महात्मा गांधी की याद में

जलज वर्मा

 |  03 Feb 2017 |   166
Culttoday

30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी जब दैनिक प्रार्थना के लिए जा रहे थे तब वे गोली लगने से शहीद हो गए थे. वे भौतिक रूप से हमें छोड़ गए लेकिन उनकी शिक्षा, उनके निजी जीवन के तमाम प्रयोग, राजनीति और दर्शन आज भी भारत के और दूसरे देशों के लोगों के मस्तिष्क में ताजा हैं. दुनिया के कोने-कोने में उन्हें क्यों याद किया जाता है? उनके दर्शन का कौन सा पक्ष है जो युवाओं को आकर्षित करता है और उन्हें गांधीवादी बना देता है? उनका जीवन उन लोगों के लिए आदर्श है जो व्यक्तिगत  और प्रशासनिक स्तर पर अहिंसा का अनुसरण करना चाहते हैं. महात्मा गांधी को याद करते वक्त सबसे पहले एक दुबले – पतले व्यक्ति की छवि सामने आती है जो चश्मा लगाता है, लंगोटी पहनता है और जो लाठी के सहारे तेजी से चलता है या खामोशी से बैठ कर चरखा चलाता है. यह सादगी उनके जीवन और शिक्षा का प्रतीक है. उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था इसीलिए वे कहते थे, “विश्व को बदलने से पहले स्वयं को बदलो.” इसका अर्थ यह था कि बदलाव के बारे में बोलना और उसका सपना देखने के बजाय व्यक्ति को सबसे पहले खुद को बदलना चाहिए. उनके विचारों की एक बुनियाद अहिंसा थी.

यह विचार केवल दार्शनिक और मानसिक स्तर पर ही नहीं था, बल्कि वे रोजाना जीवन में व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर उसे व्यवहार में उतारते थे. यह कोई खोखला सिद्धांत नहीं है जिसका मनुष्य अनुसरण करे, बल्कि इसमें कीट-पतंगों और पशुओं सहित सभी प्राणियों का सम्मान निहित है. यद्यपि उन्हें एक ऐसे महान नेता के रूप में याद किया जाता है जिसने अंग्रेजी राज से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अहिंसा को राजनीतिक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया, लेकिन उन्होंने यह जरूरत महसूस की थी कि अहिंसा को आम व्यक्ति के जीवन में शामिल किया जाए ताकि परिवार और समाज से शोषण समाप्त किया जा सके. गांधी जी पहले आधुनिक शांतिवादी थे और उन्होंने शांतिवाद का प्रतिपादन किया था. इसका अर्थ युद्ध, सैन्यवाद और हिंसा का अहिंसा के माध्यम से विरोध करना होता है. इसे ‘सत्याग्रह’ के रूप में भी जाना जाता है, जो औपनिवेशिक शासन से आजादी हासिल करने का मुख्य हथियार था. उन्होंने कहा था कि इसे हासिल करने के लिए घृणा फैलाने की जगह क्षमाशीलता का अभ्यास करना चाहिए. उन्होंने कहा था, “क्षमाशीलता शक्तिशालियों का गुण होता है, कमजोर लोग कभी क्षमा नहीं कर सकते. ” इसलिए वे अपने शत्रुओं का भी सम्मान करते थे. वे शत्रुओं के अच्छे गुणों को सामने लाते थे और धीरे-धीरे शत्रुओं को प्रेरणा देकर अपने साथ ले आते थे.

