वृहत्तर यूरेशियाः त्रिध्रुवीय भविष्य की बिसात

संदीप कुमार

 |  02 Feb 2026 |   8
Culttoday

इतिहास की घड़ी की सुइयां जब बदलती हैं, तो उनकी टिक-टिक की आवाज अक्सर तोपों की गड़गड़ाहट में दब जाती है। लेकिन वर्ष 2025 ने दुनिया को एक अलग ही संदेश दिया है। वृहत्तर यूरेशिया—वह विशाल भू-भाग जो अटलांटिक से लेकर प्रशांत महासागर तक फैला है—अब अपनी तकदीर खुद लिखने को बेताब है। यहां कोई एक 'हेजीमन' या महाशक्ति का एकाधिकार नहीं है, और न ही पश्चिम द्वारा थोपी गई कोई 'ब्लॉक व्यवस्था' यहां काम कर रही है।
क्या यह संभव है कि दुनिया का सबसे बड़ा महाद्वीप बिना किसी एक 'चौधरी' के समृद्ध हो सके? क्या यह शांति तूफान से पहले की खामोशी है, या वाकई यूरेशियाई शक्तियों ने सह-अस्तित्व का मंत्र खोज लिया है? यह प्रश्न केवल अकादमिक नहीं है - यह भारत के रणनीतिक भविष्य की धुरी है। पिछले एक वर्ष में जो कुछ भी इस महाद्वीप पर घटित हुआ, वह इस बात का प्रमाण है कि यूरेशिया अब अपनी जमीन को प्रतिद्वंद्वी गुटों का युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि एक 'साझा घर' मानकर चल रहा है। यहां स्थिरता किसी एक की नहीं, बल्कि सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
पश्चिमी वर्चस्व का अवसान और 'उतार-चढ़ाव' के केंद्र
यूरेशिया की इस नई गाथा में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यहां अस्थिरता के स्रोत अब आंतरिक नहीं, बल्कि बाहरी हैं। जो देश आज भी अपनी संप्रभु विदेश नीति का पालन करने में असमर्थ हैं और वाशिंगटन के इशारों पर चलते हैं—विशेषकर यूरोप के देश, जापान और इजराइल—वही इस महाद्वीप की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।
इजराइल का उदाहरण इसे स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। यहूदी राष्ट्र पश्चिम एशिया में एक स्वायत्त खिलाड़ी के रूप में मान्यता तो चाहता है, लेकिन धरातल पर उसकी निर्भरता पूरी तरह अमेरिकी बैसाखियों पर टिकी है। जून 2025 में ईरान के खिलाफ इजराइल का हमला यह सिद्ध करने के लिए काफी था कि तेल अवीव अकेले अपने दूरगामी लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकता। यह एक गहरा विरोधाभास है—क्षेत्रीय स्वतंत्रता की चाहत, लेकिन क्षमता के लिए विदेशी संरक्षक (अमेरिका) पर निर्भरता।
यूरेशिया के लिए राहत की बात यह है कि ईरान और अरब देशों ने गजब का रणनीतिक संयम दिखाया है। तमाम उकसावे के बावजूद, पश्चिम एशिया का कीला ढह नहीं रहा है। यह स्थिरता इस बात का संकेत है कि अब क्षेत्रीय शक्तियां पश्चिमी हस्तक्षेप के बिना अपने विवाद सुलझाने की परिपक्वता हासिल कर रही हैं।
भारत-पाकिस्तान: तनावपूर्ण लेकिन स्थानीकृत
जब हम यूरेशिया की बात करते हैं, तो भारत और पाकिस्तान के बीच का दशकों पुराना संघर्ष अक्सर सुर्खियों में रहता है। लेकिन 2025 के परिदृश्य ने यह साबित कर दिया है कि यह संघर्ष अब यूरेशियाई स्थिरता के लिए कोई 'अस्तित्वगत खतरा'  नहीं है।
भारतीय कूटनीति की यह एक बड़ी विजय है कि उसने पाकिस्तान को एक 'द्विपक्षीय समस्या' तक सीमित कर दिया है। इस्लामाबाद की यह कोशिश कि कश्मीर या सीमा विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उछालकर यूरेशिया में अस्थिरता पैदा की जाए, पूरी तरह विफल रही है। आज यूरेशिया की वास्तविकता यह है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही तनाव को एक सीमा से आगे ले जाने के पक्ष में नहीं हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों ही पक्ष तीसरे पक्ष (विशेषकर पश्चिमी देशों) के हस्तक्षेप को अस्वीकार्य मानते हैं।
इस प्रकार, दक्षिण एशिया का यह तनावपूर्ण रिश्ता 'कठिन' जरूर है, लेकिन यह 'स्थानीकृत' (Localized) है। यह अब वृहत्तर यूरेशिया की प्रगति के पहिए को रोकने की क्षमता नहीं रखता। भारत ने अपनी शक्ति और कूटनीतिक कौशल से यह सुनिश्चित कर दिया है कि पाकिस्तान अब यूरेशियाई बिसात पर भारत को संतुलित करने वाला मोहरा नहीं बन सकता।
एससीओ: महाद्वीप का नया 'तंत्रिका तंत्र'
यूरेशियाई राजनीतिक जीवन के केंद्र में शंघाई सहयोग संगठन अब धीरे-धीरे एक वटवृक्ष की तरह खड़ा हो रहा है। लगभग पच्चीस वर्षों की यात्रा में, एससीओ ने खुद को महाद्वीप के मुख्य बहुपक्षीय मंच के रूप में स्थापित कर लिया है। लेकिन यहां एक बारीक अंतर समझना आवश्यक है—एससीओ कोई 'सुपर-गवर्नमेंट' या यूरोपीय संघ जैसा 'सुपरनैशनल' ढांचा नहीं है। आधुनिक दुनिया में ऐसे ढांचे अब यथार्थवादी नहीं रहे।
