आवरण कथाः नव-उपनिवेशवाद 2.0
संतु दास
| 02 Feb 2026 |
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डावोस की बर्फ़ीली पहाड़ियों में इस बार वैश्विक सहयोग नहीं, बल्कि शक्ति की नंगी परेड हो रही है। नियमों, संस्थाओं और नैतिकता की बातें अब केवल सजावटी आवरण हैं—असल खेल दबाव, दहशत और संसाधनों पर कब्ज़े का है। अमेरिका–यूरोप की दरारें, ग्रीनलैंड पर उभरता सैन्य लोभ, एल्गोरिदम के सहारे चलता डिजिटल साम्राज्यवाद और ग्लोबल साउथ की उबलती असहजता यह साफ़ कर देती है कि दुनिया किसी संक्रमण में नहीं, बल्कि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—नव-उपनिवेशवाद 2.0, जहां झंडे नहीं गाड़े जाते, भविष्य गिरवी रखे जाते हैं।
डावोस की बर्फ़ीली पहाड़ियों में हर साल दुनिया के ताक़तवर लोग 'वैश्विक सहयोग' की भाषा बोलते हैं, लेकिन इस बार उस भाषा के पीछे छिपी नग्न शक्ति साफ़ दिखाई दी। मंच पर शांति, नियम और साझेदारी की बातें थीं, जबकि समानांतर रूप से दुनिया को यह संदेश भी दिया जा रहा था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति फिर से ताक़त के व्याकरण में लौट रही है। यही वह क्षण था जब डावोस का मुखौटा उतरा—और यह स्वीकारोक्ति सामने आई कि दुनिया नियमों से नहीं, बल्कि डर और दबाव से चलाई जा रही है।
इसी मंच पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान इस बदलती विश्व-मानसिकता का सबसे सटीक प्रतीक बन गया। औपचारिक रूप से उन्होंने कहा कि वे 'कोई सैन्य बल इस्तेमाल नहीं करेंगे' और न ही यूरोप पर टैरिफ लगाएंगे, लेकिन उसी सांस में उन्होंने अमेरिकी बमवर्षकों, मिसाइल क्षमताओं और आर्कटिक में अमेरिकी सैन्य वर्चस्व की चर्चा कर दी। यह कोई कूटनीतिक असावधानी नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित प्रदर्शन था—एक ऐसा शक्ति-प्रदर्शन, जो शब्दों में नहीं, संकेतों में धमकी देता है। डेनमार्क और पूरे यूरोप के लिए संदेश स्पष्ट था: सहमति न भी हो, तो अमेरिका के पास विकल्प मौजूद हैं।
यह वही मानसिकता है जिसने कभी औपनिवेशिक युग को जन्म दिया था। फर्क सिर्फ़ इतना है कि आज उपनिवेश झंडों और सेनाओं से नहीं, बल्कि रणनीतिक भूभाग, संसाधनों, टेक्नोलॉजी और सैन्य संकेतों के ज़रिये तय किए जा रहे हैं। ग्रीनलैंड पर ट्रंप की ज़िद दरअसल बर्फ़ की ज़मीन से अधिक उस सोच का विस्तार है, जिसमें भूगोल फिर से भाग्य लिखने लगा है और ताक़त, नैतिकता पर भारी पड़ रही है। डावोस में दिया गया यह बयान केवल ग्रीनलैंड के लिए नहीं था—यह पूरे यूरोप को उसकी रणनीतिक निर्भरता का आईना दिखाने जैसा था।
विडंबना देखिए कि वर्ष 1945 के बाद, जब हिरोशिमा और नागासाकी की राख से मानवता ने सबक लेने का दावा किया था, तब वाशिंगटन और लंदन ने एक ऐसी दुनिया का सपना गढ़ा था जहाँ राष्ट्रों का आचरण 'पाशविक शक्ति' से नहीं, बल्कि संस्थाओं और कानूनों से संचालित होगा। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और बाद में विश्व व्यापार संगठन—ये सभी उसी उदारवादी अंतरराष्ट्रीयवाद के स्तंभ थे। वादा किया गया था कि अब ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ नहीं चलेगी, बल्कि नियम-आधारित विश्व व्यवस्था होगी। लेकिन डावोस 2026 में यह भ्रम पूरी तरह टूटता दिखा।
वर्ष 2025–26 की दहलीज पर खड़ी दुनिया अब एक नितांत भिन्न, अधिक क्रूर और अस्थिर यथार्थ में प्रवेश कर चुकी है। इस यथार्थ का सबसे सजीव दृश्य स्विट्ज़रलैंड के डावोस में दिखाई देता है, जहाँ वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से सतत विकास और समावेशी वृद्धि की बातें तो होती हैं, लेकिन वास्तविक चिंता रणनीतिक नियंत्रण, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा और प्रभाव क्षेत्रों को लेकर है। बाहर आलप्स की बर्फ़ जमा देने वाली है, और भीतर कूटनीतिक रिश्तों में जमी बर्फ़ उससे कहीं ज़्यादा ठंडी और खतरनाक।
डावोस, जिसे कभी वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार का मक्का कहा जाता था, आज अपने ही अस्तित्वगत संकट से जूझ रहा है। मंच पर 'वैश्विक सहयोग' के नारे हैं, लेकिन बंद कमरों में शक्ति-संतुलन, प्रतिशोध और गुटबंदी की भाषा बोली जा रही है। शैंपेन के गिलासों की खनक के बीच एक बेचैन सन्नाटा पसरा है। ट्रंप का ग्रीनलैंड पर दिया गया बयान इस सन्नाटे को चीरता हुआ यह याद दिलाता है कि आज की दुनिया में नियमों की दुहाई वही दे रहे हैं जिनकी शक्ति क्षीण हो रही है, जबकि प्रभुत्वशाली ताक़तें नियमों को केवल सुविधा अनुसार इस्तेमाल कर रही हैं।
