क्या कभी कानून से खत्म होगी गरीबी?

श्रीराजेश

 |  31 May 2017 |   59
Culttoday

गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया. क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित. अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है.

अपने युवावस्था के दिनों में मैं इस खिसिया देने वाले लेकिन निष्ठुर कानून से अनजान था. उन दिनों तो मैं गरीबी को हल करने के तुरत-फुरत सलोने उपायों के सपने बुन लिया करता था. यह बात मेरी समझ में ही नहीं आई कि अगर गरीबी को खत्म करना इतना आसान होता तो यह काम तो सदियों पहले ही कर लिया गया होता.

सम्राट तुगलक ने चांदी को तांबे की कीमत का ही बताने वाले फरमान के साथ ऐसा ही करने की कोशिश की थी. उसे लगा कि तांबा रखने वाले गरीब उतने ही अमीर बन जाएंगे जितने कि चांदी रखने वाले अमीर. इसके विपरीत धनाढ्य कारोबारियों ने तुरत-फुरत तांबे के सिक्के जमाकर चांदी की मांग कर डाली.

जल्द ही खजाने से चांदी समाप्त हो गई, परिणाम यह हुआ कि रईस और रईस हो गए और गरीब तो पहले की ही तरह गरीब बने रहे. दरअसल तुगलक को अपने फरमान के अनपेक्षित नतीजे का आभास ही नहीं था. चांदी तुलनात्मक रूप से कम मिलती है जबकि तांबे की कोई कमी नहीं है, इस आधारभूत आर्थिक हकीकत को केवल कानून से बदल देने की सोच तुगलक की सबसे बड़ी गलती थी.

एक ऐसे राज्य की कल्पना कीजिए जहां पर आम वेतन तीस रुपए प्रति दिन और रोजगार का आम औसत 150 दिन प्रतिवर्ष हो. ऐसी परिस्थितियों में एक सामान्य श्रमिक को सालाना 4500 रुपए की आय होगी और वह गरीब बना रहेगा. अब एक परोपकारी मुख्यमंत्री की कल्पना कीजिए जो न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर दोगुना यानी कि 60 रुपए प्रतिदिन करना चाहता है और ऐसा (जो कठिन भी है) आदेश के जरिये कर भी देता है. तो क्या श्रमिक की कमाई दोगुनी हो जाएगी? अफसोस, ऐसा नहीं होगा. अगर किसी भी वस्तु (श्रम सहित) की कीमत बढ़ती है और अन्य वस्तुओं की कीमत यथावत रहती है तो महंगी होने वाली वस्तु की मांग अपने आप कम हो जाती है.

अगर आप वेतन दोगुना करते हैं तो नियोक्ता कर्मचारियों की छंटनी करके मशीनों का इस्तेमाल करने लगेगा. ज्यादा उत्पादकता वाले काम में श्रमिकों को ज्यादा वेतन मिलने लगेगा, लेकिन कई को अपनी नौकरी भी गंवाना पड़ेगी. आम श्रमिक को साल में रोजगार के 150 दिनों के औसत काम की जगह हो सकता है 70 दिन का ही काम मिले. यानी भले ही उसको मिलने वाली दिहाड़ी बढ़ गई हो लेकिन उसकी सालाना कमाई में कमी आ गई है. यह स्थिति लंबे समय तक रही तो उसकी परेशानी और भी बढ़ जाएगी. नियोक्ता ज्यादा वेतन दर वाले राज्यों से किनारा करने लगेंगे और कम वेतन दर वाले इलाकों का रूख करेंगे, जिसके दुष्परिणाम दूरगामी होंगे. यानी गरीबी दूर करने के अच्छे उद्देश्य से लागू की गई नीति वास्तविकता में इसे और गंभीर समस्या बना देगी.

अगर आपको अब भी इस बात को लेकर कोई शक है तो केरल का उदाहरण देख लीजिए. इतिहास गवाह है कि यह राज्य गरीबों और श्रमिकों के हित को लेकर बेहद आक्रामक रहा है. यहां सबसे सशक्त भू-सुधार कानून मौजूद था. इसने ग्रामीण स्तर पर श्रम संगठनों को खूब बढ़ावा दिया और यूनियनों के दबाव में रोजगार बढ़ाने के लिए कई नियम भी लागू किए, जैसे रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के खुद सामान उठाने पर प्रतिबंध.

ग्रामीण इलाकों में वेतन दर को देश में सबसे ज्यादा भी रखा गया. ऐसा गरीबी के निर्मूलन के लिए किया गया था. मगर अफसोस, अप्रत्याशित नतीजों ने सारी बात बिगाड़कर रख दी. वेतन पर खर्च बढ़ता देख किसान ने श्रमिकों की जरूरत वाली चावल जैसी खेती की बजाय कम श्रमिकों की जरूरत वाली प्लांटेशन फसलें (जैसे नारियल) उगाने में जुट गए. सारा दिमाग इस बात पर लगाया जाने लगा कि श्रमिकों का इस्तेमाल कैसे कम किया जाए. उद्योगों ने राज्य से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया.

