केंद्रीय बजट 2026-27-उजला भविष्य, धुंधला वर्तमान

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   8
Culttoday

1 फरवरी, 2026 की उस धुंधली सुबह, जब दिल्ली की फिजाओं में वसंत की आहट और कूटनीति की गर्माहट एक साथ घुल रही थी, संसद की देहरी पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कदमों की धमक ने केवल एक वित्तीय बहीखाता ही नहीं खोला, बल्कि राष्ट्र की नियति का एक नया महाकाव्य लिखना शुरू किया। यह बजट दस्तावेज़ केवल सरकारी तिजोरी के नफ़े-नुकसान का लेखा-जोखा नहीं था, बल्कि एक ऐसा वैचारिक कुरुक्षेत्र बनकर उभरा जहां 'रणनीतिक महत्त्वाकांक्षा' और 'जमीनी यथार्थ' की तलवारें आपस में टकरा रही थीं।
महज कुछ दिन पहले, 27 जनवरी को यूरोपीय संघ के साथ हुई 'मदर ऑफ ऑल डील्स' की गूंज ने जिस भारत को वैश्विक आर्थिक रंगमंच के जाज्वल्यमान नायक के रूप में प्रतिष्ठित किया था, 1 फरवरी के बजटीय यथार्थ और दलाल स्ट्रीट के लाल निशान (बाज़ार की गिरावट) ने उसी भव्य उत्सव पर संशय और चिंताओं का एक घना कोहरा फैला दिया। यह बजट एक ऐसा 'हाइब्रिड महायंत्र' प्रतीत होता है, जिसकी धमनियों में चीन जैसी रफ्तार, दक्षिण कोरिया जैसी तकनीक और अमेरिका जैसी डिजिटल मेधा का रक्त तो प्रवाहित हो रहा है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा और समावेशिता के मोर्चे पर इसके होंठों पर स्कैंडिनेवियाई देशों जैसी कोई स्पष्ट मुस्कान नहीं है। यह 'राष्ट्र की स्वर्ण-मुकुट वाली अमीरी' और 'नागरिक की नंगे पैर वाली समृद्धि' के बीच के उस अंतहीन फासले की पड़ताल करता है, जहां अर्थव्यवस्था का इस्पाती इंजन तो गगनभेदी गर्जना कर रहा है, लेकिन उस पर सवार आम आदमी के लिए सुरक्षा का 'कुशन' आज भी तार-तार और अधूरा है।
बाज़ार का रक्तपात: एक कड़वा यथार्थ और तात्कालिक विक्षोभ
बजट के प्रस्तुत होते ही दलाल स्ट्रीट का जो दृश्य उभरा, वह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। सेंसेक्स का का गिरना और निफ्टी का नीचे की ओर फिसलना केवल एक तकनीकी गिरावट नहीं थी; यह निवेशकों की उस अनिश्चितता और जोखिम-संवेदनशीलता का प्रतिबिंब था जिसे 'इंडिया वीआईएक्स'  के उछाल ने प्रमाणित किया। पिछले छह वर्षों में बजट-डे पर यह सबसे नकारात्मक प्रतिक्रिया थी। इस रक्तपात के पीछे 'डेरिवेटिव्स' पर प्रतिभूति लेनदेन कर में की गई वृद्धि एक बड़ा कारक रही, जिसने ट्रेडिंग की लागत बढ़ाकर बाज़ार की तरलता पर प्रहार किया।
लेकिन क्या यह गिरावट केवल कर नीति की प्रतिक्रिया थी? गहराई से देखें तो यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के उस निरंतर पलायन का परिणाम था, जिसने 2025 से अब तक लगभग 23 अरब डॉलर का बाह्य प्रवाह देखा है। बाज़ार को उम्मीद थी कि सरकार विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए किसी 'क्रांतिकारी प्रोत्साहन' की घोषणा करेगी, परंतु बजट के 'टैक्टिकल' या व्यावहारिक दृष्टिकोण ने उस उम्मीद को धराशायी कर दिया। बैंकिंग, रक्षा और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयरों में आई गिरावट यह संकेत देती है कि निवेशक अभी भी 'दीर्घकालिक वादों' और 'तात्कालिक लाभ' के बीच के संतुलन को लेकर आशंकित हैं। यद्यपि पर्यटन, आतिथ्य और वस्त्र उद्योग जैसे क्षेत्रों में सुधार की किरणें दिखीं, लेकिन समग्र बाज़ार ने इसे 'भविष्योन्मुखी पर वर्तमान के लिए कठोर' दस्तावेज़ के रूप में ही पचाया।
वैश्विक प्रतिमानों का कोलाज: भारत किस दिशा में?