आज डावोस किसी बेहतर भविष्य का उत्सव नहीं, बल्कि एक टूटती हुई वैश्विक व्यवस्था का शोकगीत बन चुका है—जहाँ मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपा डर यह कह रहा है कि दुनिया एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहाँ ताक़त ही अंतिम तर्क हुआ करती है।
डोनाल्ड ट्रंप का दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनना और उनका आक्रामक, बिना लाग-लपेट वाला कार्यकाल, इस प्रक्रिया का कोई आकस्मिक परिणाम नहीं है। यह उस गहरे संरचनात्मक क्षरण का प्रतीक है जिसे विद्वान दशकों से 'पश्चिमी प्रभुत्व का अंत' और 'इतिहास की वापसी' कह रहे हैं। ट्रंप की 'अमेरिका प्रथम' नीति ने कूटनीति के उन रेशमी धागों को एक ही झटके में तोड़ दिया है, जिन्होंने दशकों से दुनिया को बांध रखा था। इसके स्थान पर 'लेन-देन आधारित अराजकता' का जन्म हुआ है। यह अराजकता केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं है; यह एक नए प्रकार के 'नव-उपनिवेशवाद 2.0' की प्रस्तावना है। जहां 19वीं सदी का उपनिवेशवाद भौगोलिक सीमाओं को रौंदता था, तोपों और जहाजों से संचालित होता था, वहीं 21वीं सदी का यह नया संस्करण 'डेटा', 'आपूर्ति शृंखला', 'तकनीकी एकाधिकार' और 'बर्फीले महाद्वीपों' के माध्यम से राष्ट्रों की संप्रभुता का गला घोंट रहा है।
उदारवादी व्यवस्था का भ्रम, पाखंड और पतन
नियम-आधारित व्यवस्था का पतन समझने के लिए इसके उत्थान की पृष्ठभूमि और इसके अंतर्निहित विरोधाभासों को समझना आवश्यक है। शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका ने एक 'उदारवादी वर्चस्व' का निर्माण किया। इसका तर्क सरल और मोहक था—यदि दुनिया के देश आपस में व्यापार करेंगे, एक-दूसरे के बाजारों पर निर्भर रहेंगे और एक साझा कानूनी ढांचे से बंधे होंगे, तो युद्ध की संभावना क्षीण हो जाएगी। यह 'लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत' का व्यावहारिक अनुप्रयोग था, जिसने यह माना कि व्यापार करने वाले देश एक-दूसरे से लड़ते नहीं हैं।
हालांकि, यह व्यवस्था कभी भी उतनी 'समानतावादी' या 'न्यायपूर्ण' नहीं थी जितनी कि यह कागजों पर सुनहरी स्याही से लिखी गई थी। इसमें 'नियम' सबके लिए थे, लेकिन 'अपवाद' केवल अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के लिए सुरक्षित थे। 2003 का इराक युद्ध, जहां झूठे सबूतों के आधार पर एक संप्रभु राष्ट्र को नष्ट कर दिया गया, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के प्रति अमेरिका का उपेक्षापूर्ण रवैया, और चयनात्मक मानवाधिकार हस्तक्षेपों ने इस व्यवस्था की नैतिक नींव को काफी पहले ही दीमक की तरह खोखला कर दिया था। शेष विश्व, जिसे अब हम 'ग्लोबल साउथ' कहते हैं, उसने यह महसूस करना शुरू कर दिया कि ये नियम दरअसल पश्चिमी वर्चस्व को शाश्वत बनाए रखने के चतुर उपकरण मात्र हैं।
1990 के दशक में वैश्वीकरण को एक 'परोपकारी शक्ति' के रूप में पेश किया गया। यह कहा गया कि 'उठती हुई लहरें सभी नावों को ऊपर उठाती हैं।' लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि आर्थिक परस्पर निर्भरता एक दोधारी तलवार है। जब पश्चिमी बैंक डूबे, तो उसकी सजा पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं ने भुगती। जब व्यापारिक नियमों का उपयोग विकासशील देशों की नीतिगत स्वायत्तता को छीनने के लिए किया जाने लगा, तो 'नियम-आधारित व्यवस्था' के प्रति मोहभंग होना स्वाभाविक था। आज व्यापारिक संधियां 'विकास' का साधन कम और 'नियंत्रण' का औजार अधिक बन गई हैं। डावोस में आज जो अविश्वास दिख रहा है, वह इसी ऐतिहासिक धोखे का परिणाम है।
ट्रंपवाद और 'वैश्विक सहमति' का विध्वंस
यदि नियम आधारित विश्व व्यवस्था एक जर्जर इमारत थी, जिसकी दीवारों में दरारें पड़ चुकी थीं, तो डोनाल्ड ट्रंप वह बुलडोजर हैं जिसने इसकी नींव हिला दी है। ट्रंप की वैश्विक दृष्टि 'यथार्थवाद' के उस क्रूर संस्करण पर आधारित है जहां कोई स्थायी मित्र नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। उनकी नीतियों ने दुनिया को यह कड़वा सच याद दिला दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति 'प्रेम पत्र' लिखने की कला नहीं, बल्कि 'शक्ति प्रदर्शन' का अखाड़ा है।
