वैश्विक पटल पर भारतीय रुपये का 'महा-उत्तरायण'

संतु दास

 |  14 Jul 2026 |   22
Culttoday

इतिहास के रंगमंच पर जब आर्थिक साम्राज्यवाद की पटकथा लिखी जाती है, तो उसकी स्याही अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व से तैयार होती है। द्वितीय विश्व युद्ध के मलबे से उपजी 'ब्रेटन वुड्स' व्यवस्था ने दुनिया को एक ऐसे वित्तीय नव-उपनिवेशवाद की बेड़ियों में जकड़ दिया था, जहां वाशिंगटन की एक धड़कन से विकासशील राष्ट्रों की सांसें थम जाती थीं। इस परिप्रेक्ष्य में, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा का हालिया वक्तव्य केवल एक मौद्रिक नीति का बयान नहीं, बल्कि डॉलर की उस वैश्विक तानाशाही के विरुद्ध एक साहसिक वैचारिक शंखनाद अवश्य है। किंतु, इस शंखनाद के उत्साह में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी मुद्रा की वैश्विक स्वीकार्यता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उस अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक सुदृढ़ता से तय होती है। क्या भारतीय रुपया वास्तव में डॉलर के उस विराट साम्राज्य को प्रतिस्थापित करने के लिए संस्थागत रूप से तैयार है, या यह केवल एक समयपूर्व भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा है?

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इस रणनीतिक महा-परिवर्तन की विभीषिका और महत्ता को समझने के लिए हमें उस 'असमित वित्तीय युद्ध' को देखना होगा, जहां मुद्राएं भू-राजनीतिक संप्रभुता का अस्त्र बन चुकी हैं। जब भी मध्य-पूर्व में मिसाइलें आसमान का सीना चीरती हैं, तो उसका सीधा प्रहार भारत के मध्यमवर्गीय चूल्हों पर होता है। तेल की कीमतों का अनियंत्रित उछाल और डॉलर का कृत्रिम अवमूल्यन भारतीय अर्थव्यवस्था को एक ऐसे 'ब्लैक होल' की ओर धकेलता रहा है, जहां से वापसी का मार्ग ऋण से होकर गुजरता था। रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण इस 'आर्थिक भस्मासुर' की काट के रूप में प्रस्तुत तो किया जा रहा है, परंतु यह विडंबना ही है कि आज भी भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए उसी वैश्विक बाजार पर निर्भर है जो डॉलर से संचालित होता है। प्रतिबंधों को दरकिनार कर वैकल्पिक मार्ग खोजना एक अल्पकालिक राहत तो हो सकता है, लेकिन रुपये की तरलता और वैश्विक स्वीकार्यता का अभाव इसे एक दीर्घकालिक और टिकाऊ विकल्प बनने की राह में सबसे बड़ा अवरोधक है।

रूस को स्विफ्ट वित्तीय संदेश प्रणाली से निष्कासित किए जाने के बाद भारत और रूस द्वारा बुना गया वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का ताना-बाना पश्चिमी अहंकार पर एक चोट अवश्य प्रतीत होता है। जब अफ्रीका से लेकर यूरेशिया तक के राष्ट्र भारतीय रुपये में व्यापार करने की उत्सुकता दिखा रहे हैं, तो इसे एक महाशक्ति के उदय के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन इस कूटनीतिक आवरण के पीछे का आर्थिक यथार्थ अत्यंत धूमिल है। रूस के साथ रुपये में व्यापार की सबसे बड़ी परिणति यह हुई कि रूसी बैंकों में भारतीय मुद्रा का ऐसा अंबार लग गया जिसका वे उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, और अंततः उन्हें भी चीनी युआन या अन्य मुद्राओं का सहारा लेना पड़ा। वैश्विक उदारवाद के खोखले चेहरे को बेनकाब करने के उत्साह में, भारतीय नीति नियंता इस कड़वे सच की उपेक्षा कर रहे हैं कि रुपया अभी भी पूर्ण रूप से परिवर्तनीय मुद्रा नहीं है, जो इसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को पंगु बना देता है।

घरेलू स्तर पर बरती गई वित्तीय प्रज्ञा के प्रमाण स्वरूप मुद्रास्फीति को 4% की मर्यादा के भीतर बांधने और मई में इसे 3.93% के स्तर पर लाने के दावों पर पीठ थपथपाई जा सकती है। जनवरी-मार्च तिमाही में 7.8% की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर निश्चित रूप से एक तकनीकी श्रेष्ठता का समागम दिखती है। परंतु, आर्थिक आंकड़ों की यह चमकीली चादर भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोधों को ढक नहीं सकती। एक ओर जहां विकास दर के आंकड़े आसमान छू रहे हैं, वहीं दूसरी ओर घरेलू उपभोग में सुस्ती, ग्रामीण संकट और अभूतपूर्व बेरोजगारी की दर इस 'दिग्विजयी नायक' के पैर मिट्टी के होने का संकेत देती है। यदि घरेलू धरातल पर ही आर्थिक समृद्धि का समान वितरण नहीं है, तो समष्टि आर्थिक स्थिरता का यह महल ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है।

केंद्रीय बैंक द्वारा क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं को मजबूत कर खुदरा निवेशकों और सरकारी प्रतिभूतियों के लिए तैयार किया गया बुनियादी ढांचा भविष्य के 'खंडित विश्व' की तैयारी का हिस्सा हो सकता है। परंतु, केवल संस्थागत ढांचे का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है जब तक कि नीतियों में निरंतरता और नियामक पारदर्शिता न हो। भारतीय वित्तीय तंत्र पर आज भी नौकरशाही और अत्यधिक नियंत्रण का साया है, जो विदेशी निवेशकों में एक संशय पैदा करता है। संप्रभु मुद्रा की रीढ़ तभी मजबूत होती है जब उसमें वैश्विक बाजार का अटूट विश्वास हो, न कि केवल सरकारी तंत्र का संरक्षण।
काल के भाल पर अंकित ये रेखाएं तभी गौरवमयी बनेंगी जब भारत अपनी तकनीकी और आर्थिक श्रेष्ठता के दावों को यथार्थ के धरातल पर प्रमाणित करेगा। यदि समय रहते वैश्विक वित्तीय संस्थाओं ने इस नए भारत को स्वीकार नहीं किया, तो वे अप्रासंगिक हो सकती हैं, लेकिन यदि भारत ने आत्ममुग्धता के वशीभूत होकर अपनी आंतरिक कमजोरियों को सुधारने में तत्परता नहीं दिखाई, तो रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण का यह स्वप्न शांति के दो युद्धों के बीच का एक संक्षिप्त भ्रम मात्र बनकर रह जाएगा। आत्मनिर्भरता की गूंज तभी चिरस्थायी होगी जब वह नारों के कोलाहल से मुक्त होकर वास्तविक आर्थिक सुदृढ़ता के धरातल पर उतरेगी।


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