यदि हम केंद्रीय बजट 2026-27 के वैचारिक मानचित्र को वैश्विक परिप्रेक्ष्य के फलक पर रखकर देखें, तो यह किसी एक राष्ट्र की यांत्रिक नकल मात्र नहीं, बल्कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विकास-दर्शनों का एक अनूठा और जटिल 'कोलाज' प्रतीत होता है। इस बजटीय रूपरेखा में चीन के उस महाकाय 'बुनियादी ढांचा-आधारित विकास मॉडल' का स्पष्ट अक्स झलकता है, जहां बारह लाख बीस हजार करोड़ रुपये के विशाल पूंजीगत व्यय, अंतहीन माल ढुलाई गलियारों और रणनीतिक औद्योगिक गलियारों के माध्यम से भारत अपनी आर्थिक धमनियों को एक वैश्विक महाशक्ति बनने के लिए तैयार कर रहा है; हालांकि यहां बुनियादी अंतर यह है कि भारत इस लक्ष्य को निजी निवेश की संजीवनी से हासिल करने की चेष्टा कर रहा है, जबकि चीन ने इसे राज्य के पूर्ण नियंत्रण की लोहे की मुट्ठी से प्राप्त किया था।
इसी वैचारिक बुनावट में दक्षिण कोरिया की वह 'उच्च-तकनीकी छलांग' भी गहराई से समाहित है, जहां 'सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' और 'जैव-भेषज शक्ति' जैसे महत्त्वाकांक्षी प्रावधान भारत को एक पारंपरिक अर्थव्यवस्था से ऊपर उठाकर उस 'टेक-पावर' में रूपांतरित करने का स्वप्न देखते हैं, जिसने कभी कोरिया को विश्व पटल पर स्थापित किया था। इसके साथ ही, 'भारत-विस्तार' जैसी कृत्रिम मेधा आधारित कृषि पद्धतियां और डेटा केंद्रों को मिलने वाला दीर्घकालिक कर अवकाश सीधे तौर पर अमेरिका के उस 'नवाचार-प्रेरित मॉडल' का अनुसरण करता है, जिसने डिजिटल सेवाओं और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था को आधुनिक युग की नई मुद्रा बना दिया है।
परंतु, विकास के इन कठोर और जाज्वल्यमान इंजनों को अपनाते समय भारत ने उन राष्ट्रों के उस 'सॉफ्ट कुशन' या मानवीय सुरक्षा जाल को कहीं पीछे छोड़ दिया है, जिन्होंने अपनी औद्योगिक समृद्धि के साथ-साथ अपनी जड़ों को भी सींचा था। दक्षिण कोरिया ने जहां अपनी तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सार्वभौमिक शिक्षा की नींव को अभेद्य बनाया और अमेरिका ने अपने नवाचार के साथ मज़बूत बेरोज़गारी भत्ते और स्वास्थ्य सुरक्षा के तंत्र को जोड़ा, वहीं भारत ने एक 'ग्रोथ स्टेट' के वैभव और रफ्तार को तो अंगीकार कर लिया है, लेकिन वह 'वेलफेयर स्टेट' की उस स्कैंडिनेवियाई मानवीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और समावेशिता की छांव से अभी भी मीलों दूर खड़ा दिखाई देता है। यह विसंगति संकेत देती है कि भारत ने भविष्य की मशीनों को तो बुद्धि दे दी है, लेकिन वर्तमान के मनुष्य को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा के तंतु आज भी बेहद महीन और अनिश्चित बने हुए हैं।
रक्षा और तकनीक का द्वंद्व