ट्रंप ने नाटो जैसे पवित्र माने जाने वाले सुरक्षा गठबंधनों को एक 'व्यापारिक सौदे' की तरह पेश किया है। उनके लिए यूरोप या जापान की सुरक्षा अमेरिका का नैतिक उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि एक 'सेवा' है जिसके लिए उन्हें भुगतान करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे किसी सुरक्षा एजेंसी को पैसा दिया जाता है। यह नजरिया अंतरराष्ट्रीय संबंधों को 'संस्थागत सहयोग' के उच्च आसन से गिराकर 'भाड़े की सुरक्षा' के स्तर पर ले आता है। जब दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति अपने गठबंधनों को 'सब्सिडी' और 'बोझ' कहने लगे, तो वैश्विक शक्ति संतुलन का चरमराना निश्चित है।
पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलना, ईरान परमाणु सौदे को एकतरफा तोड़ना और विश्व व्यापार संगठन के अपीलीय निकाय को पंगु बनाना—ये ट्रंप के वे कदम हैं जिन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि अमेरिका अब उन नियमों को नहीं मानेगा जिन्हें उसने खुद बनाया था। यह 'अराजक विश्व व्यवस्था' की शुरुआत है। यह एक ऐसी दुनिया है जहां 'बहुपक्षवाद' मर चुका है और 'द्विपक्षीय दादागिरी' का बोलबाला है। जब 'अधिनायक' ही नियमों को तोड़ने लगे, तो दुनिया 'मत्स्यन्याय' यानी जंगल के कानून की ओर लौटने लगती है, जहां केवल वही सुरक्षित है जिसके पास नुकीले दांत और मजबूत जबड़े हैं। ट्रंप का संदेश स्पष्ट है: 'हम नियम नहीं बनाएंगे, हम परिणाम तय करेंगे।'
अटलांटिक में दरारें और यूरोप का अस्तित्वगत संकट
इस अराजकता का सबसे गहरा, सबसे वेदनापूर्ण प्रभाव अटलांटिक महासागर के दोनों किनारों पर महसूस किया जा रहा है। अमेरिका और यूरोप के बीच की वह साझेदारी, जिसे कभी 'पश्चिमी सभ्यता का आधारस्तंभ' और लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता था, आज अविश्वास के गहरे समुद्र में डूब रही है।
डावोस के गलियारों में यूरोपीय राजनयिकों के चेहरों पर एक अजीब सी बेचैनी और हताशा पढ़ी जा सकती है। दशकों तक यूरोप अमेरिका की सुरक्षा छतरी के नीचे निश्चिंत होकर सोता रहा, अपनी सेनाओं को छोटा करता रहा, अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाता रहा और अपने नागरिकों को 'कल्याणकारी राज्य' का आनंद देता रहा। लेकिन अब ट्रंप के अमेरिका ने उस छतरी को हटा लेने की धमकी दे दी है। यूरोप को यह कठोर संदेश दिया जा रहा है कि उसे अपनी सुरक्षा का खर्च खुद उठाना होगा। यह यूरोप के लिए केवल आर्थिक झटका नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक आघात है, जिसने उसकी पूरी पहचान को संकट में डाल दिया है।
यूरोप को लगता है कि यूक्रेन युद्ध और रूस विरोधी प्रतिबंधों का सबसे भारी आर्थिक बोझ उसने उठाया है। उसकी सस्ती ऊर्जा की आपूर्ति बंद हो गई, उसके उद्योग बंद हो रहे हैं, और महंगाई आसमान छू रही है। दूसरी ओर, अमेरिका अपनी ऊर्जा (एलएनजी) और हथियारों को ऊंचे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहा है और साथ ही 'मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम' के जरिए यूरोपीय उद्योगों को अमेरिका खींच रहा है। यह 'मित्रता' अब यूरोप को 'शोषण' जैसी प्रतीत होने लगी है। डावोस में अमेरिकी प्रतिनिधियों का रवैया स्पष्ट करता है कि उनके लिए यूरोप अब 'समान भागीदार' नहीं, बल्कि एक 'कनिष्ठ सहयोगी' है जिसे वाशिंगटन के आदेशों का पालन करना चाहिए, चाहे उससे उसका कितना ही नुकसान क्यों न हो।
यही कारण है कि यूरोप, अपनी तमाम हिचकिचाहट और आंतरिक मतभेदों के बावजूद, अब चीन की ओर एक उम्मीद भरी नजर से देख रहा है। यह यूरोप का वैचारिक हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि उसकी 'रणनीतिक विवशता' है। जर्मन उद्योगपति और फ्रांसीसी रणनीतिकार यह समझ चुके हैं कि वे अमेरिका और चीन के बीच के इस महायुद्ध में केवल 'मोहरा' नहीं बन सकते। चीन के साथ 'जोखिम न्यूनीकरण' की बात करते हुए भी यूरोप व्यापार के दरवाजे खुले रखना चाहता है। यह उसी प्रकार की स्थिति है जैसे डूबता हुआ व्यक्ति तिनके का सहारा ढूंढता है—भले ही वह तिनका उसका प्रतिद्वंद्वी ही क्यों न हो। यूरोप आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां एक रास्ता अमेरिकी अधीनता की ओर जाता है और दूसरा अनिश्चितता के अंधेरे की ओर।
नया कुरुक्षेत्र और संसाधन राष्ट्रवाद
यदि नव-उपनिवेशवाद का एक चेहरा वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच की तनातनी है, तो उसका दूसरा और अधिक भयावह चेहरा बर्फीले उत्तर में, विशेषकर ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में दिखाई दे रहा है।
