बिहार में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अब महज एक कानूनी बहस नहीं रही—यह भारत में चुनावी सुधार और राजनीतिक मंशा के बीच के नाज़ुक संतुलन को उजागर कर चुकी है। जून 2025 में चुनाव आयोग (ECI) द्वारा बिहार में तीन करोड़ से अधिक मतदाताओं की दोबारा जांच का निर्णय, वह भी विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले, आलोचना, विरोध और देशव्यापी बहस का कारण बना है। एक ऐसा लोकतंत्र जो सार्वभौमिक मताधिकार पर गर्व करता है, उसके लिए यह संकट साधारण नहीं है।
चुनाव आयोग का तर्क है कि बिहार में तेज़ शहरीकरण, पलायन और दस्तावेज़ों की अव्यवस्था को देखते हुए यह रिवीजन आवश्यक है। लेकिन जिस तरह से इसे लागू किया जा रहा है, उससे कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 2003 के बाद जिन लोगों ने नाम दर्ज करवाया है, उन्हें अब फिर से नागरिकता और निवास के सबूत देने होंगे—जैसे जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता की पहचान आदि। अहम बात यह है कि आम तौर पर प्रचलित आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज़ अभी तक मान्य नहीं माने गए हैं।
लेकिन 10 जुलाई को हुई सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में एक बड़ा मोड़ आया। लंबी बहस के बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिए कि वह दस्तावेज़ों की सूची में आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड को मान्य दस्तावेज़ के रूप में शामिल करने पर विचार करे। साथ ही कोर्ट ने आयोग से तीन महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाब मांगा—(1) मतदाता सूची संशोधन का समय चुनाव के इतने करीब क्यों तय किया गया, (2) नागरिकता की जांच को इस प्रक्रिया से क्यों जोड़ा जा रहा है, जबकि यह गृह मंत्रालय का विषय है, और (3) क्या यह प्रक्रिया किसी वर्ग विशेष को बाहर करने का माध्यम बन रही है?
सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग से साफ पूछा: आप इस प्रक्रिया को नवंबर में होने वाले बिहार चुनाव से क्यों जोड़ रहे हैं? यह एक ऐसी प्रक्रिया हो सकती है जो पूरे देश में एक समान और चुनाव से स्वतंत्र हो। जस्टिस जॉयमाला बागची ने स्पष्ट किया कि इस गहन प्रक्रिया में गैर-नागरिकों की पहचान करना गलत नहीं है, लेकिन यह कार्य चुनाव की अधिसूचना से पहले ही पूरा हो जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची पर रोक लगाने से इनकार किया है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत की मांग नहीं की थी। लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान को अपनी जिम्मेदारी निभाने से रोका नहीं जा सकता, पर उसे जवाबदेह अवश्य बनाया जा सकता है।
राजद, कांग्रेस और तृणमूल जैसी विपक्षी पार्टियाँ इसे भाजपा और एनडीए का “वोटर दबाने का हथियार” कह रही हैं। उनका आरोप है कि जिन समुदायों पर दस्तावेज़ी बोझ सबसे अधिक पड़ेगा—जैसे प्रवासी मज़दूर, दलित, मुस्लिम और ग्रामीण गरीब—वही लोग हैं जो परंपरागत रूप से विपक्ष के मतदाता माने जाते हैं। भाजपा का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं।
इस पूरे विवाद का केंद्र बन चुका है सीमांचल क्षेत्र—नेपाल और बांग्लादेश से सटे इस इलाके में “विदेशी घुसपैठियों” की भाषा फिर से उठी है। आलोचक इसे असम के एनआरसी की याद दिलाते हैं, जिसमें 19 लाख से अधिक नाम बाहर कर दिए गए थे। अब वही आशंका बिहार में फिर से सिर उठा रही है—इस बार चुनावी समीकरणों के बीच।
अब बारी सुप्रीम कोर्ट की है। उसे तय करना है कि चुनाव आयोग का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 326 के अनुरूप है या फिर मनमाने exclusion के ज़रिए नागरिक अधिकारों का हनन कर रहा है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने और याचिकाकर्ताओं को उसके एक सप्ताह बाद जवाब देने के लिए कहा है। अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।
यह विवाद केवल विधिक नहीं है—यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर जनता के भरोसे की परीक्षा भी है। चुनाव आयोग ने खुद जिस वोटर लिस्ट को जनवरी 2025 में अंतिम माना था, उसे अचानक संशोधित करने का फ़ैसला—वह भी बिना किसी पारदर्शी डेटा के—उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
यह पल सिर्फ बिहार की नवंबर चुनावों की दिशा तय नहीं करेगा। यह यह भी तय करेगा कि जब राजनीति का दबाव बढ़ता है, तब हमारी संस्थाएं—न्यायपालिका, चुनाव आयोग, प्रशासन—कितनी स्वतंत्र, न्यायसंगत और नागरिकों के अधिकारों की रक्षक बनी रह सकती हैं। दक्षता अगर पारदर्शिता के बिना हो तो खतरनाक बन जाती है। और सुधार अगर परामर्श के बिना हो तो वह असमानता को जन्म देता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला सिर्फ एक वोटर लिस्ट का भविष्य नहीं तय करेगा—यह यह बताएगा कि भारत में चुनावी पवित्रता का अर्थ क्या है—सिर्फ सिद्धांत में नहीं, बल्कि ज़मीन पर।
आकांक्षा शर्मा कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके
निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।