर्वी यूरोपीय देश, जैसे पोलैंड और बाल्टिक राष्ट्र, रूस की आहट को अपनी कब्र खोदते हुए सुन रहे हैं, जबकि पेरिस और बर्लिन के गलियारों में मास्को के साथ एक 'कामकाजी संबंध' बनाने की सुगबुगाहट अभी भी जारी है। नाटो के लिए रूस एक 'अस्तित्वगत खतरा' है या एक 'व्यवसाय का साथी'? इस बुनियादी सवाल पर गठबंधन के 32 सदस्य एकमत नहीं हैं।
वहीं, दूसरी ओर वाशिंगटन की नजरें अब चीन की ओर मुड़ चुकी हैं, जिसे वह 'सिस्टमैटिक चैलेंजर' मानता है। लेकिन यहां फिर वही रार है—यूरोप चीन के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है। और तो और, दक्षिणी यूरोप के सदस्य, जैसे इटली और ग्रीस, अपनी ही दुनिया में व्यस्त हैं। उनके लिए रूस या चीन कोई खतरा नहीं, बल्कि भूमध्य सागर से आने वाला मानवीय प्रवासन और उत्तरी अफ्रीका से फैलता आतंकवाद असली दुश्मन है। एक ऐसा गठबंधन, जो अपने दुश्मन को ही परिभाषित नहीं कर सकता, वह भला युद्ध के मैदान में क्या खाक लड़ेगा? नाटो आज उसी दुविधा में है, जहां वह हर दिशा में दौड़ने की कोशिश कर रहा है और अंततः कहीं भी नहीं पहुंच रहा है।
वित्तीय बोझ और 'फ्री-राइडर' का अभिशाप
पिछले कई दशकों से अमेरिका नाटो का वह 'बैंकर' रहा है, जिसने अपनी जीडीपी के एक बड़े हिस्से को यूरोप की सुरक्षा के लिए झोंका है। लेकिन अब वाशिंगटन की थकान साफ झलक रही है। अमेरिका, जो कभी खुद को 'स्वतंत्र दुनिया का रक्षक' कहता था, अब यूरोपीय देशों से यह सवाल पूछ रहा है कि—'तुम अपनी सुरक्षा के लिए कब तक मेरे भरोसे रहोगे?'
नाटो के चार्टर के अनुसार, प्रत्येक सदस्य देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 2% रक्षा पर खर्च करना अनिवार्य है। लेकिन 2026 के आंकड़ों को देखें तो स्थिति हास्यास्पद है। नाटो के एक-तिहाई से भी कम सदस्य इस लक्ष्य को पूरा कर पा रहे हैं। बाकी सदस्य 'फ्री-राइडर' की तरह अमेरिकी रक्षा छाते के नीचे आराम कर रहे हैं। आर्थिक मंदी और कल्याणकारी योजनाओं के दबाव ने यूरोपीय सरकारों के पैरों में बेड़ियां डाल दी हैं। वे अपने ही नागरिकों को जवाब देने के लिए विवश हैं, और ऐसे में सैन्य बजट को प्राथमिकता देना राजनीतिक आत्महत्या जैसा है। परिणाम यह है कि नाटो की सैन्य तैयारी अब केवल कागजों पर मौजूद एक 'पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन' बनकर रह गई है। कागजों पर नाटो एक शेर है, लेकिन वास्तविक युद्ध के मैदान में वह अपनी ही आर्थिक कमजोरियों का कैदी है।
भीतर बैठे विद्रोही 
नाटो की एकता का ढोल तब पूरी तरह फट गया जब तुर्की और हंगरी जैसे देशों ने संगठन की साख को खिलौना बना लिया। गठबंधन का कोई भी बड़ा निर्णय 'सर्वसम्मति' से होना चाहिए, और यही इस संगठन का सबसे बड़ा कमजोर कड़ी है। जब भी नाटो कोई कड़ा फैसला लेना चाहता है, हंगरी का वीटो या तुर्की की मोलभाव वाली कूटनीति उसके पैरों में आकर गिरती है। स्वीडन और फिनलैंड के प्रवेश में जो देरी की गई, उसने पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया कि नाटो के भीतर ही दुश्मन बैठे हैं, जो संगठन की एकता को अपने निजी हितों के लिए बंधक बनाए हुए हैं।
तुर्की और हंगरी का रूस के प्रति रुख यह दर्शाता है कि नाटो अब एक 'सुरक्षा परिवार' नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक भट्टी' बन चुका है, जहाँ हर सदस्य अपनी रोटी सेंकने में व्यस्त है। सर्वसम्मति के नाम पर यह गठबंधन अब पंगु हो चुका है। यह एक ऐसी मशीन है जिसका गियर अगर एक भी सदस्य बदल दे, तो पूरी मशीन जाम हो जाती है। नाटो का मृतप्राय स्वरूप यहीं से आता है—वह आगे बढ़ने की कोशिश तो करता है, लेकिन उसके अपने सदस्य उसे पीछे खींचने के लिए काफी हैं।