इतिहास गवाह है कि साम्राज्यों की भूख कभी मिटती नहीं; वह केवल अपना भोजन बदलती है। 2019 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को 'खरीदने' का प्रस्ताव रखा था, तो वैश्विक मीडिया ने इसे एक रीयल-एस्टेट मुगल का मजाक समझकर उड़ा दिया था। लेकिन सामरिक दृष्टि रखने वालों के लिए यह एक गंभीर खतरे की घंटी थी। यह प्रस्ताव 21वीं सदी में 19वीं सदी की उस औपनिवेशिक मानसिकता की वापसी थी, जो भूगोल को राष्ट्र, संस्कृति या लोगों का घर नहीं, बल्कि केवल एक 'परिसंपत्ति' मानती है जिसका सौदा किया जा सकता है।
ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र आज महाशक्तियों के लिए 'भविष्य का खजाना' बन गए हैं। जलवायु परिवर्तन, जिसे दुनिया के लिए संकट माना जाता है, महाशक्तियों के लिए एक 'अवसर' बनकर उभरा है। पिघलती बर्फ ने न केवल नए समुद्री मार्ग (जो एशिया और यूरोप की दूरी कम कर देंगे) खोल दिए हैं, बल्कि बर्फ की सफेद चादर के नीचे दबे यूरेनियम, दुर्लभ खनिजों (जो चिप्स और बैटरियों के लिए अनिवार्य हैं), तेल और प्राकृतिक गैस के असीमित भंडारों को भी उजागर कर दिया है। अमेरिका और यूरोप के बीच ग्रीनलैंड को लेकर चल रही कूटनीतिक खींचतान ने यह सिद्ध कर दिया है कि 'पर्यावरण संरक्षण' के नारे अक्सर 'संसाधन नियंत्रण' की मंशा को छिपाने के लिए लगाए जाते हैं।
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे आर्कटिक का प्रहरी बनाती है। अमेरिका इसे रूस और चीन के खिलाफ अपने 'अभेद्य विमानवाहक पोत' के रूप में देखता है। वहीं, डेनमार्क और यूरोपीय संघ इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानते हैं, लेकिन उनके पास इसकी सुरक्षा करने की क्षमता सीमित है। यह खींचतान केवल एक द्वीप के लिए नहीं है; यह इस बात का निर्धारण करने के लिए है कि भविष्य की ऊर्जा और सामरिक मार्गों पर किसका नियंत्रण होगा।
आर्कटिक काउंसिल, जो कभी शांतिपूर्ण वैज्ञानिक सहयोग का मंच था, अब बिखर चुका है। रूस अपने उत्तरी तटों का आक्रामक सैन्यीकरण कर रहा है, नए अड्डे बना रहा है। चीन, जिसका आर्कटिक से कोई सीधा सीमा संपर्क नहीं है, खुद को 'निकट-आर्कटिक राज्य' घोषित कर रहा है और वहां 'पोलर सिल्क रोड' बनाने की महत्वाकांक्षा रखता है। जवाब में अमेरिका ग्रीनलैंड पर अपना प्रभाव जमा रहा है। यह 'आर्कटिक के लिए होड़' बिल्कुल वैसी ही है जैसा 19वीं सदी में अफ्रीका के लिए हुआ था—एक ऐसा 'अस्वामित क्षेत्र' जिसे ताकतवर भेड़िए आपस में बांट लेना चाहते हैं। यहां संप्रभुता का अर्थ 'ध्वज फहराना' नहीं, बल्कि संसाधनों को खोद निकालना है।
कनाडा, जो अमेरिका का पड़ोसी और सहयोगी है, इस खेल में एक मूक दर्शक और कुछ हद तक पीड़ित की भूमिका में है। उसकी स्थिति उस छोटे भाई जैसी है जो बड़े भाई की दादागिरी से असहज तो है, लेकिन विरोध करने की स्थिति में नहीं। कनाडा की यह चुप्पी और भय, डावोस की वातानुकूलित चर्चाओं के बीच, छोटे और मध्यम राष्ट्रों की विवशता का प्रतीक है, जो यह देख रहे हैं कि उनके पिछवाड़े में महाशक्तियां शतरंज की बिसात बिछा रही हैं।
डिजिटल साम्राज्यवाद
अब दृष्टि को भूगोल के नक्शे से हटाकर उस दुनिया की ओर ले चलते हैं जो अदृश्य है, लेकिन सर्वव्यापी है—डिजिटल दुनिया। आज की शब्दावली में जिसे 'तकनीकी-सामंतवाद' कहा जा रहा है, वह वास्तव में नव-उपनिवेशवाद का डिजिटल चेहरा है। यह उपनिवेशवाद का सबसे खतरनाक रूप है क्योंकि यह जमीन पर कब्जा नहीं करता, बल्कि दिमागों पर कब्जा करता है।
18वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के बहाने प्रशासनिक नियंत्रण हासिल किया था। 21वीं सदी में सिलिकॉन वैली की दिग्गज तकनीकी कंपनियां (अमेजन, गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट) और चीन की तकनीकी दिग्गज कंपनियां—यही भूमिका निभा रही हैं। औपनिवेशिक काल में अफ्रीका और एशिया से कच्चा माल (कपास, मसाले, खनिज) लूटा जाता था और उन्हें महंगे उत्पाद बेचे जाते थे; आज 'डेटा' वह नया सोना है जिसे लूटा जा रहा है।
विकासशील देशों के नागरिकों का डेटा—उनकी पसंद, उनकी राजनीतिक विचारधारा, उनका वित्तीय व्यवहार, उनके बायोमेट्रिक्स, उनके डर और उनकी इच्छाएं—मुक्त रूप से इन वैश्विक कंपनियों द्वारा संकलित किया जाता है। इस डेटा को सुदूर कैलिफोर्निया या शंघाई में स्थित सर्वरों में 'परिष्कृत' किया जाता है। फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के माध्यम से इसी डेटा का उपयोग करके उन्हीं देशों के नागरिकों के व्यवहार को नियंत्रित, प्रभावित और निर्देशित किया जाता है। यह 'डेटा निष्कर्षण' की वह प्रक्रिया है जो राष्ट्रों को उनकी सबसे मूल्यवान संपत्ति—उनके नागरिकों की निजता और स्वतंत्र सोच—से वंचित कर रही है।
