आवरण कथा/ अमेरिका: शक, शक्ति, संकट
मनोज कुमार
| 02 Apr 2026 |
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अमेरिका आज एक ऐसी फिल्म के 'मिड-सीजन' जैसा है, जहां हीरो और विलेन का फर्क पूरी तरह मिट चुका है। डोनाल्ड ट्रम्प, जो व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में अपनी दूसरी पारी खेल रहे हैं, अब केवल एक राष्ट्रपति नहीं हैं, वे एक 'इकोलॉजिकल फिनोमिना' बन चुके हैं। उनका दूसरा कार्यकाल उस 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का चरमोत्कर्ष है, जिसने उदारवादी वैश्विक व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है। यह वह दौर है जहां अमेरिका अपना 'ग्लोबल पुलिसमैन' वाला चश्मा उतार चुका है और एक ऐसे आत्ममुग्ध राष्ट्र में तब्दील हो गया है, जो अपने ही घर की आग बुझाने में असमर्थ है। यह परिदृश्य केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चुनौती है जहां दुनिया का महाशक्ति आज अपनी ही पहचान के संकट के भंवर में फंसा हुआ है।
'मागा' का कट्टरपंथी उत्तराधिकार
ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल कोई सामान्य राजनीतिक वापसी नहीं, बल्कि अमेरिकी लोकतांत्रिक ढांचे का एक 'हार्ड-रीसेट' है। रिपब्लिकन पार्टी अब वह पुरानी 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी' नहीं रही, जो कभी मुक्त व्यापार और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप का झंडाबरदार थी। आज की रिपब्लिकन पार्टी एक 'मागा' मशीन है, जिसका ईंधन वाशिंगटन के 'अभिजात वर्ग' के प्रति नफरत और कट्टर राष्ट्रवाद है।
संस्थानों के प्रति अविश्वास अब अमेरिका का नया धर्म बन चुका है। ट्रम्प ने एफबीआई, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसे संस्थानों को जिस तरह से 'पॉलिटिसाइज' किया है, उसने अमेरिकी लोकतंत्र की आत्मा को ही झकझोर दिया है। भारत के लिए यह सबसे बड़ा खतरा है। हम एक ऐसे अमेरिका के साथ साझेदारी की उम्मीद कर रहे हैं, जहां 'ट्रम्पवाद' का अर्थ ही यह है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता, कोई भी संधि तब तक मान्य है जब तक ट्रम्प के निजी हितों की पूर्ति होती रहे। यह अनिश्चितता एक ऐसी अस्थिरता है जो किसी भी समझौते को रातों-रात रद्दी की टोकरी में डालने की ताकत रखती है।
'अमेरिका फर्स्ट' का वैश्विक प्रभाव
ट्रम्प ने दुनिया को वह सच दिखाया जिसे अमेरिका हमेशा छिपाता रहा था - 'हम यहां परोपकार के लिए नहीं, अपनी जेब भरने के लिए बैठे हैं।' उनके दूसरे कार्यकाल ने नाटो को एक 'ज़ोम्बी' की तरह छोड़ दिया है, जो केवल नाम का गठबंधन रह गया है।
यूरोप को यह समझ आ गया है कि वे सुरक्षा के लिए अब हमेशा अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकते। अब अमेरिका अपनी सेनाओं को अटलांटिक से हटाकर हिंद-प्रशांत की ओर केंद्रित कर रहा है, लेकिन यह कोई 'भारत-प्रेम' नहीं है। यह चीन के बढ़ते ड्रैगन को रोकने की एक 'रणनीतिक विवशता' है।
भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका का 'अलगाववाद' अब उसकी स्थायी नीति है। वह अपनी टैरिफ दीवारों को ऊंचा कर रहा है, और 'डी-कपलिंग' का अर्थ है कि अमेरिका अपनी तकनीक और नौकरियां किसी भी हाल में बाहर नहीं जाने देगा। ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल भारत के लिए एक तलवार की धार पर चलने जैसा है—जहां रक्षा और तकनीक में सहयोग तो बढ़ेगा, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर हमें 'अमेरिका फर्स्ट' की मार झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा।
चीन के साथ 'परमानेंट कोल्ड वॉर'
ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में चीन के खिलाफ 'ट्रेड वॉर' अब एक 'परमानेंट कोल्ड वॉर' में बदल चुका है। यहां एक सुखद संयोग यह है कि चीन के प्रति नफरत पर पूरा अमेरिकी तंत्र एकमत है। भारत-अमेरिका तकनीक साझेदारी इसी ठंडे युद्ध का एक उत्पाद है। अमेरिका अब तकनीक का हस्तांतरण कर रहा है, लेकिन इसके पीछे उसकी मंशा भारत को एक 'टेक्नोलॉजी चौकी' के रूप में तैयार करना है, जो चीन के डिजिटल प्रभुत्व को काउंटर कर सके।
भारत इस खेल में एक 'हाई-स्टेक प्लेयर' है। इंजन टेक्नोलॉजी से लेकर सेमीकंडक्टर्स तक, अमेरिका भारत को एक 'ट्रस्टेड इकोसिस्टम' बनाना चाहता है। क्या हम चीन के खिलाफ अमेरिका के मोहरे हैं, या हम अपनी संप्रभुता के लिए अमेरिका को इस्तेमाल कर रहे हैं? यह रेखा बहुत महीन है। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में यह 'तकनीकी धर्मयुद्ध' और अधिक क्रूर होने वाला है, जहां दुनिया दो स्पष्ट डिजिटल ब्लॉकों में बंट जाएगी।
एक देश, दो दुनिया
ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल अमेरिकी समाज को 'मानसिक रूप से' दो हिस्सों में बांट चुका है। तटीय शहरों का उदारवादी अमेरिका और भीतरी राज्यों का कट्टरपंथी अमेरिका—ये दो अलग राष्ट्र हैं जो एक ही पासपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। नस्ल, लिंग और पहचान की राजनीति ने संवाद की हर संभावना को 'ब्लॉक' कर दिया है।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने अमेरिकी समाज को 'पोस्ट-ट्रुथ' दौर में धकेल दिया है, जहां तथ्य नहीं, केवल धारणाएं शासन करती हैं। भारतीय प्रवासियों के लिए यह 'पहचान का संकट' है। एक तरफ आप अमेरिका की तरक्की का हिस्सा हैं, और दूसरी तरफ आपको एक 'विदेशी' के रूप में देखा जा रहा है। यह सामाजिक विखंडन अमेरिका की उस 'सॉफ्ट पावर' को खत्म कर रहा है, जिसका उपयोग वह दुनिया को 'लोकतंत्र' सिखाने में करता था। अब अमेरिका खुद एक 'केस स्टडी' है कि कैसे एक महान साम्राज्य अंदर से सड़ता है।
आत्मनिर्भरता ही एकमात्र रास्ता
ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल 'अनिश्चितता' का दूसरा नाम है। भारत को यह समझ लेना चाहिए कि अमेरिका अब वह 'स्थिर साझीदार' नहीं है जिस पर 90 के दशक में भरोसा किया जा सकता था। आज का अमेरिका एक ऐसी महाशक्ति है जो अपनी ही परछाईं से डर रही है। रक्षा और तकनीक में साझेदारी बढ़ेगी क्योंकि अमेरिका को चीन के खिलाफ भारत की जरूरत है, लेकिन वीजा और प्रवासन जैसे मामलों में 'अमेरिका फर्स्ट' की तलवार हमेशा लटकी रहेगी। हमें अब अपनी सुरक्षा, अपनी अर्थव्यवस्था और अपनी तकनीक के लिए वाशिंगटन की ओर टकटकी लगाकर नहीं देखना है। ट्रम्प भले ही व्हाइट हाउस में विराजमान हों, लेकिन उन्होंने जिस 'पेंडोरा बॉक्स' को खोल रखा है, उसमें से निकली अराजकता वैश्विक राजनीति के नियमों को हमेशा के लिए बदल चुकी है।
घायल महाशक्ति की त्रासदी
ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल एक ऐसी फिल्म का हिस्सा है, जिसका अंत अभी लिखा जाना बाकी है। अमेरिका आज वह घायल महाशक्ति है, जो अपनी ही महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबी है। भारत के लिए सबक स्पष्ट है—रणनीतिक साझेदारी जरूरी है, लेकिन 'निर्भरता' आत्मघाती है। दुनिया ने देख लिया है कि अमेरिकी लोकतंत्र कितना नाजुक है। ट्रम्प का यह दौर केवल एक राष्ट्रपति का कार्यकाल नहीं, बल्कि एक युग के अंत की शुरुआत है। आने वाला समय गठबंधन का नहीं, बल्कि 'रणनीतिक स्वार्थों' का है। 2028 तक का यह सफर विश्व के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है, जहां अमेरिका अपने ही भीतर के तूफानों से लड़ रहा है और भारत को अपनी राह खुद बनानी है।