पश्चिमी देशों और अमेरिका के लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद भारत और रूस ने अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को एक नए अवतार में पेश करने का खाका तैयार किया है। वैश्विक राजनीति में आ रहे त्वरित बदलावों, आर्थिक अनिश्चितताओं और बदलते शक्ति-संतुलन के दौर में दोनों देशों का यह कदम रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक बड़ा दांव माना जा रहा है।
'इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज' की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यूरेशियाई और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में बदलते पावर-डायनेमिक्स के बीच भारत-रूस के आठ दशकों पुराने कूटनीतिक संबंध वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
मल्टी-पोलर वर्ल्ड ऑर्डर और कूटनीतिक संतुलन
भारत की 'पंचशील' विदेश नीति और संप्रभु समानता के सिद्धांतों के अनुरूप यह साझेदारी एक ऐसे न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण पर जोर देती है, जहां क्षेत्रीय अखंडता और आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप की गारंटी हो।
वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच आयोजित वार्षिक शिखर सम्मेलन इस दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर रहा। 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप डायलॉग' के तहत हुई इस संस्थागत बैठक में न केवल पारंपरिक रक्षा साझेदारी को मजबूत किया गया, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, अंतरिक्ष, स्मार्ट सिटी, कृषि, नवाचार, जलवायु परिवर्तन और ध्रुवीय अनुसंधान जैसे विविध क्षेत्रों में अरबों डॉलर के बहुआयामी समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।
रक्षा व रणनीतिक सहयोग का नया ढांचा
दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध केवल 'खरीददार-विक्रेता' तक सीमित न रहकर संयुक्त विकास और तकनीक हस्तांतरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़े हैं।
1. प्रमुख रक्षा समझौते: पांच S-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम, चार एडमिरल ग्रिगोरोविच-क्लास (प्रोजेक्ट 11356) गाइडेड मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट के लिए अंतर-सरकारी समझौते, और भारत में 200 'कामोव'-226 टी हेलीकॉप्टरों के निर्माण हेतु संयुक्त उद्यम शामिल हैं।
2. संयुक्त पहल व तकनीक: ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली का सफल विकास, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का संयुक्त डिजाइन, तथा भारत में ही सुखोई Su-30MKI और T-90 टैंकों का लाइसेंस प्राप्त उत्पादन इस ऐतिहासिक जुड़ाव की रीढ़ हैं।
3. नौसेना व ऊर्जा: रूस निर्मित विमानवाहक पोत INS विक्रमादित्य का भारतीय नौसेना में शामिल होना द्विपक्षीय रक्षा संबंधों की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके साथ ही रूस से भारत तक प्रस्तावित सीधी गैस पाइपलाइन के संयुक्त अध्ययन से दोनों देशों के ऊर्जा सुरक्षा समीकरणों को नया बल मिलेगा।
वैश्विक मंच पर जारी भारी दबाव के बीच भारत और रूस का यह नया रुख यह स्पष्ट संदेश देता है कि भारत अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सुरक्षा हितों के मामले में किसी तीसरे देश के प्रभाव में निर्णय नहीं लेता। आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर फैला यह विविधीकरण दोनों देशों के रिश्तों को और अधिक टिकाऊ और दूरगामी बनाएगा।