जब किसी देश की सूचना प्रणाली, न्याय प्रणाली या वित्तीय लेनदेन का आधार विदेशी एल्गोरिदम बन जाता है, तो उस देश की संप्रभुता केवल नाममात्र की रह जाती है, जैसे कोई कठपुतली। आज एल्गोरिदम ही यह तय करते हैं कि किसी समाज में क्या चर्चा होगी, कौन सा विमर्श सफल होगा, कौन सा झूठ सच बनेगा और कौन सा नेता चुनाव जीतेगा। यह 'मृदु शक्ति' का चरम और विकृत रूप है, जहां एक विदेशी शक्ति बिना एक भी गोली चलाए किसी समाज के मानसिक और सामाजिक ढांचे को पुनर्गठित कर सकती है। यदि कोई देश इन तकनीकी कंपनियों के विरुद्ध नियामक कार्रवाई करने का प्रयास करता है (जैसे कर लगाना या डेटा स्थानीयकरण), तो उसे 'तकनीकी अलगाव' और निवेश वापस लेने की धमकी दी जाती है। यह आधुनिक 'तोप-आधारित कूटनीति' है, जो बारूद से नहीं बल्कि 'डिजिटल अंधकार' और 'सेवाओं के निलंबन' से संचालित होती है।
तकनीकी रंगभेद और आपूर्ति शृंखलाओं का शस्त्रीकरण
नव-उपनिवेशवाद 2.0 का एक और घातक पक्ष 'तकनीकी रंगभेद' है। महाशक्तियां—विशेष रूप से अमेरिका और चीन—अब ऐसी उन्नत तकनीकों (जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग, 6जी, उन्नत सेमीकंडक्टर, जैव-प्रौद्योगिकी और एआई चिप्स) पर एकाधिकार कर रही हैं, जिन्हें वे शेष विश्व के साथ साझा नहीं करना चाहतीं। वे एक ऊंची दीवार खड़ी कर रहे हैं जिसके भीतर भविष्य की तकनीक है और बाहर केवल उपभोक्ता।
पहले व्यापारिक मार्ग और आपूर्ति शृंखलाएं केवल आर्थिक दक्षता और कम लागत के लिए बनाई जाती थीं, लेकिन अब वे 'रणनीतिक हथियार' बन चुकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियां और 'डी-कपलिंग' का दर्शन इसी रणनीति का हिस्सा है। जब दुनिया की आपूर्ति शृंखलाएं खंडित होती हैं, तो मध्यम और छोटे राष्ट्रों को किसी एक 'तकनीकी खेमे' का हिस्सा बनने के लिए मजबूर किया जाता है। यह राष्ट्रों की 'रणनीतिक स्वायत्तता' पर सीधा प्रहार है।
उदाहरण के लिए, सेमीकंडक्टर चिप्स, जो आधुनिक अर्थव्यवस्था का तेल हैं, अब नियंत्रण का मुख्य केंद्र हैं। यदि आप वाशिंगटन के पाले में नहीं हैं, तो आपको अत्याधुनिक एआई चिप्स नहीं मिलेंगे, जिससे आपका तकनीकी विकास रुक जाएगा; यदि आप बीजिंग के पाले में नहीं हैं, तो आपको हरित ऊर्जा के लिए सोलर पैनल और बैटरियां नहीं मिलेंगी। यह द्वैध शासन नव-उपनिवेशवाद का वह जाल है जिसमें राष्ट्र अपनी चुनने की स्वतंत्रता खो रहे हैं। यह 'चिप साम्राज्यवाद' है, जो तय करता है कि कौन सा देश भविष्य की दौड़ में दौड़ेगा और कौन सा केवल दर्शक दीर्घा में बैठकर तालियां बजाएगा।
राज्य का क्षरण और निजी संप्रभुता का उदय
नव-उपनिवेशवाद 2.0 की सबसे विचलित करने वाली और ऐतिहासिक रूप से अभूतपूर्व विशेषता यह है कि अब 'राज्य' (स्टेट) की शक्ति का एकाधिकार निजी हाथों में जा रहा है। 1648 की वेस्टफेलियन संधि ने जिस संप्रभु राज्य की अवधारणा को जन्म दिया था, वह अब 'कॉर्पोरेट संप्रभुता' के सामने घुटने टेक रही है।
इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण एलोन मस्क और उनकी स्टारलिंक सेवा है। जब एक अकेला व्यक्ति यह निर्णय लेने की क्षमता रखता है कि यूक्रेन युद्ध में किस क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएं सक्रिय रहेंगी और कहां बंद कर दी जाएंगी, तो वह एक 'स्वतंत्र संप्रभु' की तरह व्यवहार कर रहा होता है। यह किसी भी निर्वाचित सरकार की शक्ति से बड़ा और भयानक हस्तक्षेप है। अतीत में राजा युद्ध का निर्णय लेते थे, आज एक तकनीकी सीईओ यह तय कर सकता है कि ड्रोन उड़ेंगे या नहीं।
स्टारलिंक या अन्य उपग्रह प्रणालियां आज केवल संचार सेवाएं नहीं हैं; ये भू-राजनीतिक उपकरण हैं। मस्क जैसे 'तकनीकी-कुलीन' अब वैश्विक कूटनीति में कई देशों के राष्ट्रध्यक्षों से अधिक प्रभावशाली हो गए हैं। यह 'निजी उपनिवेशवाद' का वह युग है जहां देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और संचार के लिए किसी निजी कंपनी के 'नियमों और शर्तों' के मोहताज हैं। यदि इन निजी कुबेरों का हित किसी शत्रु देश के साथ मेल खाता है, तो वे एक संप्रभु राष्ट्र की रक्षात्मक क्षमता को पल भर में पंगु बना सकते हैं।
इसी प्रकार, युद्ध का निजीकरण भी हो रहा है। चाहे रूस का वैगनर ग्रुप (अब परिवर्तित रूप में) हो या पश्चिमी देशों की निजी सैन्य कंपनियां, ये अब राज्यों के लिए 'प्रॉक्सी' का काम कर रही हैं। अफ्रीका के कई देशों में सोने और हीरे की खदानों की सुरक्षा अब इन निजी सेनाओं के हाथों में है, जो स्थानीय सरकारों के समानांतर अपनी सत्ता चलाती हैं। यह 'कॉर्पोरेट जागीरदारी' का आधुनिक रूप है, जहां वफादारी राष्ट्र के प्रति नहीं, बल्कि पे-चेक के प्रति होती है।
