कश्मीरः सियासी वजूद तलाशते अब्दुल्लाह-मुफ़्ती आए साथ

संदीप कुमार

 |  16 Oct 2020 |   386
Culttoday

लगभग एक साल दो महीने की नजरबंदी से आजाद हुए जम्मू-कश्मीर के नेताओं के लिए सबसे मौजू सवाल हो गया है कि अब सूबे के नये हालात में खूद कैसे प्रासंगिक रखे. बीते मंगलवार को नजरबंदी से रिहा हुई जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने गुरुवार को सूबे के राजनीतिक पार्टियों की एक बैठक में हिस्सा लिया. यह बैठक श्रीनगर के गुपकार रोड पर स्थित पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के घर पर हुई.
इससे पहले बुधवार को फ़ारूक़ और उमर अब्दुल्लाह ने महबूबा मुफ़्ती से उनके घर जाकर मुलाक़ात की थी. महबूबा मुफ़्ती के अलावा नेशनल कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्लाह, उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्लाह, जम्म-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ़्रेंस के सज्जाद लोन, सीपीएम के एमवाई तारिगामी, जम्मू-कश्मीर अवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के मोज़फ़्फ़र शाह इस बैठक में शामिल हुए. 
लेकिन कांग्रेस की तरफ़ से ना ही प्रदेश अध्यक्ष जीए मीर और ना ही कोई और नेता इस बैठक में शामिल हुआ.
बैठक की समाप्ति के बाद पत्रकारों से बात करते हुए फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने कहा, "हमने इस गठबंधन का नाम 'पीपल्स एलाएंस फ़ॉर गुपकार डिक्लेयरेशन' रखा है. हमारी लड़ाई एक संवैधानिक लड़ाई है. हम चाहते हैं कि भारत सरकार राज्य के लोगों को वो सारे अधिकार वापस लौटाए जो पाँच अगस्त 2019 से पहले उनको हासिल थे. साथ ही हम यह भी महसूस करते हैं कि राजनीतिक मुद्दे को जितना जल्द संभव हो सुलझाया जाना चाहिए और यह जम्मू-कश्मीर की समस्या से जुड़े सभी लोगों के साथ सिर्फ़ और सिर्फ़ शांतिपूर्ण तरीक़े से बातचीत के ज़रिए ही संभव है."
उन्होंने कहा कि गुपकार घोषणा में शामिल सभी दल के नेता जल्द ही आगे की योजना बनाने के लिए दोबारा मुलाक़ात करेंगे. 
महबूबा मुफ़्ती और अब्दुल्लाह बाप-बेटे की मुलाक़ात पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना ने सख़्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इसके 'गंभीर नतीजे' होंगे.
रैना ने कहा था, "वो लोग अपने आप को बचाना चाहते हैं और अपने गुनाहों को छुपाना चाहते हैं. वो लोग साज़िश रच रहे हैं लेकिन वो लोग अपने आप को बचा नहीं पाएंगे." सूत्रों के अनुसार जम्मू स्थित एक संस्था डोगरा फ़्रंट के कुछ लोगों ने कश्मीरी नेताओं की इस बैठक का विरोध किया और गुपकार घोषणा को एक धोखा क़रार दिया. लेकिन कश्मीर में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अनुच्छेद 370 को हटाने के भारत सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कश्मीर की सभी प्रमुख पार्टियों के एक साथ आने से वैश्विक स्तर पर भारत के लिए चिंता का कारण हो सकता है.
कश्मीर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर नूर अहमद बाबा कहते हैं, "हमलोग एक आज़ाद लोकतांत्रिक दुनिया में रहते हैं जहां लोगों की आवाज़ सुनी जाती है. मैं भारत के संदर्भ में ये बातें नहीं कह रहा. यह लोग कश्मीर की मुख्यधारा के नेता हैं जिन्हें भारत ने हमेशा लोगों के ज़रिए चुने गए नेताओं की तरह दुनिया के सामने पेश किया है और यही लोग श्रीगर या नई दिल्ली की सत्ता में रहे हैं. अब यह सभी लोग एक साथ मिलकार जो भी कहेंगे वो न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में सुना जाएगा. हमलोगों ने देखा है कि पाँच अगस्त के फ़ैसले के बाद भारत पर बहुत दबाव है. इन हालात में इनलोगों के साथ आने से भारत के लिए और मुश्किलें पैदा होंगी."
पिछले साल (2019) चार अगस्त को कश्मीर के सभी प्रमुख दलों ने फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के घर पर एक बैठक की थी. यह बैठक ऐसे समय में हुई थी जब कश्मीर में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती थी. तत्कालीन गवर्नर सत्यपाल मलिक ने उस समय यह कहा था कि अमरनाथ यात्रा के दौरान चरमपंथी हमले की आशंका के तहत अतिरिक्त सुरक्षाबलों को तैनात किया गया है.
इसी बैठक में सर्वसम्मित से एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसे गुपकार घोषणा (Gupkar Declaration) नाम दिया गया था. उस घोषणा में कहा गया था कि कश्मीर की सभी पार्टियां अपनी पहचान, स्वायत्तता और राज्य के ख़ास दर्जे पर सभी तरह के हमलों से बचाने के लिए एकजुट हैं.
गुपकार रोड के एक तरफ़ भारत और पाकिस्तान के लिए यूएन का दफ़्तर है और दूसरी तरफ़ कश्मीर के अंतिम राजा का घर है. गुपकार बहुत ही सुरक्षित इलाक़ा है और हमेशा से ही यहां पर सत्ता में शामिल या उनसे जुड़े लोगों का आवास रहा है. राज्य के सारे बड़े नेता और नौकरशाह इसी जगह रहते हैं. लेकिन पिछले साल पाँच अगस्त को भारत सरकार ने जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर को मिलने वाले विशेष राज्य के दर्जे को ख़त्म कर दिया तो उसके बाद से गुपकार रोड सुनसान सा दिखने लगा क्योंकि केंद्र सरकार ने तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत कश्मीर के सारे छोटे-बड़े नेताओं को या तो गिरफ़्तार कर लिया था या फिर उन्हें नज़रबंद कर दिया गया था.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह का घर भी एक जेल में तब्दील कर दिया गया था. मोबाइल, लैंडलाइन फ़ोन, इंटरनेट सभी तरह के संचार माध्यमों पर भी पाबंदी लगा दी गई थी और ज़्यादातर इलाक़ों में कर्फ़्यू लगा दिया गया था. फ़ारूक़ अब्दुल्लाह, उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती समेत कई लोगों को पहले नज़रबंद किया गया फिर उनपर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट लगा दिया गया था. मार्च में फ़ारूक़ और उमर अब्दुल्लाह को रिहा कर दिया गया था और मंगलवार को महबूबा मुफ़्ती को भी रिहा कर दिया गया.
 


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