परंपरागत तौर पर केरल में काजू और नारियल की रस्सी (कोयर) की प्रोसेसिंग में हजारों लोगों को रोजगार मिलता रहता था. धीरे-धीरे ऊंची वेतन दर के कारण फैक्टरियां और फिर रोजगार भी तमिलनाडु के खाते में चले गए, जहां वेतन दर काफी कम थी. केरल ने उत्पादों को राज्य की सीमा से बाहर ले जाने को गैरकानूनी बना दिया. आर्थिक हकीकतों का विरोध करने वाले कई कानूनों की तरह यह भी बेकार साबित हुआ. केरल से उत्पादों की तमिलनाडु को बड़े पैमाने पर स्मगलिंग होने लगी. रोजगार और फैक्टरियां केरल से बाहर चले गए.

इस स्थिति को इस बात ने और बिगाड़ दिया कि सस्ते में काम करने को तैयार तमिलनाडु के श्रमिकों का केरल में सैलाब सा आ गया. इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर और अधिक कम हो गए. जाहिर तौर पर आर्थिक बेहतरी के लिए लागू की गई नीतियां आर्थिक अवनति का कारण बन गईं. केरल के प्रतिभावान लोगों का दूसरे राज्यों को पलायन शुरू हो गया. बाद में उनका रूख रोजगार के लिए खाड़ी देशों की ओर हो गया. इसके बाद केरल की अर्थव्यवस्था बाहर से आने वाले पोस्टल ऑर्डरों पर ही निर्भर होकर रह गई. बाहर से आने वाले लगभग 15 हजार करोड़ रुपए ने गरीबी को हटा दिया. लेकिन श्रमिक समर्थक नीतियों को लागू करने वालों ने गरीबी के ऐसे हल की कल्पना तक नहीं की थी. देश में केरल सबसे ज्यादा शिक्षा दर और सबसे कम शिशु मौत दर के लिए जाना जाता है.

एक बेहतर समाज के इतने बेहतर लक्षणों के साथ केरल में तो एशियाई शेर बनने के गुण दिखाई देते हैं. अफसोस की बात है कि इसके विपरीत वह एशियाई कछुआ बनकर रह गया है. अगर आप यह जानना चाहते हैं कि क्यों केवल कानून से गरीबी नहीं भगाई जा सकती तो केरल के मामले का अध्ययन करें. कुछ पाठक यह जानना चाहेंगे कि आखिर यूरोपियन और अमेरिकियों ने कैसे वेतन में बढ़ोतरी के बाद भी उसके नकारात्मक परिणाम नहीं देखे? इसका जवाब बढ़ती उत्पादकता में छिपा है. अगर श्रमिक की उत्पादकता बढ़ती है तो नियोक्ता को भी उसे ज्यादा वेतन देने में कोई परहेज नहीं होगा और वह किसी भी चुनौती के लिए तैयार रहेगा. इसलिए गरीबी को कम करने का हल उत्पादकता बढ़ाने में छिपा है. यह वेतन को अपने-आप अच्छे स्तर तक पहुंचा देगा. कानून नहीं.

- टाइम्स ऑफ इंडिया में 8 जून 2003 को प्रकाशित


RECENT NEWS

आज से ट्रंप राज
श्रीराजेश |  20 Jan 2025  |  39
चले गए मन-मोहन
दीपक कुमार |  08 Jan 2025  |  33
क्या ट्रंप भारत-रूस की मित्रता को तोड़ सकते हैं?
आर्यमान निज्हावन, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के शोधकर्ता और विश्लेषक |  27 Dec 2024  |  37
एक देश एक चुनाव : ज़रूरत या महज़ एक जुमला
पंडित पीके तिवारी |  27 Nov 2020  |  237
नारी तुम केवल श्रद्धा हो.. क्यों?
लालजी जायसवाल |  22 Oct 2020  |  252
इस साल दावा ज्यादा और दवा कम
संजय श्रीवास्तव |  03 Jan 2020  |  135
भारती जी यानी गुरुकुल परंपरा का अनुशासन
टिल्लन रिछारिया |  01 Oct 2018  |  295
नफ़ासत पसंद शरद जोशी
टिल्लन रिछारिया |  01 Oct 2018  |  167
खबर पत्रकार से मिले ये ज़रूरी तो नहीं
संजय श्रीवास्तव |  01 Oct 2018  |  40
क्या कभी कानून से खत्म होगी गरीबी?
स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर |  31 May 2017  |  59
महात्मा गांधी की याद में
पांडुरंग हेगड़े |  03 Feb 2017  |  166
To contribute an article to CULT CURRENT or enquire about us, please write to cultcurrent@gmail.com . If you want to comment on an article, please post your comment on the relevant story page.
All content © Cult Current, unless otherwise noted or attributed. CULT CURRENT is published by the URJAS MEDIA VENTURE, this is registered under UDHYOG AADHAR-UDYAM-WB-14-0119166 (Govt. of India)