ट्रंप का अमेरिकाः सुपर पावर से सुपर रिस्क

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   13
Culttoday

डोनाल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिका अब वह देश नहीं रहा जो दुनिया को स्थिरता, नियम और दिशा देता था। वह एक ऐसे शक्ति-केंद्र में बदलता जा रहा है जो अनिश्चितता, भय और जोखिम का निर्यात करता है। यह कोई वैचारिक आरोप नहीं, बल्कि आज का वैश्विक अनुभव है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा अस्थिर तत्व अब कोई विद्रोही राष्ट्र नहीं, बल्कि स्वयं अमेरिका—और उसका नेतृत्व—बन चुका है।
डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका की पहचान एक सिस्टम मेकर से बदलकर सिस्टम ब्रेकर की हो गई है। जिन वैश्विक संस्थाओं के सहारे उसने दशकों तक नैतिक नेतृत्व का दावा किया—संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और नाटो—आज वही संस्थाएँ उसे बोझ लगती हैं। नियम अब साझा अनुशासन नहीं, बल्कि दूसरों पर थोपे जाने वाले औज़ार हैं; और जब वही नियम अमेरिका पर लागू होने की बात आती है, तो वे 'अवरोध' घोषित कर दिए जाते हैं।
ट्रंप के अमेरिका में कूटनीति का अर्थ संवाद नहीं, बल्कि धमकी का प्रबंधन है। मित्र देशों को सुरक्षा की गारंटी नहीं, बल्कि बिल थमाया जाता है। सहयोग नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सौदेबाज़ी बन चुका है। यही कारण है कि आज यूरोप आशंकित है, एशिया असहज है और ग्लोबल साउथ अविश्वासी। पूरी दुनिया एक ऐसे नेतृत्व से जूझ रही है जो स्थिरता पैदा नहीं करता, बल्कि संकटों को सामान्य बना देता है।
अमेरिका अब युद्ध रोकने वाली शक्ति नहीं, बल्कि टकराव को नॉर्मलाइज़ करने वाला देश बनता जा रहा है। टैरिफ, प्रतिबंध, सैन्य संकेत और आक्रामक बयानबाज़ी—ये सब उस राजनीति के औज़ार हैं जो दुनिया को संतुलन नहीं, बल्कि लगातार तनाव की अवस्था में रखना चाहती है। यहीं 'सुपर पावर' की छवि टूटती है और 'सुपर रिस्क' का चेहरा सामने आता है।
इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न अनिवार्य है—क्या दुनिया किसी वैकल्पिक दिशा की तलाश कर सकती है? और यदि हाँ, तो वह दिशा कौन दे सकता है?
यहीं से भारत का प्रश्न केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक महत्व का बन जाता है। भारत आज किसी साम्राज्यवादी दावे के साथ खड़ा नहीं है। वह न अमेरिकी वर्चस्व का पिछलग्गू है, न किसी नए ध्रुव का आक्रामक दावेदार। उसकी सबसे बड़ी शक्ति है—रणनीतिक संयम।
जहाँ ट्रंप का अमेरिका संस्थाओं को तोड़ने और नियमों को हथियार बनाने में विश्वास करता है, वहीं भारत उन्हें सुधारने, लोकतांत्रिक बनाने और बहुध्रुवीय करने की बात करता है। जहाँ अमेरिका धमकी देता है, भारत संवाद करता है। जहाँ अमेरिका गुट बनाता है, भारत पुल बनाता है। और जहाँ अमेरिका अनिश्चितता फैलाता है, भारत पूर्वानुमेयता देता है।
भारत की विदेश नीति की धुरी स्पष्ट है—रणनीतिक स्वायत्तता। यह न निष्क्रिय गुटनिरपेक्षता है, न अवसरवादी संतुलन। रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या पश्चिम एशिया का संकट, भारत ने दिखाया है कि राष्ट्रीय हित और वैश्विक नैतिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि संतुलन के सहयात्री हो सकते हैं।
डिजिटल क्षेत्र में भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल—न डेटा का निजी एकाधिकार, न सर्वग्रासी निगरानी—बल्कि नागरिक-केंद्रित डिजिटल संप्रभुता पर आधारित है। इसलिए आज ग्लोबल साउथ भारत को केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक मॉडल के रूप में देख रहा है।
इसलिए प्रश्न 'माइनस अमेरिका' का नहीं, बल्कि माइनस अमेरिकी एकाधिकार का है। आज यदि अमेरिका 'सुपर रिस्क' है, तो भारत उस जोखिम के बीच संतुलन की संभावना है। इतिहास शायद यही देख रहा है—कौन अराजकता को बढ़ाता है, और कौन उसे दिशा देता है। 
 


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