वर्चस्व का तिमिर बनाम साझेदारी का सूर्य
संदीप कुमार
| 02 Feb 2026 |
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काल के भाल पर अंकित नियति की रेखाएं जब अपना मार्ग बदलती हैं, तो परिवर्तन की वह पदचाप किसी सामान्य आहट की भांति नहीं, बल्कि एक महासांस्कृतिक विप्लव की भांति सुनाई देती है। इक्कीसवीं सदी का यह तृतीय दशक वैश्विक विस्थापन का वह कालखंड है, जहां पुरातन विश्व-व्यवस्था की जर्जर अट्टालिकाएं अपने ही भार से ध्वस्त हो रही हैं। यह वह संधिकाल है जहां द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात गढ़ी गई 'नियम-आधारित मर्यादाएं' अब केवल स्मृतियों का अवशेष मात्र रह गई हैं। इस वैचारिक शून्य और राजनीतिक अंधड़ के बीच, एक ओर 'नव-उपनिवेशवाद 2.0' की वह विषाक्त बेली है जो प्रभुत्व के नए प्रतिमान गढ़ रही है, तो दूसरी ओर भारत-यूरोपीय संघ के मध्य अंकुरित होता वह विश्वास है, जो संरक्षणवाद के तिमिर में संतुलन और प्रज्ञा का प्रकाश-पुंज बनकर उभरा है।
यह द्वंद्व केवल नीतियों का नहीं है, अपितु वैश्विक आत्मा के दो ध्रुवों का है—एक जो शक्ति के उन्माद में 'स्व' की श्रेष्ठता खोजता है और दूसरा जो साझेदारी के 'उत्तरायण' में लोक-मंगल का मार्ग। अमेरिकी राजनीति के धरातल पर डोनाल्ड ट्रंप का प्रादुर्भाव उस साम्राज्यवादी व्याकरण की आधुनिक पुनरावृत्ति है, जहां 'सहमति' का स्थान 'दबाव' ने ले लिया है। ग्रीनलैंड के अधिग्रहण की सुगबुगाहट हो या अंतरराष्ट्रीय संधियों का तिरस्कार, ट्रंप का 'ट्रांजैक्शनल' दर्शन स्पष्ट उद्घोष करता है कि नियम केवल तभी तक वंदनीय हैं, जब तक वे अमेरिकी महात्वाकांक्षाओं की दासी बने रहें। यह वही औपनिवेशिक चेतना है, जिसने उन्नीसवीं सदी में तोपों और लड़ाकू जहाजों के माध्यम से विश्व का दलन किया था, किंतु आज उसने स्वयं को प्रतिबंधों, आपूर्ति शृंखलाओं, डेटा संप्रभुता और तकनीक के सूक्ष्म आवरण में आवृत कर लिया है।
इसे ही 'नव-उपनिवेशवाद 2.0' की संज्ञा दी जा सकती है—जहां संप्रभुता का हनन भूमि हड़पने के लिए नहीं, अपितु वैश्विक 'निर्भरता' के नए भूगोल निर्मित करने के लिए किया जाता है। अब उपनिवेश मानचित्रों पर नहीं उकेरे जाते, बल्कि वे डेटा की सूक्ष्म तरंगों, एल्गोरिदम के मायाजाल, सेमीकंडक्टर चिप्स की कड़ियों और वित्तीय बाज़ारों की अदृश्य बेड़ियों में निर्मित हो रहे हैं। इस अराजक यथार्थ ने उस उदारवादी धारणा को ध्वस्त कर दिया है कि वैश्विक व्यवस्था केवल नैतिकता से संचालित हो सकती है। परिणामतः, यूरोप जैसा समृद्ध भू-भाग, जो दशकों तक अटलांटिक सुरक्षा की शीतल छांव में निश्चिंत था, आज स्वयं को एक दारुण अस्तित्वगत शून्य में पा रहा है। उसे यह मर्मभेदी बोध हो चुका है कि सुरक्षा का वह कवच, जिसे वह अपनी नियति मानता था, अब उसकी अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' के लिए एक बोझिल शृंखला बन चुका है।
इसी वैश्विक भंवर के बीच भारत-यूरोपीय संघ के मध्य हुआ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) एक व्यापारिक संविदा मात्र नहीं, बल्कि एक नवीन विश्व-दृष्टि का दार्शनिक घोषणापत्र है। जब संपूर्ण विश्व संकीर्णता, गुटबंदी और अविश्वास के 'दक्षिणायन' में विलीन हो रहा था, तब नई दिल्ली और ब्रुसेल्स ने प्रज्ञा के 'उत्तरायण' की दिशा चुनी। भारतीय वांग्मय में उत्तरायण वह पवित्र कालखंड है जो अंधकार के समापन और चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है। यह समझौता उस बहुध्रुवीय व्यवस्था की आधारशिला है जहां वाशिंगटन और बीजिंग की द्विध्रुवीय चक्की के बीच एक 'संतुलित तृतीय ध्रुव' का उदय अनिवार्य हो गया है। भारत यूरोप के लिए अब केवल एक विशाल उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक संप्रभुता का गौरवमयी सहयात्री है। इसी प्रकार, यूरोप भारत के लिए केवल निवेशक नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और तकनीकी मानकों का सह-साधक है।
यह साझेदारी प्रमाणित करती है कि वैश्वीकरण का समाधान 'डी-ग्लोबलाइजेशन' नहीं, 'री-ग्लोबलाइजेशन' है—जहां वैश्विक संबंधों का आधार शोषण पर नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता और साझी गरिमा पर आधारित हो।
दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ट्रंप की नीतियां इतिहास के उस प्रतिगामी प्रवाह का प्रतिनिधित्व करती हैं जो सभ्यता को पुनः 'जंगल के कानून' की ओर ढकेलना चाहती है, जहां केवल शक्ति ही अधिकार का मापदंड थी। वहीं, भारत-ईयू की यह संविदा उस भविष्योन्मुखी विवेक का परिचायक है जो साझी समृद्धि में ही विश्व की स्थिरता देखती है। एक ओर अहंकार का प्रलयंकारी नृत्य है, तो दूसरी ओर सामंजस्य का सृजन।
इतिहास की वीथिकाएं साक्षी हैं कि भय और लोभ पर निर्मित साम्राज्य समय की एक ही करवट में रेत के घरोंदों की भांति ढह जाते हैं, जबकि साझा मूल्यों की खाद से सींचे गए संबंध युगों तक अपनी सुवास बिखेरते हैं। आज जब नव-उपनिवेशवाद की जंजीरें एक बार फिर मानवता की आत्मा को जकड़ने का कुत्सित प्रयास कर रही हैं, तब भारत-यूरोप की यह साझेदारी उन बेड़ियों को पिघला देने वाला एक प्रखर वैचारिक ताप है। यही वह महान संकल्प है जिसे हमें सूचनाओं के इस कोलाहलपूर्ण बाज़ार में सुरक्षित रखना है। क्योंकि जिस राष्ट्र और जिस सभ्यता का वैचारिक धरातल मृतप्राय हो जाता है, वह अपनी स्वाधीनता की रक्षा कभी नहीं कर पाता।