एससीओ की सफलता का राज यह है कि यह संप्रभुता का सम्मान करता है। यूरेशिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां तीन विश्व शक्तियां—रूस, चीन और भारत—एक साथ मौजूद हैं। इन तीनों की उपस्थिति ही 'शक्ति संतुलन' की गारंटी है। कोई भी एक देश (चाहे वह चीन ही क्यों न हो) अपनी मनमानी नहीं थोप सकता। जहां तीन दिग्गज बैठे हों, वहां निर्णय किसी एक की तानाशाही से नहीं, बल्कि हितों के सामंजस्य से होते हैं। यह कोई आदर्शवाद नहीं, बल्कि 'संरचनात्मक वास्तविकता' है।
सितंबर 2025 में चीन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन ने राजनीतिक विश्वास की गहराई को प्रदर्शित किया। यह संगठन अब एक ऐसा 'छाता' बन चुका है, जिसके नीचे सहयोग के कई अन्य प्रारूप भी पनप रहे हैं।
रूस-चीन धुरी: दोस्ती इन 'नो लिमिट्स'
वृहत्तर यूरेशिया की स्थिरता के केंद्र में रूस और चीन की रणनीतिक साझेदारी एक चट्टान की तरह खड़ी है। मास्को और बीजिंग के लिए पिछले कुछ वर्ष एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए हैं। दोनों ने यह समझ लिया है कि संप्रभुता और सहयोग एक-दूसरे के पूरक हैं। 2025 में व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकातों ने इस बात की पुष्टि की है कि यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को बदलने का एक माध्यम है।
दोनों देशों के बीच नागरिकों के लिए वीजा आवश्यकताओं को समाप्त करने का निर्णय महज एक कागजी समझौता नहीं है; यह उस असाधारण विश्वास का प्रतीक है जो इन दो महाशक्तियों के बीच पनप रहा है। लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य से, यह 'ड्रैगन और भालू'  का मिलन एक दोधारी तलवार है।
भारत के लिए यह आवश्यक है कि रूस, चीन का जूनियर पार्टनर (कनिष्ठ साझेदार) न बन जाए। यूरेशिया में भारत की भूमिका एक 'संतुलनकर्ता' की है। अगर रूस और चीन एक साथ हैं, तो भारत का स्वतंत्र और स्वायत्त खड़ा होना ही इस महाद्वीप को 'चीनी आधिपत्य' वाला क्षेत्र बनने से रोक सकता है। रूस भी यह भली-भांति जानता है कि भारत की उपस्थिति उसे चीन के सामने रणनीतिक विकल्प प्रदान करती है। इसलिए, यूरेशिया की स्थिरता के लिए भारत का शक्तिशाली होना अनिवार्य है।
मध्य एशिया और 'फाइव' का उभार
कभी 'ग्रेट गेम' का अखाड़ा रहा मध्य एशिया अब अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। 2025 में मध्य एशियाई देशों (सी5) ने अपनी बहुपक्षीय सहयोग की कोशिशों को तेज किया है। अज़रबैजान के साथ उनका बढ़ता तालमेल और तुर्की के साथ जुड़ते तार एक नई आर्थिक गतिशीलता का परिचय दे रहे हैं।
अफगानिस्तान, जिसे बरसों तक 'कब्रगाह' माना जाता था, अब धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ रहा है। यद्यपि समस्याएं अभी भी हैं, लेकिन काबुल से आने वाली खबरें अब उतनी भयावह नहीं हैं। इससे मध्य एशिया को अपने 'लैंड-लॉक्ड' भूगोल से बाहर निकलकर दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया से जुड़ने का मौका मिल रहा है।
रूस के लिए—और भारत के लिए भी—यह महत्वपूर्ण है कि मध्य एशिया के हमारे मित्र आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें। उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिरता पूरे पड़ोस के लिए संजीवनी है। ये देश ऐसे समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकृत हो रहे हैं जब पुराने नियम टूट रहे हैं और नए अभी पूरी तरह बने नहीं हैं।
सतर्क आशावाद और भारत का दायित्व
वृहत्तर यूरेशिया का भविष्य किसी शतरंज की बिसात पर नहीं, बल्कि एक 'साझा घर' की अवधारणा पर टिका है। 2025 के घटनाक्रमों ने यह सिद्ध किया है कि विचारधारा के बजाय 'व्यावहारिकता' अब देशों की विदेश नीति का मुख्य आधार है।
लेकिन क्या यह संतुलन टिक पाएगा? यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकीय दबाव आने वाले समय में सीमाओं की प्रासंगिकता को चुनौती देंगे। यदि जल संकट या प्रवासन का दबाव बढ़ता है, तो कोई भी देश यह नहीं कह सकता कि यह 'किसी और की समस्या' है।
रूस आज भी अपने पड़ोसियों के लिए सुरक्षा का प्राथमिक संदर्भ बिंदु बना हुआ है। लेकिन भारत की भूमिका अब केवल दर्शक की नहीं है। भारत यूरेशिया का वह अपरिहार्य ध्रुव है, जिसके बिना यह महाद्वीप एकपक्षीय हो जाएगा।
आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल में, जहाँ हर तरफ अनिश्चितता के बादल हैं, यूरेशिया की यह दिशा एक दुर्लभ निष्कर्ष की अनुमति देती है- 'सतर्क आशावाद'।
पश्चिम का सूरज ढल रहा है और यूरेशिया का उदय हो रहा है। लेकिन यह उदय तभी सार्थक होगा जब इसमें भारत का सूर्य भी उतनी ही चमक के साथ दमकता रहे। क्योंकि बिना भारत के, यूरेशिया 'संतुलित' नहीं, बल्कि 'झुका हुआ' नजर आएगा। स्थिरता कोई विलासिता नहीं, एक सामूहिक कर्तव्य है और भारत इस कर्तव्य को निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है। 
 