रक्षा क्षेत्र में खर्च की वृद्धि और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना भारत को एक 'डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब' बनाने की दिशा में रणनीतिक संप्रभुता का उपकरण तो है, लेकिन इसका आर्थिक प्रभाव विरोधाभासी है। यह 'राष्ट्रीय सुरक्षा केंद्रित विकास' है, न कि जन-आधारित आर्थिक राहत। रक्षा जैसे 'हाई-टेक' क्षेत्रों में निवेश से रणनीतिक बढ़त तो मिलती है, लेकिन रोज़गार सृजन की दर धीमी रहती है।
यही विरोधाभास तकनीक और एआई (AI) के मोर्चे पर भी दिखता है। 'हाई-प्रोडक्टिविटी मॉडल' के रूप में एआई भारत को वैश्विक सेवा महाशक्ति तो बना सकता है, लेकिन यह 'डिजिटल डिवाइड' को और गहरा करने का जोखिम भी पैदा करता है। जब विकास केवल 'हाई-स्किल' युवाओं और 'टेक-सेक्टर' तक सीमित हो जाता है, तो वह 'एलीट स्किल ग्रोथ मॉडल' बन जाता है, जिससे व्यापक मानव पूंजी का सुधार पीछे छूट जाता है।
बाज़ार के हवाले 'अन्नदाता'
कृषि क्षेत्र में बजट का दर्शन अब 'सब्सिडी मॉडल' से हटकर 'एग्री-एंटरप्राइज मॉडल' की ओर बढ़ गया है। 'भारत-विस्तार' और 'वैल्यू चेन' पर ज़ोर देना कृषि को एक बिज़नेस सेक्टर बनाने की कोशिश है। तकनीकी दृष्टि से यह जाज्वल्यमान तो है, लेकिन 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' (एमएसपी) और मूल्य सुरक्षा पर स्पष्ट नीति का अभाव छोटे किसानों को बाज़ार की अनिश्चितताओं के बीच 'जोखिम' में डाल देता है। यह कृषि को 'सुरक्षा सेक्टर' से हटाकर 'बिजनेस सेक्टर' बनाने की ओर एक निर्णायक कदम है, जिसके सामाजिक परिणाम अनिश्चित हो सकते हैं।
सेवा उद्योग बनाम सामाजिक अधिकार
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बजट की प्राथमिकताएं 'ऊपर से नीचे' की ओर हैं। यूनिवर्सिटी टाउनशिप और स्टेम संस्थानों में गर्ल्स हॉस्टल जैसे प्रावधान उच्च शिक्षा को उद्योग से जोड़ने के लिए सराहनीय हैं, लेकिन प्राथमिक शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और ग्रामीण स्कूलों की उपेक्षा यह दर्शाती है कि हमारा ध्यान 'व्यापक मानव पूंजी' के बजाय 'विशिष्ट कार्यबल' तैयार करने पर अधिक है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी 'ट्रॉमा सेंटर' और 'मेडिकल टूरिज्म हब' की स्थापना स्वास्थ्य को एक 'सेवा उद्योग' की तरह देखती है, न कि एक 'सामाजिक अधिकार' की तरह। आम नागरिक के लिए इलाज की लागत कम करने या प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने पर बजट का मौन यह संकेत देता है कि सरकार का ध्यान 'ग्लोबल हेल्थ इंडस्ट्री' से कमाई पर अधिक है।
हाशिए पर खड़ा बहुमत