यही कारण है कि जहां ब्रिटिश राज्य उनका शत्रु था वहीं कई अंग्रेज गांधी जी का समर्थन करते थे. अपने विरोधियों या अपने विचारों और व्यवहार के आलोचकों के प्रति उनके मन में कोई घृणा नहीं थी. उनके लिए बदला लेना जहर फैलाने की तरह था, उनका मानना था कि आंख के बदले आंख का अनुसरण करने से तो पूरा विश्व ही अंधा हो जाएगा.  महात्मान गांधी का जीवन सत्यआ और अहिंसा के अनुभव से भरा था जिसमें उन्हों ने लोगों और मौजूद स्थितियों से लगातार सीखा. उनका कहना है कि ऐसे जियो मानो तुम्हेंथ कल मरना है लेकिन सीखों ऐसे मानो तुम्हें  सदा जीना है. उन्होंयने अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखा और अपनी रणनीतियां में सुधार किया तथा अपने विचारों को अधिक प्रभावी बनाया. उनकी यह एक  अनोखी उपलब्धि है कि उन्हों ने 55,000 पृष्ठोंग पर अपने लेख लिखे, जिन्हेंे भारत सरकार ने संग्रह के रूप में सौ खंडों में प्रकाशित किया. हमें यह याद रखने की जरूरत है कि उन्होंखने इतना लेखन हाथ से किया क्यों्कि तब कम्यू अ  टर नहीं थे गांधी जी को स्मनरण करते हुए मौजूदा सरकार उनके विचारों को अभ्यांस में लाने का प्रयास कर रही है. स्वैच्छ  भारत अभियान के बैनर के तहत शुरू किया गया स्वंच्छमता अभियान उनके विचारों से ही प्रेरित है. इसने जनता में जागरूकता पैदा की है और धीरे-धीरे जनता अपनी पुरानी आदतों को बदल रही है तथा स्वरच्छदता की अवधारणा को दैनिक जीवन में अपना रही है, युवा पीढ़ी में सदियों पुराने खादी के कपड़े के प्रति लगाव पैदा करने पर जोर दिया जाना एक अन्ये क्षेत्र है जिसमें प्रधानमंत्री ने निजी दिलचस्पीि लेकर जनता से खादी की मदद करने की अपील की है और जनता से खादी खरीदने कर और इसे नियमित रूप से पहनने का अनुरोध किया है. जलवायु परिवर्तन और वैश्विक गर्मी के मुद्दों से निपटने के लिए गांधी जी का सादा जीवन का दर्शन कम कार्बन पद चिन्हि वाली जीवन शैली का आधार है. गांधी जी के इस पहलू को याद करते हुए केन्द्रद सरकार ने गांधी जी के जन्मजदिवस पर जलवायु परिवर्तन समझौते पर हस्ताहक्षर किये. इस प्रकार गांधी जी राष्ट्री य और अंतर्राष्ट्रीलय वि‍षय पर अपने विचारों के माध्य म से जीवित हैं. राष्ट्री य स्त र पर वन्या संसाधनों के संरक्षण के लिए अंहिसक चिपको-अप्पिको आंदोलन की शुरुआत गांधी जी के विचारों से प्रेरित था. जिसका नेतृत्वए पदम भूषण श्री सुन्दकर लाल बहुगुणा जैसे सर्वोदय नेताओं ने किया.

अंतर्राष्ट्री य स्तअर पर नेल्स्न मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद शासन की समाप्ति के लिए गांधी जी के दर्शन को अपनाया. इस प्रकार अमेरिका में मार्टिन लुथर किंग जूनियर ने अहिंसा को अपनाया  और अन्यत अनेक लोग अहिंसा के मार्ग को अपनाकर न्यांय के लिए अपने संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी पुण्य  तिथि पर उनके इन शब्दों  को याद करना उचित होगा कि जब तक मेरा विश्वा स उजाला करेगा. मुझे उम्मीशद है कि अगर मैं अकेला भी खड़ा हू तो मैं कब्र में भी जिंदा रहूंगा और वहीं से बोलता रहूंगा. यह सच्चा‍ई है कि उनके विचार पूरी दुनियां में गुंज रहे हैं और उनका पंथ आगे बढ़ रहा है. उनकी 69 जयंती पर हमें गांधी जी के विचारो को याद करने और उन्हेंन दैनिक जीवन में अपनाने की जरूरत है. केवल यही वह तरीका है जिसके द्वारा हम राष्ट्रा पिता को सच्चीं श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं.


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