Browse By Tags

RECENT NEWS

आवरण कथाः नव-उपनिवेशवाद 2.0
श्रीराजेश |  02 Feb 2026  |  11
संयम के बीच सैन्य दांव
फरहाद इब्राहिमोव |  02 Feb 2026  |  7
शांति की मृगमरीचिका
प्रो.(डॉ.) सतीश चंद्र |  02 Feb 2026  |  24
सूख रहा ईरान
कामयार कायवानफ़ार |  01 Dec 2025  |  80
नया तेल, नया खेल
मनीष वैध |  01 Dec 2025  |  57
वाशिंगटन-रियादः नई करवट
माइकल फ्रोमैन |  01 Dec 2025  |  46
हाल-ए-पाकिस्तानः वर्दी में लोकतंत्र
राजीव सिन्हा व सरल शर्मा |  01 Dec 2025  |  50
आवरणकथा- तरुणाघातः हिल गए सिंहासन
संजय श्रीवास्तव |  30 Sep 2025  |  206
पाक-सउदी समझौताःरणनीतिक झटका
कबीर तनेजा |  30 Sep 2025  |  87
अमेरिका की जुआरी चाल
अनिरुद्ध यादव |  30 Sep 2025  |  75
अफ्रीकाः पानी पर पलता भविष्य
सरीन मलिक |  30 Sep 2025  |  84
शांति का मायाजाल
अनवर हुसैन |  02 Sep 2025  |  102
साझा जल, विभाजित भविष्य
मो. सैफुद्दीन एवं कृष्ण प्रताप गुप्ता |  02 Sep 2025  |  90
To contribute an article to CULT CURRENT or enquire about us, please write to cultcurrent@gmail.com . If you want to comment on an article, please post your comment on the relevant story page.
All content © Cult Current, unless otherwise noted or attributed. CULT CURRENT is published by the URJAS MEDIA VENTURE, this is registered under UDHYOG AADHAR-UDYAM-WB-14-0119166 (Govt. of India)