यूरोपीय स्वायत्तता का सपना बनाम नाटो की निर्भरता
फ्रांस के राष्ट्रपति और अन्य यूरोपीय चिंतक अब 'यूरोपीय सेना' की वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना छोड़ देना चाहिए। यह एक सुंदर सपना है, लेकिन हकीकत में यह केवल एक दिवास्वप्न है। यूरोपीय सैन्य तकनीक और अमेरिकी सैन्य तकनीक के बीच की खाई अब इतनी गहरी हो गई है कि उनका 'ज्वाइंट ऑपरेशन' करना लगभग असंभव हो गया है।
यूरोप अपनी रक्षा कंपनियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह कोशिश अमेरिकी रक्षा उद्योग के हितों से टकराती है। अमेरिका अब अपने हथियार बाजार में किसी को भी भागीदार नहीं बनने देना चाहता। यह दोहरी मार है—यूरोप न तो अपनी सेना बना पा रहा है, न ही नाटो पर भरोसा कर पा रहा है। फ्रांस की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की जिद केवल नाटो के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम कर रही है। नाटो के टैंक और मिसाइलें आज के डिजिटल और हाइब्रिड युद्ध के युग में वैसे ही अप्रभावी हैं, जैसे तलवार लेकर किसी परमाणु युद्ध में उतरना।
डिजिटल और हाइब्रिड युद्ध 
नाटो का पूरा ढांचा 20वीं सदी के उस पारंपरिक युद्ध के लिए बना था, जहाँ टैंकों का काफिला सीमा पार करता था। लेकिन 2026 में युद्ध के मैदान बदल चुके हैं। अब युद्ध साइबरस्पेस में लड़ा जाता है, एआई के जरिए चुनावों को प्रभावित किया जाता है और अंतरिक्ष में उपग्रहों को निशाना बनाया जाता है। नाटो के पास इन नई चुनौतियों से लड़ने का कोई व्यापक ढांचा नहीं है। क्या नाटो के पास कोई ऐसा सिस्टम है जो किसी सदस्य देश के पूरे पावर ग्रिड को साइबर हमले से बचा सके? नहीं। क्या नाटो अंतरिक्ष में हो रहे हमलों को रोकने के लिए तैयार है? नहीं।
यह गठबंधन अभी भी उन पुराने नक्शों को देख रहा है जो अब बदल चुके हैं। ज़ोम्बी की तरह, यह पुरानी आदतों को दोहरा रहा है—जैसे कि एक मृत सैनिक अपनी बंदूक चला रहा हो, भले ही उसे पता न हो कि दुश्मन कहाँ है।
नवीनीकरण या अंतिम संस्कार?
2026 नाटो के लिए वह अंतिम चेतावनी है, जहां उसे यह तय करना होगा कि वह एक प्रासंगिक रक्षक है या केवल इतिहास का एक जीर्ण-शीर्ण अवशेष। यदि नाटो ने खुद को भविष्य के युद्धों के अनुसार नहीं ढाला, तो इसका अंत एक ऐसे संगठन के रूप में होगा जिसे दुनिया याद तो रखेगी, लेकिन जिसकी जरूरत किसी को नहीं होगी। एक मृतप्राय का चलना तब तक चलता है जब तक उसका शरीर सड़कर गिर न जाए। नाटो का शरीर अब सड़ने लगा है।
इसकी सैन्य मशीनरी का शोर केवल एक मृतप्राय संगठन की आखिरी चीख है। दुनिया बदल चुकी है, और नाटो के पास अब केवल दो रास्ते हैं: या तो वह खुद को पूरी तरह से 'रिबूट' करे, एआई और साइबर वारफेयर के युग में अपना अस्तित्व पुनर्जीवित करे, या फिर वह चुपचाप इतिहास के कचरे के डिब्बे में अपना स्थान सुरक्षित कर ले। एक ऐसा गठबंधन जिसे सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता नहीं है, और न ही वैश्विक स्थिरता बनाए रखने का साहस, वह केवल नाम का रक्षक है। यह गठबंधन अब अपने अंत की दहलीज पर खड़ा है, और इसकी अंतिम विदाई का समय शायद अब बहुत करीब है। 
 


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