हार्मूज में हहाकार

मनोज कुमार

 |  02 Apr 2026 |   5
Culttoday

दक्षिण एशिया के क्षितिज पर भू-राजनीति की काली छाया इस कदर घनीभूत हो गई है कि वह भारत की आर्थिक धमनियों को जमने पर मजबूर कर रही है। हॉर्मूज जलडमरूमध्य—विश्व की अर्थव्यवस्था की मुख्य 'महाधमनी'—आज बारूद के ढेर पर खड़ा है। इससे होकर गुजरने वाला हर टैंकर वैश्विक बाजार का रक्तचाप तय करता है। ईरान द्वारा इस संकरे मार्ग पर अपनी पकड़ को जिस तरह कसा गया है, वह किसी भी क्षण वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को 'हृदयाघात' दे सकता है। भले ही कुछ मित्र देशों को फिलहाल सीमित राहत के संकेत मिले हों, लेकिन यह बोतल में कैद अग्नि से धधकते टैंकर दुनिया के लिए कहीं अधिक विनाशकारी है।
भारत अपनी कच्चे तेल की भूख का 85 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, जिसमें पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी निर्णायक है। हॉर्मूज में उठने वाली कोई भी लहर भारत के तटों पर सुनामी बनकर टकराती है। तेल की कीमतों में हर उछाल केवल बाजार की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस ‘जोखिम प्रीमियम’ का प्रतिबिंब है, जिसका भार अंततः भारतीय उपभोक्ता उठाता है। जैसे ही वैश्विक पटल पर अनिश्चितता बढ़ती है, भारत का चालू खाता घाटा, मुद्रा का अवमूल्यन और महंगाई का दानव अर्थव्यवस्था को जकड़ने लगते हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई आपातकालीन बैठक इस यथार्थ का स्वीकारोक्ति पत्र है कि ऊर्जा संकट अब केवल विदेश मंत्रालय की फाइलों का विषय नहीं रहा - यह आंतरिक आर्थिक स्थिरता का सबसे बड़ा शत्रु बन चुका है। आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण, रणनीतिक तेल भंडारों का शंखनाद और वैकल्पिक मार्गों की खोज अब कोई नीतिगत विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा का अनिवार्य अध्याय है।
विश्लेषकों की दृष्टि में, यह समस्या मात्र तेल की उपलब्धता की नहीं है, बल्कि उस अदृश्य 'बीमा लागत' की है, जो संकट के साथ जुड़ी है। जब किसी समुद्री मार्ग को ‘उच्च जोखिम क्षेत्र’ घोषित किया जाता है, तो जहाजों के बीमा प्रीमियम में लगी आग शिपिंग कंपनियों को उस रास्ते से दूर धकेल देती है। इससे तेल की आपूर्ति न केवल महंगी हो जाती है, बल्कि समय की पाबंदी भी छिन्न-भिन्न हो जाती है। समय पर न पहुंचता हुआ ईंधन, पहुंच चुके ईंधन से भी अधिक घातक सिद्ध होता है।
ईरान द्वारा भारत जैसे देशों को दी गई छूट एक कूटनीतिक संकेत तो है, लेकिन यह रेत पर लिखी इबारत जैसा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच की यह युद्ध यदि किसी ‘बड़े युद्ध’ में परिणत हुई, तो यह छूट कब राख हो जाएगी, कहना कठिन है। संघर्ष का विस्तार पूरे क्षेत्र को एक ऐसे ज्वालामुखी में बदल देगा जिसके लावे से न केवल अर्थव्यवस्थाएं, बल्कि पूरी भू-राजनीतिक संरचना झुलस जाएगी।
भारत के लिए यह संकट केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं रहने वाला। परिवहन लागत का बढ़ना, खाद्य आपूर्ति का बाधित होना, उर्वरक उत्पादन का ठप पड़ना और औद्योगिक धड़कों का धीमा होना—ये सब इस संकट की अंतहीन कड़ियां हैं। रसोई गैस की उपलब्धता में आई कमी सीधे तौर पर सामाजिक असंतोष की चिंगारी बन सकती है।
ऐसे में भारत के पास तीन स्पष्ट विकल्प हैं। पहला, आपूर्ति स्रोतों का त्वरित विविधीकरण—जहां अफ्रीका, अमेरिका और रूस जैसे विकल्पों को अब महज कागजी न रखकर हकीकत में बदलना होगा। दूसरा, अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों का विवेकपूर्ण उपयोग, ताकि वैश्विक झटकों को सहने के लिए हमारे पास एक मजबूत 'बफर' हो। और तीसरा, नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधनों की ओर एक तीव्र संक्रमण। अब वह समय लद चुका है, जब हम केवल अगले महीने की कीमतों पर नजर रखकर अपनी नीति तय कर सकते थे।
निष्कर्षतः, हॉर्मूज का यह संकट महज एक क्षेत्रीय टकराव नहीं है, बल्कि उस वैश्विक ऊर्जा तंत्र की नाजुकता का संकेत है, जिस पर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएं टिकी हैं। यह समय प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संतुलन का है। ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में रखकर हमें वे कड़े और दूरगामी निर्णय लेने होंगे, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'ऊर्जा-सुरक्षित' राष्ट्र की नींव रखें। अन्यथा, इतिहास हमें ऐसे दौर के रूप में याद रखेगा, जहां हमने अपनी प्रगति को एक जलडमरूमध्य के बहते हुए तेल पर गिरवी रख दिया था। हमें ऊर्जा की आत्मनिर्भरता को केवल एक सरकारी नारा नहीं, अपना सबसे बड़ा सामरिक लक्ष्य बनाना होगा।
 


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