ईरानः रूह पर फिर लिखी जा रही सौफनाक दास्तां

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   7
Culttoday

जनवरी 2026 की स्याह व ठंड रात का सन्नाटा अब वह सन्नाटा नहीं रहा जो सुकून देता है। यह वह खामोशी है जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले या किसी भयानक हादसे के गुजर जाने के बाद छा जाती है। शहर की फिजा में अलबुर्ज़ पहाड़ों से उतरती बर्फीली हवाओं के साथ-साथ जले हुए टायरों, आंसू गैस के गोलों और सूखे हुए खून की गंध घुली हुई है। यह गंध अब तेहरान की पहचान बन गई है।
आजादी चौक (मैदान-ए-आज़ादी) की भव्य मीनार, जो कभी फारस के गौरव का प्रतीक थी, आज अपनी ही संतानों के दमन की मूक गवाह बनकर खड़ी है। सड़कों पर पुलिस के सायरन किसी भूखे भेड़िये की तरह गुर्राते हैं। इंटरनेट की लाइनें काट दी गई हैं—पूरे देश को एक डिजिटल अंधेरे में धकेल दिया गया है, ताकि दुनिया यह न देख सके कि बंद दरवाजों के पीछे क्या हो रहा है।
लेकिन अंधेरा कितना भी गहरा हो, वह आवाज़ों को कैद नहीं कर सकता। गलियों से, छतों से, और दिलों से एक ही नारा गूंज रहा है—एक ऐसा नारा जो अब सिर्फ एक मांग नहीं, बल्कि मौत के रूबरू खड़े लोगों का आखिरी कलमा बन गया है। वे रोटी नहीं मांग रहे, वे सुधार नहीं मांग रहे। वे उस पूरी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहते हैं, जिसने उनकी सांसों पर पहरा लगा रखा है।
सात समंदर पार, वाशिंगटन डी.सी. और लंदन के वातानुकूलित कक्षों में, दुनिया के सबसे ताकतवर नेता बड़ी-बड़ी स्क्रीनों पर इस तमाशे को देख रहे हैं। उनके बयानों में 'लोकतंत्र', 'मानवाधिकार' और 'आजादी' जैसे शब्द मखमली लिबास पहनकर बाहर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सोशल मीडिया पर हुंकार भर रहे हैं—'हम ईरान के बहादुर लोगों के साथ हैं।'
सुनने में यह किसी हॉलीवुड फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा लगता है, जहां हीरो मसीहा बनकर आता है। लेकिन, जरा ठहरिए। इतिहास के पन्ने कुछ और ही गवाही देते हैं। क्या यह हमदर्दी वाकई उस नकाबपोश लड़की के लिए है जो तेहरान की सड़क पर निहत्थे होकर टैंक के सामने खड़ी है? या फिर यह शतरंज की वह पुरानी बिसात है, जहां 'प्यादा' ईरान की जनता है, और 'इनाम' वह काला सोना (तेल) है, जिसके लिए साम्राज्य बनते और बिगड़ते आए हैं?