इस पूरे 'ग्रैंड नैरेटिव' में जो वर्ग सबसे अधिक उपेक्षित महसूस करता है, वह है भारत की अस्सी प्रतिशत श्रमशक्ति वाला 'असंगठित क्षेत्र'। सामाजिक सुरक्षा कवच का अभाव, पेंशन में वृद्धि की कमी और महंगाई राहत का न होना इस वर्ग के लिए विकास के फल को कड़वा बना देता है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी बजट में कोई ठोस राहत नहीं है, जो यह दर्शाता है कि 'ग्रोथ-ओरिएंटेड' नीतियों में अनुत्पादक माने जाने वाले वर्गों के लिए स्थान संकुचित होता जा रहा है।
'ट्रिकल-डाउन' की परीक्षा और भविष्य का कोहरा
केंद्रीय बजट 2026-27 एक महत्त्वाकांक्षी, भविष्योन्मुखी और साहसी दस्तावेज़ है, जो भारत को एक आधुनिक और प्रतिस्पर्धी शक्ति बनाने के लिए 'हार्ड इंजन' (बुनियादी ढांचा और तकनीक) पर दांव लगाता है। सरकार का अटल विश्वास है कि "पहले राष्ट्र अमीर बनेगा, फिर नागरिक समृद्ध होंगे।" यह 'ट्रिकल-डाउन' प्रभाव की उस थ्योरी पर आधारित है जिसकी सफलता भारत जैसे असमान समाज में हमेशा संदेह के घेरे में रही है।
बाज़ार की तात्कालिक गिरावट शायद एक भावनात्मक प्रतिक्रिया हो, लेकिन इसके पीछे छिपे आर्थिक प्रश्न स्थायी हैं। क्या रोज़गार संकट केवल इंफ्रास्ट्रक्चर से हल होगा? क्या तकनीक आधारित विकास सामाजिक असमानता को कम करेगा? और क्या राज्यों के साथ वित्तीय तालमेल बना रहेगा?
'विकसित भारत' का मार्ग केवल इस्पात के ढांचों और एआई एल्गोरिदम से होकर नहीं गुज़रता। इसके लिए एक 'सॉफ्ट कुशन'—यानी मज़बूत सामाजिक सुरक्षा, आय की समानता और प्राथमिक शिक्षा-स्वास्थ्य—अनिवार्य है। 2026-27 का यह बजट भारत को एक 'आर्थिक महाशक्ति' बनाने की नींव तो रखता है, लेकिन एक 'समृद्ध नागरिक' बनाने की दिशा में अभी भी कई पन्ने अनलिखे छोड़ देता है। आने वाला समय यह तय करेगा कि क्या यह 'मध्याह्न सूर्य' सबको रोशनी देगा या केवल उन ऊंचाइयों को चमकाएगा जहां तक आम आदमी के हाथ नहीं पहुँचते। कूटनीति के 'उत्तरायण' में उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने जिस उजाले की बात की थी, वह तभी सार्थक होगा जब वह दिल्ली के डेटा सेंटरों से निकलकर पश्चिम बंगाल के जूट मिलों और विदर्भ के कपास के खेतों तक पहुंचेगा। 
 


Browse By Tags

RECENT NEWS

भारत: वैश्विक मेडिकल टूरिज्म का नया हब
जलज श्रीवास्तव |  01 May 2025  |  278
‘ठंड हो या दंड, लेकर रहेंगे अधिकार’
कल्ट करंट डेस्क |  27 Nov 2020  |  729
To contribute an article to CULT CURRENT or enquire about us, please write to cultcurrent@gmail.com . If you want to comment on an article, please post your comment on the relevant story page.
All content © Cult Current, unless otherwise noted or attributed. CULT CURRENT is published by the URJAS MEDIA VENTURE, this is registered under UDHYOG AADHAR-UDYAM-WB-14-0119166 (Govt. of India)