शोषण के नए मुखौटे
नव-उपनिवेशवाद का आर्थिक पहलू भी उतना ही विकृत है। एक ओर चीन का मॉडल है, जिसे अक्सर 'ऋण-जाल कूटनीति' कहा जाता है। इसमें गरीब देशों को अवसंरचना के नाम पर इतना कर्ज दिया जाता है जिसे वे चुका न सकें, और अंततः उन्हें अपनी रणनीतिक संपत्तियां (बंदरगाह, खदानें) गिरवी रखनी पड़ती हैं। यह श्रीलंका से लेकर जाम्बिया तक देखा गया है।
दूसरी ओर, पश्चिमी संस्थाएं (आईएमएफ, विश्व बैंक) हैं, जो ऋण तो देती हैं लेकिन उनके साथ कठोर शर्तें जुड़ी होती हैं—जैसे सरकारी खर्च कम करना, सब्सिडी हटाना और बाजारों को पश्चिमी कंपनियों के लिए खोलना। यह भी एक प्रकार का नियंत्रण है जो देशों को गरीबी के दुष्चक्र में फंसाए रखता है।
इसके साथ ही, 'हरित उपनिवेशवाद' का उदय हो रहा है। पश्चिमी देश, जिन्होंने दो सदियों तक कोयला जलाकर अपना विकास किया, अब विकासशील देशों पर कड़े पर्यावरणीय मानक थोप रहे हैं। वे कांगो और लैटिन अमेरिका से कोबाल्ट और लिथियम (जो इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चाहिए) तो सस्ती दरों पर चाहते हैं, लेकिन उन देशों को उन्हीं संसाधनों का उपयोग करके अपना औद्योगीकरण करने से रोकते हैं। यह पर्यावरण की रक्षा के नाम पर किया जाने वाला आर्थिक दमन है। डावोस में जब जलवायु परिवर्तन पर चर्चा होती है, तो यह विरोधाभास साफ दिखता है—निजी जेट से आने वाले अरबपति उन देशों को उपदेश देते हैं जिनके पास बिजली तक नहीं है।
ग्लोबल साउथ का प्रतिरोध और भारत: एक वैकल्पिक ध्रुव
जब हम 'नियम-आधारित विश्व व्यवस्था' के ढहने और नव-उपनिवेशवाद के उदय की चर्चा करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान पश्चिम की ओर होता है। किंतु इस ऐतिहासिक मंथन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 'ग्लोबल साउथ' में लिखा जा रहा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के वे राष्ट्र, जो सदियों तक पुराने उपनिवेशवाद के शिकार रहे, अब इस नए जाल को पहचानने लगे हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान 'वैक्सीन रंगभेद' (जब पश्चिम ने टीकों का भंडारण किया) और जलवायु परिवर्तन के नाम पर थोपे जा रहे अनुचित प्रतिबंधों ने ग्लोबल साउथ की आंखों से पश्चिमी नैतिकता का पर्दा हमेशा के लिए हटा दिया है। वे देख रहे हैं कि एक तरफ चीन का 'चेकबुक साम्राज्यवाद' है, और दूसरी तरफ पश्चिम का 'संरक्षणवादी यथार्थवाद' है। इन दोनों के बीच फंसने के बजाय, वे अब अपनी आवाज उठा रहे हैं।
इस वैश्विक अंधकार और अराजकता के मध्य, भारत एक 'प्रकाशस्तंभ' की तरह उभर रहा है। भारत की स्थिति अद्वितीय है—वह न तो पश्चिम का पिछलग्गू है और न ही चीन का आश्रित राज्य। भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक खेमे में बांधने से साफ इनकार कर दिया है। डावोस में भारत की उपस्थिति एक याचक की नहीं, बल्कि एक समाधान प्रदाता और 'विश्वमित्र' की है।
भारत, ग्लोबल साउथ के लिए एक 'वैकल्पिक मॉडल' पेश कर रहा है जो शोषण पर नहीं, सशक्तिकरण पर आधारित है:
1. डिजिटल स्वायत्तता: जहां अमेरिका और चीन डेटा को नियंत्रित और एकाधिकारवादी बनाना चाहते हैं, भारत ने 'डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना' (जैसे यूपीआई, आधार, ओएनडीसी) का एक लोकतांत्रिक मॉडल दुनिया को दिया है। यह मॉडल 'मुक्त-स्रोत' (ओपन-सोर्स) है और डेटा की प्रभुता को नागरिकों और राष्ट्र के पास रखता है, न कि सिलिकॉन वैली या बीजिंग के सर्वरों में। यह 'डिजिटल वि-उपनिवेशीकरण' की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है, जिसे अब कई देश अपना रहे हैं।
2. बहुध्रुवीयता का संतुलन: भारत ने जी-20 की अध्यक्षता के दौरान 'अफ्रीकी संघ' को स्थायी सदस्यता दिलाकर यह सिद्ध किया कि वह वैश्विक शासन का लोकतंत्रीकरण चाहता है। भारत की 'गुटनिरपेक्षता 2.0' निष्क्रियता की नहीं, बल्कि 'रणनीतिक स्वायत्तता' और 'विश्वबंधुत्व' की सक्रिय नीति है।
3. मूल्य-आधारित यथार्थवाद: रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या पश्चिम एशिया का तनाव, भारत ने शांति और कूटनीति की वकालत करते हुए भी अपने ऊर्जा हितों और सुरक्षा से समझौता नहीं किया। भारत ने दिखाया है कि राष्ट्रीय हित और वैश्विक नैतिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन और जैव-ईंधन गठबंधन जैसी पहलें भारत के रचनात्मक नेतृत्व का प्रमाण हैं।
प्रज्ञा की विजय या शक्ति का तांडव?