इस कहानी को समझने के लिए हमें आज के धुएं से निकलकर इतिहास की उन गलियों में जाना होगा, जहां पहली बार ईरान की तकदीर का सौदा किया गया था।
चलिए चलते हैं वर्ष 1953 के दौर में।
तेहरान की यही सड़कें तब भी अशांत थीं, लेकिन उस अशांति में एक अजीब सी ऊर्जा थी, एक सपना था। वह सपना एक बुजुर्ग, यूरोपीय शिक्षा प्राप्त वकील की आंखों में पल रहा था—मोहम्मद मोसद्देक।
मोसद्देक कोई आम नेता नहीं थे। वे ईरान के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री थे। उनका गुनाह? उनका गुनाह यह था कि उन्होंने यह सोचने की जुर्रत की कि ईरान का तेल ईरानियों का है। उस दौर में, एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी (जिसे आज हम ब्रिटिश पेट्रोलियम या बीपी के नाम से जानते हैं) ईरान के तेल संसाधनों पर एक अजगर की तरह कुंडली मारकर बैठी थी। यह कंपनी एक औपनिवेशिक अवशेष थी, जो ईरानी मजदूरों को जानवरों जैसी स्थितियों में रखकर ब्रिटेन के शाही खजाने भर रही थी। मोसद्देक ने वह किया जो अकल्पनीय था—उन्होंने तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ब्रितानी हुकूमत तिलमिला उठी। यह केवल पैसे का नुकसान नहीं था; यह उस औपनिवेशिक अहंकार पर चोट थी, जो मानता था कि पूर्व के देश पश्चिम की दया पर ही जीवित रह सकते हैं।
लंदन ने वाशिंगटन का दरवाजा खटखटाया। तर्क दिया गया कि मोसद्देक कम्युनिस्टों के करीब जा रहे हैं, कि वे सोवियत संघ के हाथ का खिलौना बन जाएंगे। शीत युद्ध के उस दौर में, यह तर्क पर्याप्त था। सीआईए और ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई6 ने मिलकर एक साजिश रची, जिसे कोडनेम दिया गया—'ऑपरेशन अजाक्स'।
कल्पना कीजिए उस मंजर की। सीआईए का एजेंट, करमिट रूजवेल्ट, सूटकेस में डॉलर भरकर तेहरान पहुंचता है। उसका काम था—लोकतंत्र को खरीदना। अखबारों के संपादकों को घूस दी गई, मौलवियों को उकसाया गया, और सड़कों पर गुंडों की फौज उतार दी गई। मोसद्देक, जिन्हें 1952 में टाइम मैगजीन ने 'मैन ऑफ द ईयर' और 'ईरान का जॉर्ज वाशिंगटन' कहा था, रातों-रात 'गद्दार' और 'पागल' घोषित कर दिए गए।
19 अगस्त 1953। वह दिन जब ईरान की रूह पर पहला गहरा जख्म लगा। मोसद्देक के घर को टैंकों ने घेर लिया। नौ घंटे तक चली गोलीबारी में 300 से अधिक ईरानी मारे गए। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को अपने घर की छत से भागना पड़ा, और अगले दिन उसे जनरल जाहेदी के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा—वही जनरल जिसे सीआईए ने गद्दी के लिए चुना था।
कुल खर्च? 
1 लाख डॉलर से भी कम। 
समय? 
महज छह दिन। 
और नतीजा? 
एक लोकतांत्रिक संभावना की हत्या और एक ऐसे तानाशाह (शाह रजा पहलवी) की ताजपोशी, जिसने अगले 26 सालों तक ईरान को पश्चिम का पुलिस स्टेशन बनाए रखा। पश्चिम को उसका तेल वापस मिल गया, लेकिन ईरान ने अपना भविष्य खो दिया। 1953 का वह जख्म कभी भरा नहीं। 1979 की इस्लामी क्रांति उसी घाव से निकला मवाद थी, जिसने पूरे क्षेत्र को जला दिया।
और आज? 2026 में जब पश्चिमी नेता 'तानाशाही के खिलाफ' बोल रहे हैं, तो इतिहास कोने में खड़ा मुस्कुरा रहा है। क्योंकि 1953 में उन्होंने एक लोकतंत्र को गिराकर तानाशाही थोपी थी, और आज वे एक तानाशाही को गिराने की बात कर रहे हैं—लेकिन मकसद आज भी वही है- नियंत्रण।
