मैडम, आपने कहा था कि मीडिया बिकाऊ है. अब इस कथन में यह स्पष्ट नहीं हुआ कि मीडिया बिकाऊ है, मालिकान बिकाऊ है, या फिर बाजारवाद के कारण यह सब हो रहा है. क्या आप जानती हैं कि किस तरह से बाजारवाद हावी है मीडिया पर? मैडम, मीडिया वही है, लेकिन कलम खरीद लिये गये हैं. अब कलमों में वह ताकत नहीं रही, जो कभी राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, आलोक मेहता, संतोष भारतीय, एस पी सिंह, एम जे अकबर, खुशवंत सिंह की कलम में हुआ करती थी. अब तो शुद्ध रूप से हम सब नौकरी कर रहे हैं. आज के कमोवेश सभी पत्रकार बेबस हैं, लाचार हैं, किचन जो चलानी पड़ती है. अगर मालिकों की न सुनें, तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा और अगर आपकी कही गई बातों को सही जगह प्लेस न करें, तो आप रूठ जाते हैं और आपकी नाराजगी दिखती है. क्योंकि आप सरेआम कह देते हैं कि मीडिया बिकाऊ है. मैं जानना चाहता हूं कि कौन बिकाऊ नहीं है. शाहरुख से लेकर अमिताभ तक सभी बिकाऊ है. मीडिया को सभी धमकी दे देते हैं. पिछले दिनों हमारे मित्र जेटली जी ने भी धमकी दे दी. एनडीटीवी को खुलेआम धमकी दे दी. फिर वापस ले ली. इस धमकी के बाद बीजेपी के विरोध में खबरें छपनी बंद हो गर्इं. हां, खबरें छपती थीं, लेकिन एक बार दिखा कर हटा दी जाती थीं. उस पर ज्यादा कुछ दिखाना मुश्किल हो गया था. अब सवाल यह उठता है कि जब चार-चार महीने काम करने के बाद सैलरी नहीं मिलती, तो क्या आप जैसे प्रबुद्ध नेता उन्हें सैलरी समय पर मिल जाए, इसके लिए कुछ करते हैं. क्या कभी आप मीडिया के दुख-दर्द को समझने की कोशिश करते हैं. जागरण जैसी संस्था ने जब रातों रात 250 लोगों को निकाल दिया, तो आप कहां थे? सभी सड़क पर आ गये थे. आपने कभी उनके घर में झांककर देखा कि उनका परिवार किस हालत में है. बच्चे परिवार से दूर हो गये, अपनी लड़ाई वे आज भी लड़ रहे हैं, लेकिन कोई भी नहीं आया. शर्मनाक है कि जिन लोगों को वोट देकर हम सिंहासन पर बैठाते हैं, वे भी नहीं आये. कई चैनल और कई अखबार से पिछले दो साल में अनगिनत लोगों को निकाल दिया गया, क्या आपने कभी उन लोगों की सुध ली? क्या आप कभी उनके दुख दर्द में शामिल हुए? नहीं हो सके न?
दरअसल, दो दिन पहले भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी और पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक तारिक फतेह के बीच उस समय तीखी तकरार देखने को मिली, जब एक कार्यक्रम के दौरान मीनाक्षी लेखी ने मीडिया पर जमकर निशाना साधा. बता दें कि दोनों फरीदाबाद में मानव रचना यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे थे. यहां उन्हें पत्रकारिता और भारतीय लोकतंत्र विषय पर पत्रकारिता के छात्रों से रूबरू होना था. पत्रकारिता के बहाने वे पत्रकारों पर ही टूट पड़ीं.
आश्चर्य की बात तो यह है कि इस मौके पर अपने संबोधन में मीनाक्षी लेखी ने कहा कि भारतीय मीडिया बिकाऊ है, वह रुपयों का पैकेट लेकर खबर लिखती है. उनकी बात सही हो सकती है, लेकिन वे थैलियां कहां पहुंचती हैं, कभी इस बात की जांच की गई. क्या मीडिया में सारे लोग बिकाऊ हैं. पुलिसवाले पैसा लेते हैं, इस पर आप क्यों नहीं बोलतीं? आंदोलन क्यों नहीं करतीं? दोषारोप करना बहुत आसान काम है, कठिन काम है कि आगे आकर सबूत दें कि किसने कहां कितना खाया. पत्रकारों ने कितना खाया और नेताओं ने कितना खाया. आप पाएंगे कि नेताओं ने देश को खोखला करके रख दिया. उस खाने में नेताओं का कितना हाथ है. क्या आप बताएंगे कि अभी नोटबंदी के बाद किस मीडिया पर्सन के घर में लाखों नये या पुराने नोट निकले? मीडिया के घर से एक पैसे भी नहीं निकले. 100 करोड़ से ऊपर नये नोट केवल और केवल नेताओं और दलालों के घर से निकले. बैंक कर्मियों के घर से निकले. कभी आपने इस बात पर आपत्ति क्यों नहीं जताई कि बीजेपी के लोग और कुछ और दक्षिण के नेताओं के घर में पैसे मिले. किसी ने टॉयलेट में पैसे छिपा कर रखा था, तो किसी ने बाथरूम में, तो कहीं पैसे बेडरूम की दीवारों में चुने मिले. यहां तक कि पेंटिंग के नीचे भी गुप्त खजाने मिले. बच्चों के स्कूल बैग में भी पैसे मिले. इन बातों का कभी आपने जिक्र नहीं किया. न ही आलोचना की और न ही इस पर कोई टिप्पणी की. नोटबंदी के कारण मध्यप्रदेश में इतने पॉवरलूम बंद हो गये. हजारों की तादाद में लोग बेरोजगार हो गये. देश में एटीएस जैसे बिल्डर्स पिछले दो महीने से मजदूरों को पैसे नहीं दे पा रहे हैं, जबकि वे गुड पे मास्टर्स हैं. इस पर भी आपने कोई टिप्पणी नहीं की. माननीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खुद माना कि नोटबंदी के कारण हमारे देश की जनता को काफी परेशानी हुई, इस पर आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. क्यों? डर गर्इं कि कहीं बीजेपी आपको घेर न ले.
सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक मधु किश्वर ने भी मीडिया की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए कहा कि पत्रकार राजनेताओं से लाभ लेते हैं, इसलिए वह तटस्थ न होकर पक्षपाती खबरें दिखाते हैं. मधु किश्वर जी यह तो आप भी जानती हैं कि किस तरह से राजनेता भी पत्रकारों का इस्तेमाल करते हैं. मधु किश्वर जी आपको मीडिया ने ही आगे बढ़ाया. आज आप मीडिया को ही कोस रही हैं. ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, दोनों हाथ से ताली बजती है. अगर पत्रकार नहीं होते, तो कुछ तथाकथित नेता देश को बेच खाते और ऐसे डकार जाते कि पता भी नहीं चलता. लोकसभा चुनाव से पहले यह वादा किया गया था कि काला धन आएगा, लेकिन नहीं आया. लोगों के खाते में डेढ़ लाख नहीं पहुंचे. अब अगर पत्रकार लिखते हैं कि नेता झूठ बोलकर, वोटरों के साथ छलकपट कर आये हैं, तो क्या यह गलत है? वकील भी अपने मुवक्किल को बचाने की कोशिश में झूठ बोलते हैं, तो क्या वह गलत नहीं है? हमेशा मीडिया पर बम क्यों फोड़ा जाता है. जब शुरू-शुरू में नोटबंदी की वास्तविक स्थिति दिखाई जा रही थी, अखबारों में वही खबरें छप रही थीं, जो सच है, तब जेटली जी ने धमकी दे दी. बस सबका मुंह चुप हो गया. संस्थान के मालिकानों को डर सताने लगा कि कहीं विज्ञापन में कटौती न कर दे, इशारों ही इशारों में संपादकों तक बात पहुंची. और जो भयानक स्थिति नोटबंदी के कारण हो गई थी, वह टीवी में ही नहीं, अखबारों में भी नहीं दिखी. रातों रात नोटबंदी की खबरें गायब हो गर्इं. तब आप क्यों नहीं आवाज उठाई? तब आपने आवाज क्यों नहीं उठाई कि जो सच है वह छापे अखबार वाले. सभी पत्रकार बिकाऊ नहीं. याद रखें, मीडिया से ही आप हैं, आप से मीडिया नहीं.
तारिक फतेह ने सही कहा था कि भारतीय मीडिया की छवि साफ है और यह दुनिया के टॉप 10 देशों में शुमार की गई है. जहां हमें छात्रों को कुछ सकारात्मक बातें बतानी चाहिए वहीं यहां पूरे पत्रकारिता जगत को भ्रष्ट बताया जा रहा है, क्या यह सही है?
ध्यान रखें कि बच्चों पर निवेश करने की सबसे अच्छी चीज है अपना समय और अच्छे संस्कार, विचार और आचार. वह संस्कार, सुविचार और सद व्यवहार वहां नहीं दिखा. मैडम जी यदि लगातार बुरे विचारों से घिरे रहेंगे, तो हम कभी भी बच्चों का सही मार्गदर्शन नहीं कर पाएंगे. दरअसल, बुरे संस्कारों से मुक्ति हमें तभी मिलती है, जब हम दूसरों का सम्मान करना सीखें. हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी होगी, जिससे कि उनका स्वाभाविक और सरल चरित्र का निर्माण हो. सद्बुद्धि का विकास हो और उन बच्चों के लिए देश गर्व महसूस करे.
रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि मानव के अंदर जो कुछ सर्वोत्तम है, उसका विकास प्रशंसा तथा प्रोत्साहन के द्वारा किया जा सकता है, अपमान करके नहीं. पत्रकारों का अपमान करके कोई फायदा नहीं है, आप पत्रकारों को सम्मान दें, आपको भी सम्मान मिलेगा. आपने ट्रकों में यह लिखा हुआ पढ़ा होगा कि सम्मान दें, सम्मान लें.
(लेखक दैनिक ‘राट्रीय उजाला’ के कार्यकारी संपादक हैं)