डोनाल्ड ट्रंप का 'अराजक यथार्थवाद' दुनिया के लिए एक कड़वी दवा की तरह है, जिसने उस 'उदारवादी सुरक्षा कवच' को उतार फेंका है जिसके पीछे महाशक्तियां अपने हित साध रही थीं। ट्रंप ने दुनिया को यह अहसास करा दिया है कि अब कोई 'वैश्विक पुलिसकर्मी' नहीं है जो आपकी रक्षा करेगा। अब हर राष्ट्र को अपनी सुरक्षा का दायित्व स्वयं उठाना होगा।
डावोस की पहाड़ियों से लेकर ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों तक, और सिलिकॉन वैली के बोर्डरूम से लेकर अफ्रीकी खदानों तक—संदेश स्पष्ट है: संप्रभुता अब अधिकार नहीं, बल्कि एक अर्जित शक्ति है। यह वह दुनिया है जहां कमजोरों की कोई सुनवाई नहीं है, जब तक कि वे एकजुट न हों।
आज संप्रभु होने का अर्थ बदल गया है। वेस्टफेलियन संप्रभुता (सीमाओं की सुरक्षा) अब पर्याप्त नहीं है। आज एक राष्ट्र को संप्रभु रहने के लिए 'त्रि-आयामी सुरक्षा' की आवश्यकता है:
1. डिजिटल संप्रभुता: अपने डेटा, नेटवर्क और एल्गोरिदम पर पूर्ण नियंत्रण।
2. संसाधन संप्रभुता: अपनी आपूर्ति शृंखलाओं, खनिजों और ऊर्जा स्रोतों की सुरक्षा।
3. बौद्धिक संप्रभुता: अपने विकास का मॉडल स्वयं तय करने का साहस और अपनी संस्कृति को विदेशी नैरेटिव से बचाने की क्षमता।
नव-उपनिवेशवाद 2.0 का यह दौर मानवता के धैर्य, विवेक और 'प्रज्ञा' की परीक्षा है। यदि राष्ट्रों ने केवल शक्ति का पीछा किया, तो वे किसी न किसी साम्राज्य के उपग्रह बनकर रह जाएंगे। हम फिर से गुटों में बंटी हुई दुनिया देखेंगे जो तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ सकती है। किंतु यदि दुनिया ने भारत द्वारा प्रस्तावित सहयोग, समावेशिता, सुधारवादी बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता के मार्ग को अपनाया, तो शायद हम इस अराजकता के गर्भ से एक नई, न्यायपूर्ण और संतुलित विश्व व्यवस्था को जन्म दे सकें।
इतिहास की कलम अभी रुकी नहीं है; वह एक नए अध्याय की भूमिका लिख रही है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस अध्याय को 'संघर्ष' और 'वर्चस्व' की स्याही से लिखेंगे या 'सहयोग' और 'सह-अस्तित्व' की? जंजीरें अब लोहे की नहीं, डेटा और निर्भरता की हैं, और उन्हें तोड़ने के लिए हथौड़े की नहीं, बल्कि दूरदृष्टि और सामूहिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। डावोस की पिघलती बर्फ शायद यही चेतावनी दे रही है कि यदि हमने समय रहते अपने तौर-तरीके नहीं बदले, तो हम एक ऐसे शीत युद्ध में प्रवेश कर जाएंगे जो पिछली सदी से कहीं अधिक ठंडा और विनाशकारी होगा।
ग्रीनलैंड: एआई तस्वीरों में छिपी ट्रंप की 'डोनरो डॉक्ट्रिन'
हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रूथ' पर एक एआई-जनित तस्वीर साझा कर भू-राजनीतिक भूचाल ला दिया। इस तस्वीर में ट्रंप, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और उपराष्ट्रपति जेडी वैंस के साथ ऐतिहासिक 'इवो जिमा' की तर्ज पर ग्रीनलैंड की बर्फीली धरती पर अमेरिकी झंडा गाड़ते दिख रहे हैं। इतना ही नहीं, एक अन्य साझा की गई तस्वीर में कनाडा को भी अमेरिकी क्षेत्र के रूप में चित्रित किया गया है।
यह केवल सोशल मीडिया की शरारत नहीं, बल्कि ट्रंप की आक्रामक 'डोनरो डॉक्ट्रिन' का उद्घोष है। ग्रीनलैंड को 'यूरोपीय कमांड' से हटाकर अमेरिकी 'नॉर्थकोम' के अधीन करना और 'मेक ग्रीनलैंड ग्रेट अगेन' एक्ट के जरिए वहां के नागरिकों को डेनमार्क से अलग होने के लिए वित्तीय प्रस्ताव देना, यह दर्शाता है कि अमेरिका दुर्लभ खनिजों और अपनी प्रस्तावित 'गोल्डन डोम' रक्षा परियोजना के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। डेनमार्क और नाटो सहयोगियों की नाराजगी के बावजूद, ट्रंप का संदेश स्पष्ट है—ग्रीनलैंड अब यूरोप का हिस्सा नहीं, बल्कि अमेरिकी सुरक्षा कवच का अनिवार्य अंग है।
अब किसकी बारी ?