तेल—साम्राज्यों की प्यास और जनता का खून
ईरान की त्रासदी यह है कि उसका भूगोल ही उसका सबसे बड़ा शत्रु बन गया। 1908 में जब वहां तेल मिला, तो वह वरदान कम और अभिशाप ज्यादा साबित हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विंस्टन चर्चिल ने ब्रिटिश नौसेना को कोयले से तेल पर शिफ्ट करने का निर्णय लिया था, और ईरान उस निर्णय की जीवनरेखा बन गया।
1925 में रजा खान (पहलवी वंश के संस्थापक) का उदय और बाद में उनके बेटे मोहम्मद रजा पहलवी का शासन—सब कुछ तेल की धार पर टिका था। पश्चिम के लिए ईरान कोई देश नहीं, बल्कि एक 'स्ट्रेटेजिक एसेट' (रणनीतिक संपत्ति) था। जब तक तेल की नदियां लंदन और न्यूयॉर्क की तरफ बहती रहीं, तब तक शाह की क्रूरता, उनकी खुफिया पुलिस 'सावाक'  के अत्याचार और मानवाधिकारों का हनन—सब कुछ माफ था। लेकिन इतिहास का पहिया घूमता है। 1979 में, उन्हीं तेल मजदूरों ने, जिन्हें दशकों तक दबाया गया था, हड़ताल कर दी। तेल का उत्पादन 60 लाख बैरल प्रतिदिन से गिरकर 15 लाख पर आ गया। शाह की सत्ता की रीढ़ टूट गई। क्रांति ने शाह को उखाड़ फेंका, लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह पश्चिम के लिए एक बुरा सपना था। अयातुल्ला खुमैनी ने सत्ता में आते ही 1954 के बाद किए गए सभी तेल अनुबंध रद्द कर दिए। उन्होंने कहा—'तुमने हमें लूटा है।'
अचानक, ईरान 'मित्र' से 'दुश्मन' बन गया। जो देश कल तक 'आधुनिकता का प्रतीक' था, वह रातों-रात 'बुराई की धुरी' का हिस्सा बन गया। यह बदलाव विचारधारा का नहीं था- यह बदलाव नियंत्रण खोने की खीज थी।
वर्तमान का कुरुक्षेत्र 
अब हम वापस आज के समय में लौटते हैं। 28 दिसंबर से शुरू हुए प्रदर्शन अब एक गृहयुद्ध की शक्ल ले चुके हैं। शुरुआत आर्थिक तंगी, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन अब मांग स्पष्ट है—'इस्लामिक रिपब्लिक का खात्मा।'
ईरानी शासन ने अपनी पुरानी किताब के पन्ने पलट लिए हैं। वही दमन, वही हिंसा। मानवाधिकार समूहों का अनुमान है कि पिछले कुछ हफ्तों में 12000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण सही आंकड़े शायद कभी सामने न आ पाएं। यह एक 'डिजिटल नरसंहार' है, जहां सच को दुनिया तक पहुंचने से पहले ही गला घोंट दिया जा रहा है। लेकिन इस बार कुछ अलग है। इस बार अमेरिका और पश्चिम केवल बयान नहीं दे रहे- वे एक अवसर देख रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प, जो हमेशा से 'अधिकतम दबाव'  की नीति के पक्षधर रहे हैं, इस आग में अपना हाथ ताप रहे हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को मदद का वादा किया है, लेकिन किस तरह की मदद? क्या यह 1953 जैसी कोई 'कवर्ट मदद' होगी? या फिर सीरिया और लीबिया की तरह कोई सैन्य हस्तक्षेप?
पश्चिम का पाखंड यहां भी साफ दिखता है। एक तरफ वे ईरानी महिलाओं की आजादी के लिए आंसू बहाते हैं, दूसरी तरफ वे ऐसे प्रतिबंध लगाते हैं जिससे उसी आम ईरानी को दवाइयां और भोजन नहीं मिल पाता। 'वे परवाह नहीं करते कि तुम मरते हो या जीते हो,' एक ईरानी छात्र ने सोशल मीडिया पर लिखा था, इससे पहले कि उसका अकाउंट बंद हो जाता। उसने फिर लिखा- 'उनके लिए हम सिर्फ एक बारगेनिंग चिप (सौदेबाजी का सिक्का) हैं।'
क्षेत्रीय बिसात पर बिछी मौत की बाजी
ईरान का घर जल रहा है, और पड़ोसी मुल्क अपनी खिड़कियों से झांक रहे हैं—कुछ डर के साथ, तो कुछ दबी हुई खुशी के साथ। हर देश इस आग में अपने लिए कुछ न कुछ ढूंढ रहा है।
इजराइल: उम्मीद और खौफ का संगम
तेल अवीव में एक अजीब सी बेचैनी है। इजराइल के लिए, ईरान का वर्तमान शासन एक 'अस्तित्वगत खतरा' है। 'इज़राइल की मौत' के नारे, परमाणु कार्यक्रम और हिजबुल्लाह को दिए जाने वाले रॉकेट—दशकों से यही ईरान की पहचान रही है। इजराइली चाहते हैं कि यह शासन गिर जाए। वे शाह के बेटे, रजा पहलवी, की वापसी के सपने देख रहे हैं, जब दोनों देशों के बीच मधुर संबंध थे।
लेकिन इजराइल के रणनीतिकार अनुभव से जानते हैं कि मध्य पूर्व में सत्ता का शून्य अक्सर शैतानों से भर जाता है। उन्हें डर है कि अयातुल्ला के बाद कोई सैन्य तानाशाही या अराजकता न आ जाए, जो परमाणु हथियारों पर नियंत्रण खो दे। एक अस्थिर ईरान, जिसके पास बैलिस्टिक मिसाइलें हों, एक स्थिर दुश्मन से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। इजराइल के लिए यह एक जुआ है—सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने का डर।
तमाशाबीन बने खाड़ी देश 
रियाद और अबू धाबी के शीशमहलों में एक दबी हुई मुस्कान है। हाल के वर्षों में उन्होंने ईरान के साथ संबंधों को सुधारने का नाटक किया था, दूतावास खोले थे, निवेश की बातें की थीं। लेकिन यह दोस्ती भरोसे पर नहीं, बल्कि मजबूरी पर टिकी थी।
आज, जब ईरान अंदर से टूट रहा है, तो खाड़ी के शेख राहत की सांस ले रहे हैं। 2023 के बाद से यमन के हुतियों ने सऊदी शहरों पर मिसाइलें दागना कम कर दिया था, लेकिन डर हमेशा बना था। अब, वे देख रहे हैं कि जिस शासन ने पूरे क्षेत्र में मिलिशिया और प्रॉक्सी वॉर का जाल बिछाया था, वह अपनी ही जनता से हार रहा है। लेकिन वे चुप हैं। वे जानते हैं कि एक घायल शेर ज्यादा खतरनाक होता है। वे नहीं चाहते कि ईरान की आग उनकी सीमाओं तक पहुंचे। ओमान जैसे देश, जो हमेशा से अमेरिका और ईरान के बीच डाकिया रहे हैं, अब भी संवाद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन बाकी सब बस घड़ी देख रहे हैं—इंतजार कर रहे हैं उस पल का जब तेहरान का तख्त पलटेगा।
लेबनान: हिजबुल्लाह का अस्तित्वगत संकट
बेरूत की तंग गलियों में, हिजबुल्लाह के लड़ाकों के माथे पर पसीना है। ईरान की सड़कों पर लग रहे नारे—'न गाजा, न लेबनान, मेरी जान फिदा है ईरान पर'—उनके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रहे हैं। ईरानी जनता अब अपने पैसे को हमास और हिजबुल्लाह पर लुटते हुए नहीं देखना चाहती।
हिजबुल्लाह के लिए यह केवल पैसे का सवाल नहीं है, यह वजूद का सवाल है। ईरान उनका 'आका' है, उनकी जीवनरेखा है। अगर तेहरान गिरता है, तो बेरूत में हिजबुल्लाह अनाथ हो जाएगा। लेबनान के लोग, जो पहले ही हिजबुल्लाह के हथियारों से तंग आ चुके हैं, ईरानी प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ा रहे हैं। यह एक डोमिनो इफेक्ट है—तेहरान में एक ईंट गिरती है, तो बेरूत की इमारत हिलने लगती है।
तुर्की: मौकापरस्त पड़ोसी