वेनेजुएला में अपेक्षाकृत आसान और कम-प्रतिक्रिया वाली कार्रवाई ने ट्रंप प्रशासन को यह विश्वास दिलाया है कि एकतरफा सैन्य कदमों की अंतरराष्ट्रीय लागत सीमित है। रूस और चीन की बयानबाज़ी, भारत- यूरोप की चुप्पी और संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता ने इस आत्मविश्वास को और मजबूत किया है। नतीजतन, ट्रंप की धमकियों को अब शेखी नहीं, बल्कि आगामी कार्रवाइयों की प्रस्तावना के रूप में देखा जाएगा। वेनेजुएला केवल शुरुआत है। ट्रंप का अमेरिका अब संयम नहीं, बल्कि दबदबे को अपनी विदेश नीति का आधार बना चुका है—और यही दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है। ट्रंप का अगला निशाना इनपर हो सकता हैः-
क्यूबा
अधूरा सपना, अब निर्णायक मोड़ पर
क्यूबा दशकों से अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान की आंखों में खटकता रहा है। शीत युद्ध के दौर से चला आ रहा यह वैचारिक संघर्ष अब ट्रंप के दौर में नए सिरे से उभरता दिख रहा है। व्हाइट हाउस का आकलन है कि वेनेजुएला से मिलने वाली आर्थिक और राजनीतिक मदद बंद होने के बाद क्यूबा की कम्युनिस्ट व्यवस्था स्वतः ढह जाएगी। ट्रंप के बयानों से संकेत मिलता है कि वाशिंगटन सक्रिय हस्तक्षेप से अधिक नियंत्रित पतन की रणनीति अपना सकता है, जिसमें आर्थिक दबाव और कूटनीतिक अलगाव प्रमुख हथियार होंगे।
कोलंबिया
ड्रग्स के बहाने सत्ता परिवर्तन की तैयारी
कोलंबिया को लेकर ट्रंप की भाषा असाधारण रूप से आक्रामक है। राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो को सार्वजनिक रूप से 'बीमार देश का बीमार शासक' कहना केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य या अर्धसैन्य हस्तक्षेप का संकेत है। कोकीन उत्पादन और तस्करी को आधार बनाकर अमेरिका कोलंबिया में प्रत्यक्ष कार्रवाई को नैतिक और राजनीतिक रूप से उचित ठहराने की कोशिश कर सकता है। यह रणनीति ड्रग वॉर की आड़ में सत्ता परिवर्तन की राह खोलती है।
मैक्सिको
संप्रभु पड़ोसी, लेकिन असहज लक्ष्य
मैक्सिको अमेरिका का साझेदार भी है और समस्या भी। ट्रंप के अनुसार, वहां कार्टेल सरकार से अधिक शक्तिशाली हो चुके हैं। यह कथन दरअसल मैक्सिको की संप्रभुता पर सीधा प्रश्नचिह्न है। राष्ट्रपति क्लाउडिया शिनबाम द्वारा अमेरिकी कार्रवाई का विरोध ट्रंप प्रशासन को और आक्रामक बना सकता है। सीमा सुरक्षा और नशीली दवाओं के नाम पर मैक्सिको पर सैन्य या आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका स्पष्ट है।
ईरान
मध्य पूर्व का स्थायी शत्रु
ईरान ट्रंप की विदेश नीति में हमेशा से उच्च प्राथमिकता पर रहा है। आंतरिक विरोध प्रदर्शनों और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच व्हाइट हाउस ईरान पर 'निर्णायक झटका' देने की बात दोहरा चुका है। इज़राइल में राजनीतिक संकट और बेंजामिन नेतन्याहू की अस्थिर सरकार, ट्रंप को ईरान के खिलाफ फिर से आक्रामक रुख अपनाने के लिए उकसा सकती है। यह टकराव केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकता है।
ग्रीनलैंड
रणनीति, संसाधन और सैन्य वर्चस्व
ग्रीनलैंड अब केवल बर्फ़ीला द्वीप नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा का घोषित लक्ष्य बन चुका है। ट्रंप के अनुसार, रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी इसे रणनीतिक रूप से अनिवार्य बनाती है। डेनमार्क और यूरोप की आपत्तियों के बावजूद, ट्रंप ने साफ संकेत दिया है कि आवश्यकता पड़ने पर अमेरिका बल प्रयोग से भी पीछे नहीं हटेगा। यह पहली बार है जब किसी नाटो सदस्य के क्षेत्र को लेकर अमेरिका खुली सैन्य भाषा बोल रहा है।