अंकारा में राष्ट्रपति एर्दोगन अपनी मूंछों पर ताव दे रहे हैं। तुर्की और ईरान ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। सीरिया में, इराक में, हर जगह दोनों ने एक-दूसरे को चुनौती दी है। ईरान का कमजोर होना तुर्की के लिए एक सुनहरा अवसर है। सीरिया में पहले ही तुर्की समर्थित सुन्नी ताकतों ने बशर अल-असद के गिरने के बाद बढ़त बना ली है। अब अगर ईरान अस्थिर होता है, तो तुर्की खुद को क्षेत्र का एकमात्र 'बिग ब्रदर' घोषित कर सकता है। लेकिन एर्दोगन भी एक तलवार की धार पर चल रहे हैं। अगर ईरान में गृहयुद्ध छिड़ा, तो लाखों शरणार्थी तुर्की की ओर भागेंगे। कुर्द विद्रोह फिर से भड़क सकता है। इसलिए तुर्की का आधिकारिक बयान बहुत नपा-तुला है—'बाहरी लोग दूर रहें।' वे चाहते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
एक अधूरी दास्तां व भविष्य का सवाल
वापस तेहरान की उसी सड़क पर चलते हैं, जहां से हमने शुरुआत की थी।
धुएं के गुबार के बीच, वह युवा लड़की अब भी वहां खड़ी है। उसके हाथ में पत्थर है, और सामने बख्तरबंद गाड़ी। उसे नहीं पता कि मोसद्देक कौन थे। उसे शायद 1953 की तारीख भी याद नहीं होगी। उसे नहीं पता कि उसका विद्रोह वाशिंगटन में तेल की कीमतों को कैसे प्रभावित कर रहा है, या इजराइल की सुरक्षा कैबिनेट इस पर क्या चर्चा कर रही है। वह बस इतना जानती है कि वह सांस लेना चाहती है। वह आजाद होना चाहती है—हिजाब की जबरदस्ती से, मुल्लाओं की नैतिकता पुलिस से, और उस गरीबी से जिसने उसके पिता की कमर तोड़ दी है।
लेकिन त्रासदी यह है कि उसकी आजादी की कीमत कोई और तय कर रहा है। उसकी चीखें 'सौदा' बन गई हैं। अगर कल को ईरान में सत्ता बदलती है, और कोई पश्चिम-परस्त नेता गद्दी पर बैठता है, तो क्या उसे वाकई आजादी मिलेगी? या फिर उसे 1953 की तरह एक और 'सभ्य तानाशाही' मिलेगी, जो तेल तो पश्चिम को बेचेगी लेकिन अपनी जनता को कुचलना जारी रखेगी? मैडेलीन अलब्राइट ने वर्ष 2000 में एक दुर्लभ क्षण में स्वीकार किया था कि 1953 का तख्तापलट 'ईरान के राजनीतिक विकास के लिए एक झटका था।' आज, 2026 में, दुनिया एक और 'झटके' की तैयारी कर रही है।
ईरान की कहानी हमें सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में 'नैतिकता' एक छलावा है। यहां सिर्फ हित होते हैं। 1953 में मुद्दा कम्युनिज़्म नहीं था, तेल था। 2026 में मुद्दा लोकतंत्र नहीं है, फिर से तेल और भू-राजनीतिक प्रभुत्व है। इस सब के बीच, ईरान की जनता—वो शायरों, कलाकारों और दार्शनिकों की कौम—पिस रही है। वे इतिहास के पहिये के नीचे कुचले जा रहे हैं। लेकिन उम्मीद... उम्मीद वह जिद्दी बीज है जो रेगिस्तान में भी पनप जाता है। शायद इस बार, ईरान की जनता वह कहानी लिखेगी जो किसी विदेशी दूतावास में नहीं, बल्कि तेहरान की सड़कों पर तय होगी। शायद इस बार, वे तेल के लिए नहीं, बल्कि अपनी रूह के लिए जीतेंगे।
जब तक वह सुबह नहीं आती, तेहरान जलता रहेगा। और दुनिया, अपनी सुविधानुसार, कभी तालियां बजाएगी तो कभी आंखें फेर लेगी। क्योंकि अंततः, जैसा कि उस गुमनाम ईरानी प्रदर्शनकारी ने कहा था— 'उन्हें परवाह नहीं कि तुम मरते हो, जब तक कि उनका तेल बहता रहे।'
यह सिर्फ ईरान की कहानी नहीं है। यह सत्ता, लालच और मानव मुक्ति के बीच के शाश्वत संघर्ष की एक और खूनी किस्त है। 


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